13 सालों से अचेत अवस्था में जी रहे हरीश राणा को कैसे दी जाएगी इच्छा मृत्यु? पिता ने भावुक होते हुए बताया पूरा प्रॉसेस

Harish Rana News: हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट से मिली इच्छा मृत्यु की इजाजत. पिता अशोक राणा ने बताया कि एम्स में फूड पाइप हटाकर कैसे दी जाएगी उन्हें विदाई. पढ़ें 13 साल के संघर्ष की पूरी कहानी.

Ashok Rana

मयंक गौड़

• 04:11 PM • 11 Mar 2026

follow google news

पिछले 13 सालों से मौत से जूझ रहे गाजियाबाद के हरीश राणा को आखिरकार लंबी कानूनी लड़ाई के बाद इच्छा मृत्यु की इजाजत मिल गई है. आज यानी 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छा मृत्यु) की इजाजत दे दी.  अदालत ने माना कि पिछले एक दशक से ज्यादा समय से वेजिटेटिव स्टेट में पड़े हरीश के ठीक होने की कोई गुंजाइश नहीं बची है.  कोर्ट के इस फैसले के बाद अब हरीश के पिता अशोक राणा ने भावुक होते हुए बताया है कि उनके बेटे को इच्छा मृत्यु कैसे दी  जाएगी.

यह भी पढ़ें...

एम्स में अनुभवी डॉक्टरों की निगरानी में होगी प्रक्रिया

अशोक राणा ने बताया कि पूरी प्रक्रिया चिकित्सकीय देखरेख में पूरी होगी. उन्होंने कहा, "हरीश की फूड पाइप (भोजन की नली) हटाएंगे. इसके बाद अनुभवी चिकित्सक की देखरेख में इसे एम्स (AIIMS) में रखा जाएगा. उसे धीरे-धीरे पानी देते रहेंगे।" पिता ने बेहद भारी मन से कहा कि जब यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी, तो वे अपने बेटे के पार्थिव शरीर को बड़े सम्मान और गौरव के साथ घर लेकर आएंगे.

क्या होता है पैसिव यूथेनेशिया?

पैसिव यूथेनेशिया में डॉक्टर जीवन रक्षक उपचार जैसे वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या दवाएं रोक देता है. मरीज को अपनी बीमारी से स्वाभाविक रूप से मरने देता है. 

साल 2013 में क्या हुआ था हरीश के साथ?

हादसे की दर्दनाक यादों को याद करते हुए अशोक राणा ने बताया कि 20 अगस्त 2013 को मंगलवार था. राखी का दिन था और हरीश ने मैसेज भी भेजे थे. लेकिन तभी हरीश के गिरने की खबर आई. पिता ने कहा, "रात 3 बजे जब हम पीजीआई ट्रॉमा सेंटर पहुंचे, तो देखा कि उसके सिर में चोटें थीं, उंगलियों के निशान थे और पैर के तलवे नीले पड़ चुके थे. जो हुआ, शायद हमारे कर्म में यही लिखा था. 13 साल से उसकी सेवा लिखी थी, जो हम कर रहे हैं."

हरीश को था बॉडीबिल्डिंग का शौक

हरीश राणा चंडीगढ़ में सिविल इंजीनियरिंग के छात्र थे और अपनी फिटनेस को लेकर काफी सजग थे. लेकिन 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के कारण उनके दिमाग  की नसें सूख गईं और वे 100 फीसदी दिव्यांगता का शिकार हो गए. 13 साल से वह अचेत अवस्था में बिस्तर पर हैं, जिसके कारण उनके शरीर पर गहरे जख्म भी बन गए हैं. ऐसे में उनके माता-पिता ने ही सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसके बाद कोर्ट ने 'गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार' को बरकरार रखते हुए यह आदेश दिया.