Unchahar Assembly Seat: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की सरगर्मी अब तेज हो गई है. प्रदेश में सियासी पारा पूरी तरह से चढ़ चुका है. तमाम पार्टियां सत्ता पाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा रही हैं और जातीय समीकरणों को साधने में जुट गई हैं. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी चुनाव प्रचार के लिए अपना 'पीडीए' रथ मैदान में उतार दिया है. इसकी शुरुआत 24 सितंबर को रायबरेली से की गई है. इसी बीच एक ओपिनियन पोल का आंकड़ा सामने आया है, जिसने सियासी हलचल तेज कर दी है. सर्वे में दावा किया गया है कि सपा छोड़कर बीजेपी में गए कैबिनेट मंत्री मनोज पांडे अपनी ऊंचाहार सीट से चुनाव हार सकते हैं.
ADVERTISEMENT
रायबरेली से निकला अखिलेश का रथ
समाजवादी पार्टी रायबरेली और अमेठी जैसे अवध के अहम जिलों में खुद को और मजबूत करना चाहती है. पिछले कुछ चुनावों में इन इलाकों में सपा की स्थिति मजबूत रही है. इसी पकड़ को और पुख्ता करने के लिए अखिलेश यादव ने अपने पीडीए रथ की शुरुआत रायबरेली से की है. इस रथ के जरिए सपा हर वर्ग के वोटरों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है.
मनोज पांडे की बगावत का बदला
रायबरेली पर सपा के खास फोकस की एक बड़ी वजह मनोज पांडेय भी हैं. मनोज पांडे लंबे समय तक सपा के साथ रहे और मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव तक, सभी ने उन्हें पार्टी में पूरा सम्मान दिया. लेकिन उन्होंने पार्टी से बगावत कर दी और बीजेपी में शामिल हो गए. इसके बाद बीजेपी ने उन्हें कैबिनेट मंत्री बना दिया. अब अखिलेश यादव किसी भी हाल में इस इलाके को जीतकर अपना बदला लेना चाहते हैं.
सर्वे में दिखी सपा की भारी लहर
पीडीए रथ के रायबरेली पहुंचने से पहले 'न्यूज लीडर मैटराइज' का एक सर्वे सामने आया है, जिसने सबको हैरान कर दिया है. इस ओपिनियन पोल के अनुसार, रायबरेली में समाजवादी पार्टी के पक्ष में एक बड़ी आंधी चल रही है. सर्वे में दावा किया गया है कि जिले की पांच सीटों पर सपा और कांग्रेस का गठबंधन जीत हासिल कर सकता है, जबकि बीजेपी के खाते में सिर्फ एक सीट जा सकती है.
ऊंचाहार सीट पर हारेंगे मनोज पांडे
इस सर्वे में सबसे चौंकाने वाली बात ऊंचाहार विधानसभा सीट को लेकर सामने आई है. ओपिनियन पोल के मुताबिक, तीन बार के विधायक और वर्तमान कैबिनेट मंत्री मनोज पांडे इस बार चुनाव हारते हुए दिखाई दे रहे हैं. मनोज पांडे ने 2012, 2017 और 2022 में सपा के टिकट पर बड़ी जीत दर्ज की थी. लेकिन, सर्वे के अनुसार सपा से अलग होने के बाद उनके लिए अपने क्षेत्र के वोटरों को साधना और चुनाव जीतना काफी मुश्किल हो गया है.
ADVERTISEMENT










