भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के संगठन में एक बार फिर उन पुराने चेहरों की वापसी हुई है. ऐसा माना जाता है कि इन भाजपा के ये पुराने चेहरे 2014 से 2024 तक पार्टी की जीत में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे चुके हैं. पार्टी द्वारा जिला प्रभारियों की नई सूची जारी कर दी गई है. हालांकि इस सूची में कुछ युवा और नए चेहरों को भी शामिल किया गया है, लेकिन ज्यादातर पदों पर पुराने और अनुभवी नेताओं को ही जिम्मेदारी सौंपी गई है.
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जातीय विविधता और सामाजिक संतुलन पर खड़े हुए सवाल
जिला प्रभारियों की इस नई सूची के सामने आने के बाद पार्टी के संगठन में संतुलन को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे हैं, खासकर जाति के संदर्भ में. गौरतलब है कि कुछ दिन पहले पार्टी ने जो नया संगठन बनाया था, उसमें कुछ नए युवाओं को अहम पद दिए गए थे. लेकिन जिला प्रभारियों की इस ताजा सूची को देखकर यह माना जा रहा है कि पार्टी ने जातीय विविधता पर खास ध्यान नहीं दिया है.
अखिलेश यादव के 'PDA' गठबंधन को मिल सकता है फायदा
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस लिस्ट में जाति समीकरणों को नजरअंदाज करना बीजेपी की रणनीति में एक बड़ी कमजोरी साबित हो सकता है. यह स्थिति आगामी चुनावों में बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है. चर्चा यह भी है कि जातीय संतुलन की इस कमी का सीधा फायदा अखिलेश यादव के गठबंधन यानी 'पीडीए' (PDA) को हो सकता है.
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