उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों की छोटी सरकार यानी पंचायत चुनाव पिछले कई महीनों से अधर में लटके हुए हैं. चुनाव टलने की सबसे बड़ी वजह हाई कोर्ट में लंबित आरक्षण के निर्धारण से जुड़ी याचिका है. इस याचिका में पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन की मांग की गई है, जिसके चलते पूरी चुनावी प्रक्रिया थमी हुई है. सरकार और मंत्रियों के तमाम आश्वासनों के बावजूद, जब तक कोर्ट का अंतिम फैसला नहीं आता, चुनाव की राह साफ होती नहीं दिख रही.
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सियासी दलों में उत्साह कम, विपक्ष ने उठाए सवाल
लगातार हो रही देरी के कारण राजनीतिक गलियारों में चुनाव को लेकर वह उत्साह नजर नहीं आ रहा है जो पहले था. कुछ राजनीतिक दल तो दबी जुबान में यह भी मान रहे हैं कि शायद इस साल चुनाव संभव न हो पांए. वहीं, विपक्षी दल सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं. विपक्ष का कहना है कि सरकार चुनाव कराने की तत्परता तो दिखा रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थितियां कुछ और ही इशारा कर रही हैं.
ब्रजेश पाठक और ओम प्रकाश राजभर का रुख
डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने साफ किया है कि सरकार की पूरी कोशिश है कि चुनाव समय पर हों, लेकिन सब कुछ कोर्ट के निर्णय पर टिका है. वहीं, पंचायत राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर भी इस मामले में पूरी तरह आश्वस्त नजर नहीं आ रहे हैं. उनके बयानों में भी चुनावी तारीखों को लेकर एक किस्म का असमंजस और झिझक साफ देखी जा सकती है.
उम्मीदवारों की बढ़ी परेशानी, पोस्टर और प्रचार पर पानी
सबसे ज्यादा नुकसान उन उम्मीदवारों को हो रहा है जिन्होंने पंचायत चुनाव की तैयारी में पानी की तरह पैसा बहाया है. गांवों में पोस्टर लग चुके हैं और प्रचार अभियान शुरू हो चुका था, लेकिन अनिश्चितता के चलते अब सब कुछ थम सा गया है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पंचायत चुनावों में हो रही यह देरी आगामी विधानसभा चुनावों के समीकरणों को भी प्रभावित कर सकती है.
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