खागा विधानसभा में 4 बार से जीत रही है बीजेपी, क्या 2027 में अखिलेश यादव का पीडीए फॉर्मूला बिगाड़ेगा खेल?

खागा विधानसभा सीट पर भाजपा चार बार जीत चुकी है. पिछला चुनाव मुश्किल था. समाजवादी पार्टी इस बार तैयार है. पासी वोटर ज़्यादा हैं.

रजत सिंह

• 01:36 PM • 18 Mar 2026

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Khaga VidhanSabha 2027:उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले की खागा विधानसभा सीट भाजपा के उस मजबूत गढ़ के रूप में जानी जाती है. यहां पिछले चार चुनावों (2007, 2012, 2017 और 2022) से भगवा परचम लहरा रहा है. विधायक कृष्णा पासवान की लगातार जीत ने न केवल उनकी व्यक्तिगत साख को मजबूत किया है बल्कि खागा को भाजपा का सुरक्षित किला बना दिया है. हालांकि 2022 के विधानसभा चुनाव में जीत का अंतर महज पांच हजार वोटों तक सिमट जाना भाजपा के लिए खतरे की घंटी है. समाजवादी पार्टी इस बार पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के साथ इस किले में सेंध लगाने की पूरी तैयारी में है जिससे आगामी मुकाबला बेहद रोचक होने वाला है.

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कृष्णा पासवान: घर-घर संपर्क और 'जीत की हैट्रिक' से आगे का सफर

खागा सीट पर भाजपा की लगातार जीत के पीछे विधायक कृष्णा पासवान का जमीनी जुड़ाव और घर-घर संपर्क एक बड़ा कारक माना जाता है. 2007 से शुरू हुआ उनकी जीत का सिलसिला कठिन से कठिन लहरों के बावजूद जारी रहा. भाजपा की रणनीति यहाँ हमेशा से लाभार्थी वर्ग और अपने कोर कैडर को एकजुट रखने की रही है जिसमें कृष्णा पासवान अब तक सफल रही हैं.

2022 का 'क्लोज फाइट' और सपा की बढ़ती उम्मीदें

पिछले विधानसभा चुनाव में सपा ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी थी. भाजपा की जीत का अंतर गिरकर केवल 5,000 वोटों पर आ गया जिसने समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं में नई जान फूंक दी है. सपा इस बार पिछले चुनाव की कमियों को दूर कर और बूथ स्तर पर मजबूती बढ़ाकर चुनावी मैदान में उतरने वाली है.राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में सपा की स्थिति यहां पहले से कहीं अधिक मजबूत नजर आ रही है.

जातिगत समीकरण: पासी वोटरों की निर्णायक भूमिका

खागा सुरक्षित सीट होने के नाते यहां दलित आबादी, विशेषकर पासी समाज के वोटरों की तादाद सबसे अधिक है.इसके अलावा पिछड़ी जातियों और अन्य वर्गों की मिक्स आबादी यहां हार-जीत का फैसला करती है. भाजपा जहां अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथ 'पासी' कार्ड खेलती है. वहीं सपा इस बार जातीय जनगणना और आरक्षण के मुद्दों के जरिए दलित-पिछड़ा गठजोड़ बनाने की कोशिश में है.

भाजपा के लिए चुनौतियां और सुधार की जरूरत

लगातार चार बार सत्ता में रहने के कारण भाजपा को 'एंटी-इंकंबेंसी' (सत्ता विरोधी लहर) का सामना करना पड़ सकता है. स्थानीय वोटरों की कुछ बुनियादी मुद्दों पर नाराजगी को दूर करना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती होगी. जानकारों का कहना है कि अगर भाजपा ने अपनी रणनीति में समय रहते सुधार नहीं किया तो सपा इस बार बड़ा उलटफेर कर सकती है.