'द ग्रेट चमार' बोर्ड से संसद तक...जानें कैसे चंद्रशेखर आजाद बनें दलित राजनीति का नया चेहरा

चंद्रशेखर आजाद रावण: 'द ग्रेट चमार' बोर्ड से लेकर संसद तक का पूरा सफर. जानें करणी सेना के साथ उनके हालिया विवाद की सच्चाई और मंच से दिए गए 'चमड़ी उतारने' वाले बयान का सियासी मतलब. भीम आर्मी चीफ की जेल यात्रा, उन पर हुआ हमला और 2027 के चुनाव के लिए उनकी तैयारियों का विशेष विश्लेषण.

रजत सिंह

• 10:39 AM • 17 Mar 2026

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Chandrasekhar Azad Story: सहारनपुर के एक छोटे से गांव छुटमलपुर से निकलकर भारतीय संसद तक पहुंचने वाले चंद्रशेखर आजाद रावण की कहानी संघर्ष, विवाद और रणनीतिक जीत का मिश्रण है. हाल ही में बाराबंकी में आयोजित एक रैली के दौरान उन्होंने करणी सेना की धमकियों का जिस अंदाज में जवाब दिया उसने उनके समर्थकों में जोश भर दिया है. मंच से उन्होंने दो-टूक कहा "हम चमड़ा उतारना भी जानते हैं. जूता बनाना भी जानते हैं और उसे सर पर मारना भी जानते हैं.' यह बयान न केवल उनके आक्रामक तेवर दिखाता है बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उनकी बढ़ती महत्वाकांक्षाओं का संकेत भी है.

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2015: भीम आर्मी का गठन और पहचान

चंद्रशेखर की राजनीतिक यात्रा साल 2015 में 'भीम आर्मी' के गठन के साथ शुरू हुई. इसका उद्देश्य दलित हितों की रक्षा और शिक्षा को बढ़ावा देना था. चंद्रशेखर पहली बार तब राष्ट्रीय मीडिया की नजरों में आए जब सहारनपुर के घड़कौली गांव में 'द ग्रेट चमार' नाम का बोर्ड लगाया गया. इस घटना ने एक जातीय संघर्ष को जन्म दिया जिससे चंद्रशेखर दलितों के बीच एक मसीहा के रूप में उभरे.

जेल, एनएसए और 'जहर' का दावा

मई 2017 में सहारनपुर के शब्बीरपुर में हुई जातीय हिंसा के बाद चंद्रशेखर पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाया गया. वे लंबे समय तक जेल में रहे. यूपी Tak से बातचीत में उन्होंने अक्सर दावा किया है कि जेल में उन्हें संदिग्ध इंजेक्शन (सुइयां) दिए गए जिससे उन्हें आज भी लगता है कि उनके शरीर में जहर है. जेल में बिताए इस समय ने उन्हें दलित युवाओं के बीच और अधिक लोकप्रिय बना दिया.

2022 की हार और 2024 की ऐतिहासिक जीत

2022 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव के साथ गठबंधन की कोशिशें नाकाम रहने पर चंद्रशेखर ने गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ के खिलाफ चुनाव लड़ा. हालांकि उनकी जमानत जब्त हो गई. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने नगीना (सुरक्षित) सीट से निर्दलीय जैसे तेवरों के साथ चुनाव लड़ा और सपा-कांग्रेस गठबंधन के बावजूद बड़ी जीत दर्ज कर पहली बार संसद पहुंचे.

देवबंद में हमला और 'शेर आया' का नारा

जून 2023 में देवबंद में उन पर जानलेवा हमला हुआ, जिसमें उन्हें गोली लगी. अस्पताल से बाहर आते समय सफेद कंबल ओढ़े और हाथ उठाकर 'जय भीम' का नारा लगाते उनकी तस्वीर उनके समर्थकों के लिए 'शेर की वापसी' जैसा प्रतीक बन गई. इसी घटना ने उनके राजनीतिक आधार को और मजबूती दी.