भूमिहार बाहुल्य सीट पर क्या बीजेपी लगाएगी हैट्रिक या दौड़ेगी सपा की साइकिल? मधुबन सीट का समझिए पूरा समीकरण

सुषमा पांडेय

• 07:13 PM • 08 Jul 2026

UP Kiska: मऊ की वीआईपी मधुबन विधानसभा सीट पर 2027 चुनाव से पहले सियासी मुकाबला तेज हो गया है. भाजपा विकास के दम पर हैट्रिक का दावा कर रही है, जबकि सपा पीडीए फॉर्मूले और जातीय समीकरणों के सहारे वापसी की तैयारी में जुटी है.

Akhilesh Yadav and CM Yogi

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Madhuban Vidhan Sabha Election 2027: मऊ जिले की मधुबन विधानसभा सीट को पूर्वांचल की सबसे हॉट और वीआईपी सीटों में गिना जाता है. घाघरा नदी के तट पर बसे इस इलाके में विकास, विस्थापन, बेरोजगारी और हर साल आने वाली बाढ़ व कटान सबसे बड़े चुनावी मुद्दे रहे हैं. वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही इस सीट पर सियासी पारा चढ़ गया है.भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विकास कार्यों के दम पर यहां जीत की हैट्रिक लगाने का दावा कर रही है. वहीं समाजवादी पार्टी (सपा) अपने पीडीए फॉर्मूले और जमीनी समस्याओं को लेकर भाजपा के इस गढ़ को ढहाने की तैयारी में है. आइए जानते हैं कि इस सीट का इतिहास, जातीय गणित और स्थानीय पत्रकारों का आकलन क्या इशारा कर रहा है.

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मधुबन सीट का सियासी इतिहास

मधुबन सीट का राजनीतिक इतिहास बेहद दिलचस्प रहा है.

1996: समाजवादी पार्टी के सुधाकर सिंह ने यहाँ जीत दर्ज की थी.

2002 और 2007: यह सीट बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के खाते में गई, जहां से कपिल देव यादव और फिर उमेश चंद्र पांडे विधायक बने.

2012: बीएसपी के उमेश चंद्र पांडे ने अपनी जीत को बरकरार रखा.

2017 (उलटफेर): भाजपा के दारा सिंह चौहान ने सपा के अमरीश चंद्र पांडे को हराकर पहली बार इस सीट पर कमल खिलाया.

2022: भाजपा के रामविलास चौहान ने सपा के उमेश चंद्र पांडे को एक कड़े मुकाबले में शिकस्त देकर लगातार दूसरी बार बीजेपी का परचम लहराया.

बीजेपी बनाम सपा

भाजपा का पक्ष: भाजपा नेताओं का दावा है कि डबल इंजन सरकार ने यहां विकास की गंगा बहाई है. देवारा क्षेत्र में बाढ़ और पलायन रोकने के लिए भारी बजट पास किया गया है. रामपुर में नया थाना, फायर ब्रिगेड की स्थापना और बहुप्रतीक्षित 'मोहन सेतु' के लिए बजट स्वीकृत कराया गया है. हाल ही में सीएम योगी आदित्यनाथ ने इस क्षेत्र को 392 करोड़ रुपये की 114 विकास परियोजनाओं की सौगात दी है. मुफ्त राशन, आवास और शौचालय के दम पर भाजपा यहां बेहद मजबूत है.

सपा का पक्ष: समाजवादी पार्टी का आरोप है कि जमीन पर बाढ़ और कटान की समस्या आज भी वैसी ही बनी हुई है. सपा अपने संगठन को मजबूत करने के लिए 'पीडीए चौपाल' के जरिए हर बूथ तक पहुंच चुकी है. हाल ही में मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) अभियान के तहत पार्टी कार्यकर्ताओं ने बड़े पैमाने पर नए मतदाताओं के नाम जुड़वाए हैं जिससे पार्टी का आधार मजबूत हुआ है.

जातीय समीकरण: किसका पलड़ा भारी?

पूर्वांचल की इस सीट पर हमेशा से जातीय समीकरणों का बड़ा खेल देखने को मिला है. यहां के कुल मतदाताओं की संख्या के आधार पर प्रमुख जातियों का गणित इस प्रकार है.

दलित मतदाता: करीब 70,000

यादव मतदाता: करीब 60,000

राजभर मतदाता: करीब 25,000

चौहान (लोनिया) मतदाता: करीब 24,000

मुस्लिम मतदाता: करीब 22,000

निषाद/मल्लाह/बिंद/केवट: करीब 22,000

प्रजापति/विश्वकर्मा/नाई: करीब 25,000

कुर्मी/सेंथवार: करीब 20,000

कुशवाहा/मौर्य/शाक्य: करीब 18,000

सवर्ण (ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत, वैश्य): करीब 40,000

अन्य समाज: करीब 57,000

समीकरण का पेच: यदि सपा का यादव-मुस्लिम-दलित (PDA) फॉर्मूला जमीन पर उतरता है, तो भाजपा के लिए मुश्किल होगी. लेकिन इस बार ओम प्रकाश राजभर की पार्टी (सुभासपा) एनडीए गठबंधन के साथ है जिसका फायदा भाजपा को अपने चौहान और राजभर वोट बैंक को सहेजने में मिल सकता है.

स्थानीय पत्रकारों का आकलन

क्षेत्र के वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, आज की तारीख में भी यहां सपा और भाजपा के बीच 'कांटे की टक्कर' है जिसमें भाजपा सरकारी तंत्र और कैबिनेट मंत्री ए.के. शर्मा के विशेष फोकस के कारण थोड़ा 'बीस' नजर आ रही है. हालांकि टिकटों को लेकर नए समीकरण बन रहे हैं.

सपा में बदलाव के संकेत: सूत्रों के मुताबिक, वर्तमान में सगड़ी से सपा विधायक डॉ. एच.एन. सिंह पटेल ने अखिलेश यादव से मुलाकात की है और वे इस बार मधुबन सीट से सपा के टिकट पर दांव लगा सकते हैं. पिछले चुनाव में दूसरे नंबर पर रहे उमेश पांडे पाला बदल चुके हैं जिससे उनका पत्ता साफ माना जा रहा है.

बीजेपी की रणनीति: भाजपा अपनी इस सिटिंग सीट को किसी भी कीमत पर गंवाना नहीं चाहती. हालांकि, स्थानीय स्तर पर भरत भैया, उत्पल राय और कुछ नए युवा चेहरे भी अपनी दावेदारी ठोक रहे हैं.

बीएसपी का दांव: बसपा से इस बार 'भरत भैया' के मैदान में उतरने की चर्चा तेज है जिन्होंने 2022 में भाजपा से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ा था और अच्छा-खासा वोट हासिल किया था. यदि वे बसपा से आते हैं, तो मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है.

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि जिसने पूर्वांचल फतेह कर लिया उसके लिए लखनऊ का सिंहासन आसान हो जाता है. समाजवादी पार्टी जहां 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से पूर्वांचल में लगातार आक्रामक है. वहीं भाजपा अपने सहयोगियों के दम पर 2022 की तरह 2027 में भी जीत का किला बचाने की फिराक में है. मधुबन की जनता इस बार विकास के वादों पर मुहर लगाएगी या बदलाव की राह चुनेगी, यह आने वाला वक्त ही बताएगा.