UP Kiska: बाराबंकी सदर सीट पर क्या सपा लगाएगी जीत का चौका या बीजेपी मार लेगी बाजी?

'यूपी किसका' में आज बात बाराबंकी सदर सीट की जहां भाजपा आज तक नहीं जीत पाई है. यहां पिछले तीन चुनावों से सपा के धर्मराज यादव का कब्जा है. क्या 2027 में सपा चौका लगाएगी या भाजपा का खाता खुलेगा? जानिए सियासी समीकरण.

Akhilesh Yadav

रजत सिंह

02 May 2026 (अपडेटेड: 02 May 2026, 02:18 PM)

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उत्तर प्रदेश की सियासत में कुछ सीटें ऐसी हैं जो किसी खास दल का अभेद्य किला बन चुकी हैं. 'यूपी किसका' के आज के अंक में हम बात करेंगे बाराबंकी सदर सीट की. यह वो विधानसभा सीट है जहां भारतीय जनता पार्टी (BJP) आज तक जीत का स्वाद नहीं चख पाई है. पिछले तीन चुनाव से यहां समाजवादी पार्टी के धर्मराज सिंह यादव (सुरेश यादव) का एकछत्र राज है. क्या 2027 के रण में सपा अपनी जीत का चौका लगा पाएगी? या फिर बीजेपी इस बार सपा के इस मजबूत गढ़ को भेदने में कामयाब होगी? आइए समझते हैं इस सीट का पूरा सियासी समीकरण.

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सपा का अभेद्य किला है बाराबंकी सदर

इतिहास गवाह है कि बाराबंकी सदर सीट पर बीजेपी का खाता अभी तक नहीं खुल सका है.  पिछले 5 चुनावों के नतीजों पर नजर डालें तो 2022, 2017 और 2012 में लगातार तीन बार सपा के धर्मराज सिंह यादव ने जीत दर्ज की.

2007: बसपा के संग्राम सिंह यहां से विधायक बने.

2002: सपा के छोटेलाल यादव ने परचम लहराया था.

विधायक धर्मराज यादव का कहना है कि उनकी जीत का राज जनता के बीच निरंतर मौजूदगी है. उनके मुताबिक, सपा कार्यकर्ता चुनाव खत्म होने के अगले दिन से ही अगले चुनाव की तैयारी और जनसेवा में जुट जाते हैं. उनका मुख्य फोकस शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी समस्याओं के निराकरण पर रहता है.

बीजेपी की चुनौती और 'रानी' का दावा

बीजेपी की ओर से पिछली बार चुनाव लड़ने वाली डॉ. रानी मौर्या हार के बावजूद हौसले बुलंद रखे हुए हैं. उनका कहना है कि जनता आज भी उन्हें जिता हुआ मानती है क्योंकि वह योगी-मोदी की नीतियों को लेकर लगातार लोगों के बीच सक्रिय हैं. रानी मौर्या का दावा है कि यदि 2027 में पार्टी उन्हें फिर अवसर देती है, तो 'सबका साथ-सबका विकास' की नीति के दम पर यहां पहली बार कमल जरूर खिलेगा.

सियासी और जातीय समीकरण (अनुमानित)

सपा के पलड़ा भारी होने के पीछे यहां का जातीय गणित मुख्य भूमिका निभाता है.

यादव: 75,000

मुस्लिम: 60,000

कुर्मी: 60,000

पासी: 55,000

ब्राह्मण: 4,000

जाटव: 35,000

अन्य OBC: 20,000

यहां यादव, मुस्लिम और पासी वोटों का गठबंधन सपा को एक मजबूत बढ़त दिला देता है.

क्या कहते हैं स्थानीय जानकार?

स्थानीय पत्रकारों का मानना है कि बीजेपी के लिए यह राह आसान नहीं है. हालाँकि, शहरी क्षेत्र के विस्तार और नए मतदाताओं के जुड़ने से वोटिंग पैटर्न में कुछ बदलाव आ सकता है. लेकिन आज भी यहां मुख्य मुकाबला सपा बनाम अन्य ही नजर आता है. पत्रकारों का कहना है कि सपा यहां बेहद मजबूत स्थिति में खड़ी है और असली टक्कर तभी स्पष्ट होगी जब बीजेपी और बसपा अपने उम्मीदवारों के नाम तय करेंगे.