UP Kiska: सहारनपुर जिले की देवबंद विधानसभा सीट न सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश बल्कि देश की सबसे चर्चित और राजनीतिक रूप से संवेदनशील सीटों में शुमार की जाती है. विश्व प्रसिद्ध इस्लामिक शिक्षण संस्था दारुल उलूम की वजह से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखने वाली इस सीट पर जाति और धर्म के समीकरण हमेशा से चुनावी नतीजों को तय करते रहे हैं. पिछले दो विधानसभा चुनावों (2017 और 2022) से यह सीट भारतीय जनता पार्टी के मजबूत कब्जे में है और वर्तमान में यहां से विधायक कुंवर बृजेश सिंह हैं जो योगी सरकार में पीडब्ल्यूडी राज्य मंत्री भी हैं.
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लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर देवबंद की जमीनी सियासत अभी से सुलगने लगी है और यहां बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच सीधे महामुकाबले के संकेत मिल रहे हैं. मुस्लिम-दलित गठजोड़ बनाम ठाकुर वर्चस्व की इस लड़ाई में 2027 का सिकंदर कौन बनेगा? ग्राउंड पर इस सीट की पॉलिटिक्स क्या कह रही है?
देवबंद का राजनीतिक इतिहास
अगर हम देवबंद विधानसभा के इतिहास के पन्नों को पलटें तो यह सीट किसी एक दल की बपौती नहीं रही है. समय-समय पर जनता ने यहां बीएसपी, सपा, कांग्रेस और बीजेपी सबको मौका दिया है.
साल 2002 और 2007
इन दोनों चुनावों में बहुजन समाज पार्टी (BSP) का जलवा रहा. 2002 में राजेंद्र सिंह राणा और 2007 में मनोज चौधरी बसपा के टिकट पर विधायक बने. साल 2012 सूबे में सपा की लहर के साथ समीकरण बदले और राजेंद्र सिंह राणा ने पाला बदलकर सपा के टिकट पर जीत दर्ज की.साल 2016 में राजेंद्र सिंह राणा के असामयिक निधन के बाद हुए उपचुनाव में कांग्रेस के माविया अली ने बाजी मारी और करीब 8 महीने तक विधायक रहे.
साल 2017 और 2022
उत्तर प्रदेश में बीजेपी के उभार के साथ ही कुंवर बृजेश सिंह ने यहां कमल खिलाया. 2022 का चुनाव बेहद त्रिकोणीय और रोचक था जिसमें बीजेपी के कुंवर बृजेश सिंह को करीब 92,000 वोट मिले, जबकि सपा के कार्तिकेय राणा 87,000 वोट पाकर दूसरे नंबर पर रहे. 2027 को लेकर दिग्गजों की हुंकार और दावों की हकीकत आगामी 2027 के रण को लेकर दोनों ही खेमों में शह-मात का खेल शुरू हो चुका है.
सपा के पूर्व विधायक माविया अली का दावा है कि इस बार परिसीमन और बूथों के पुनर्गठन (SIR) के बाद स्थितियां बदली हैं. वे कहते हैं कि 'देवबंद में अब करीब 3,15,000 वोटर्स हैं। बूथ स्तर पर हमारा 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) कार्यकर्ता पूरी मजबूती से काम कर रहा है. 2022 में अंतिम समय में टिकट घोषित होने के कारण जो 10-20 दिनों की कमी रह गई थी, उसका फायदा बीजेपी को मिला था. इस बार तैयारी पूरी है और 100 फीसदी समाजवादी पार्टी यहां जीतेगी.'
दूसरी तरफ, सिटिंग विधायक और योगी सरकार में मंत्री कुंवर बृजेश सिंह अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं.उनका कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में डबल इंजन सरकार ने देवबंद में विकास की नई इबारत लिखी है. लोकप्रियता के इसी पैमाने के दम पर बीजेपी 2017 और 2022 की तरह ही 2027 में भी यहां प्रचंड बहुमत से जीत की हैट्रिक लगाएगी.
क्या मनोज चौधरी बदलेंगे गेम? या ओवैसी-मायावती का अलायंस बिगाड़ेगा खेल?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव पूरी तरह से उम्मीदवारों के चयन पर निर्भर करेगा. वर्तमान में समाजवादी पार्टी से टिकट के दो प्रमुख दावेदार नजर आ रहे हैं. गुर्जर समाज से आने वाले मनोज चौधरी और मुस्लिम समाज से माविया अली. स्थानीय जानकारों का विश्लेषण कहता है कि 'अगर समाजवादी पार्टी गुर्जर कार्ड खेलते हुए मनोज चौधरी को मैदान में उतारती है तो कुंवर बृजेश सिंह और मनोज चौधरी के बीच बेहद कड़ा और सीधा मुकाबला देखने को मिलेगा. गुर्जर-मुस्लिम-यादव का यह गठजोड़ बीजेपी के पसीने छुड़ा सकता है. लेकिन अगर सपा किसी अन्य को टिकट देती है तो योगी लहर और सत्ता के दम पर कुंवर बृजेश सिंह के लिए राह बहुत आसान हो जाएगी, क्योंकि बीएसपी का जनाधार फिलहाल खिसक चुका है. हालांकि गलियारों में एक और नए समीकरण की सुगबुगाहट तेज है. चर्चा है कि यदि उत्तर प्रदेश में असदुद्दीन ओवैसी और मायावती (BSP) का गठबंधन हो जाता है और वे देवबंद से कोई मजबूत कैंडिडेट उतार देते हैं, तो मुस्लिम वोटों में बड़ी सेंधमारी होगी. ऐसी स्थिति में चुनाव फिर से त्रिकोणीय हो जाएगा जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिल सकता है.
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