Allahabad South Assembly Election 2027: उत्तर प्रदेश की सियासत में कुछ नेता ऐसे होते हैं जिनके लिए पार्टियां सिर्फ एक सिंबल होती हैं उनका असली सिक्का चलता है उनके अपने रसूख और चुनावी मैनेजमेंट पर. ऐसे ही एक कद्दावर नेता हैं योगी सरकार के कैबिनेट मंत्री नंदगोपाल गुप्ता नंदी. प्रयागराज की शहर दक्षिणी विधानसभा सीट से दो बार के विधायक नंदी के बारे में स्थानीय लोग कहते हैं कि उन्हें चुनाव जीतने का 'ककहरा' मालूम है. इसके लिए फिर चाहे साम-दाम-दंड-भेद कुछ भी अपनाना पड़े. बसपा से कांग्रेस और फिर बीजेपी का दामन थामने वाले नंदी का दबदबा आज भी कायम है. लेकिन क्या साल 2027 के विधानसभा चुनाव में नंदी अपना यह किला बचा पाएंगे? आज बात इसी हॉट सीट की जहां बीजेपी के विकास दावों और सपा की घेराबंदी के बीच मुकाबला बेहद दिलचस्प हो चुका है.
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केसरीनाथ त्रिपाठी का गढ़ और नंदी का 'दलबदल' रसूख
प्रयागराज की शहर दक्षिणी सीट को पारंपरिक रूप से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का गढ़ माना जाता है. इस सीट पर कभी बीजेपी के दिग्गज नेता और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष स्वर्गीय केसरीनाथ त्रिपाठी का एकछत्र राज हुआ करता था (जैसे 2002 का चुनाव). लेकिन 2007 में नंदगोपाल नंदी ने बसपा के टिकट पर यहां एंट्री मारी और केसरीनाथ त्रिपाठी को हराकर सबको चौंका दिया.
2007: नंदगोपाल नंदी (बसपा) जीते.
2012: परवेज अहमद टंकी (सपा) जीते.
2017 और 2022: नंदगोपाल नंदी (बीजेपी) लगातार दो बार जीते.
दिलचस्प बात यह है कि नंदी ने भले ही अपनी राजनीतिक पार्टियां बदलीं. लेकिन इस सीट पर उनका व्यक्तिगत दबदबा और वोटरों से जुड़ाव कम नहीं हुआ.
बीजेपी का 'विजन 2047' बनाम सपा का 'एंटी-इंकंबेंसी' दांव
2027 की तैयारियों को लेकर इस सीट पर सियासी पारा अभी से चढ़ने लगा है. बीजेपी के महानगर अध्यक्ष का दावा है कि मोदी-योगी सरकार के विकास कार्यों के सामने विपक्ष कहीं नहीं टिकतायउनका कहना है, "अखिलेश यादव की सरकार में गुंडई और लूटपाट चरम पर थी जिससे तंग आकर जनता ने बीजेपी को चुना. हम सिर्फ चुनाव के वक्त काम नहीं करते हमारी तैयारी 2027 या 2032 की नहीं बल्कि 2047 तक की है. चुनाव खत्म होते ही हम अगले दिन से जनता की समस्याओं को दूर करने में लग जाते हैं."
दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी के नेताओं का मानना है कि डबल इंजन सरकार की जनविरोधी नीतियों से जनता त्रस्त हो चुकी है. किसान, बेरोजगार नौजवान, छोटे व्यापारी और उद्यमी सभी परेशान हैं. जनता इस बार अखिलेश यादव की सरकार बनाने का मन बना चुकी है और 2027 में सपा यहां भारी मतों से जीत दर्ज करेगी.
जब हारते-हारते बचे थे नंदी!
स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों और पत्रकारों की मानें तो 2027 की राह नंदी के लिए इतनी आसान नहीं होने वाली क्योंकि 2022 के चुनाव में उन्हें सपा के रईस शुक्ला ने कड़ी टक्कर दी थी.
क्या कहते हैं स्थानीय पत्रकार?
"पिछली बार नंदी हारते-हारते बचे थे. कहा जाता है कि विधानसभा के कुल 400 बूथों में से करीब 300 बूथों पर उन्हें शिकस्त का सामना करना पड़ा था. लेकिन नैनी क्षेत्र के जो 100 बूथ थे, वहां खेल पलट गया. उन 100 में से करीब 95 बूथों पर नंदी को एकतरफा वोट मिले जिसने उनकी नैया पार लगा दी और बाकी सारे घाटे को कवर कर दिया."
नंदी की यूएसपी
वैसे तो वैश्य और ब्राह्मण वोट सीधे तौर पर बीजेपी से जुड़ते हैं. लेकिन जब नंदगोपाल नंदी मैदान में होते हैं, तो वह अपनी पुरानी बसपा पृष्ठभूमि के कारण दलित वोटों में और अपने व्यक्तिगत संपर्कों के दम पर मुस्लिम वोटों में भी सेंधमारी करने का हुनर रखते हैं. यही उनकी जीत का सबसे बड़ा फॉर्मूला रहा है.
क्या त्रिकोणीय मुकाबला बदलेगा खेल?
स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि इस बार मामला बेहद टाइट है. अगर समाजवादी पार्टी इस सीट पर किसी मजबूत मुस्लिम चेहरे को प्रत्याशी बनाती है तो करीब 70-80 हजार मुस्लिम वोट एकमुश्त जुड़ने से सपा स्वतः ही बेहद मजबूत स्थिति में आ जाएगी. इसके अलावा, यदि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) भी यहां मजबूती से चुनाव लड़ती है और मुकाबला त्रिकोणीय हो जाता है तो वोटों का बिखराव नंदी के समीकरण को बिगाड़ भी सकता है और बना भी सकता है. अब देखना यह होगा कि 2027 में बीजेपी नंदी पर ही भरोसा जताती है या नहीं, और विपक्ष उनके इस चक्रव्यूह को भेदने के लिए क्या रणनीति अपनाता है.
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