Manoj Pandey Cabinet Minister: यूपी की सियासत में 'ब्राह्मण कार्ड' और रायबरेली के 'चाणक्य' कहे जाने वाले मनोज पांडे अब योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री बन चुके हैं. लेकिन, उनकी यह ग्रैंड एंट्री जितनी शानदार है, उतनी ही कांटों भरी भी नजर आ रही है. एक तरफ समाजवादी पार्टी में उनके अपनों का दर्द छलक रहा है, तो दूसरी तरफ बीजेपी के भीतर से ही बगावत की पहली चिंगारी फूट पड़ी है.
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सपा के मुख्य सचेतक से बीजेपी के कैबिनेट मंत्री तक, मनोज पांडे की एंट्री से भूचाल
योगी मंत्रिमंडल का विस्तार होते ही जिस चेहरे की सबसे ज्यादा चर्चा है, वह है मनोज पांडे. रायबरेली की ऊंचाहार सीट से लगातार जीत दर्ज करने वाले मनोज पांडे ने जब से सनातन और रामचरितमानस के सम्मान का हवाला देकर पाला बदला है, तब से वह अखिलेश यादव के निशाने पर हैं. लेकिन अब, मंत्री बनते ही उनके लिए अपनों के साथ-साथ नयों से निपटना भी बड़ी चुनौती बन गया है.
बीजेपी विधायक आशा मौर्य का फेसबुक बम
मनोज पांडे के शपथ लेते ही बीजेपी के भीतर से विरोध के सुर सुनाई देने लगे हैं. सीतापुर के महमूदाबाद से बीजेपी विधायक आशा मौर्य ने सोशल मीडिया पर एक विस्फोटक पोस्ट साझा की. उन्होंने लिखा, "यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भाजपा को समर्पित निष्ठावान कार्यकर्ताओं (विशेषकर मौर्य समाज) की आवश्यकता नहीं दिखाई दे रही है, बल्कि बाहर से आए बागी और दलबदलू नेताओं को प्राथमिकता दी जा रही है." हालांकि, बाद में उन्होंने पोस्ट एडिट कर दी, लेकिन इसने बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग और कार्यकर्ताओं की नाराजगी को जगजाहिर कर दिया है.
कैसा है मनोज पांडे का सियासी रसूख?
मनोज पांडे कभी मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी और विधानसभा में सपा के मुख्य सचेतक हुआ करते थे. एक समय उन्हें सपा से निष्कासित किया गया था, लेकिन नेताजी के आशीर्वाद से उनकी ऐसी वापसी हुई कि वह अखिलेश के सबसे खास बन गए. मनोज पांडे की राजनीति का सबसे बड़ा मोड़ उनके भाई राकेश पांडे की हत्या थी, जिसके बाद उपजी सहानुभूति ने उन्हें रायबरेली का बड़ा चेहरा बना दिया. मनोज पांडे का दावा है कि स्वामी प्रसाद मौर्य द्वारा रामचरितमानस पर दिए गए बयानों से वह आहत थे, जिसके बाद उन्होंने राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग की और 'कमल' थाम लिया.
रायबरेली का नया समीकरण, दोस्त बने पुराने दुश्मन
मनोज पांडे के मंत्री बनने से रायबरेली की सियासत पूरी तरह बदल गई है. कभी एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे (अदिति के पिता पर मनोज के भाई की हत्या का आरोप था) अब एक ही पाले में हैं. माना जा रहा है कि मनोज पांडे को कैबिनेट मंत्री बनाकर बीजेपी ने जिले में दिनेश प्रताप सिंह के कद को संतुलित करने की कोशिश की है.
क्या 2027 की डगर आसान होगी?
मनोज पांडे के लिए असली चुनौती मिशन 2027 है. ऊंचाहार सीट पर करीब 70 हजार यादव और मुस्लिम मतदाता हैं, जो सपा का कोर बैंक माना जाता है. क्या मनोज पांडे बीजेपी के टिकट पर इस किले को फतह कर पाएंगे? साथ ही, उनके अपने परिवार (भाभी और भतीजे) द्वारा लगाए गए 'मौकापरस्ती' के आरोपों का उन पर क्या असर पड़ेगा, यह देखना दिलचस्प होगा.
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