Khatauli Vidhan Sabha 2027: पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत में मुजफ्फरनगर की खतौली विधानसभा सीट हमेशा से सत्ता का थर्मामीटर रही है. यह वही सीट है जहां कभी अखिलेश यादव, जयंत चौधरी और चंद्रशेखर आजाद ने मिलकर एक ऐसा जादुई चुनावी फॉर्मूला तैयार किया था जिसने मुजफ्फरनगर दंगों के बाद उभरे बीजेपी के अजेय रथ को उपचुनाव में रोक दिया था. लेकिन आज खतौली की सियासत पूरी तरह करवट ले चुकी है. राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) अब बीजेपी के पाले में है जबकि समाजवादी पार्टी और चंद्रशेखर आजाद की राहें जुदा हैं. 'यूपी किसका के इस खास विश्लेषण में आज हम डिकोड करेंगे कि आरएलडी के पाला बदलने के बाद खतौली का समीकरण क्या मोड़ ले रहा है और यहां के मौजूदा बाहुबली विधायक मदन भैया का भविष्य क्या होने वाला है.
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खतौली का इतिहास
खतौली विधानसभा सीट को ऐतिहासिक रूप से राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) की परंपरागत सीट माना जाता रहा है. साल 2002 में यहां से आरएलडी के राजपाल सिंह बालियान जीते थे. लेकिन 2014 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद इस क्षेत्र का पूरा सियासी ताना-बाना बदल गया. दंगों के बाद उभरे ध्रुवीकरण के दौर में बीजेपी की यहां मजबूत एंट्री हुई और दंगे के आरोपी विक्रम सैनी ने साल 2017 और 2022 के मुख्य चुनाव में बीजेपी के टिकट पर लगातार जीत दर्ज की.
कहानियों में मोड़ तब आया जब 2022 के चुनाव जीतने के कुछ ही समय बाद कोर्ट ने विक्रम सैनी को दंगे के मामले में सजा सुना दी, जिससे उनकी विधायकी चली गई. इसके बाद हुए हाई-प्रोफाइल उपचुनाव में सपा-आरएलडी और आजाद समाज पार्टी के मजबूत त्रिकोण ने मिलकर बाहुबली मदन भैया को आरएलडी के टिकट पर मैदान में उतारा. मदन भैया ने विक्रम सैनी की पत्नी (बीजेपी प्रत्याशी) को हराकर यह सीट विपक्ष की झोली में डाल दी थी.
किसके पास कितनी ताकत?
खतौली में आरएलडी की ताकत हमेशा 'अजगर' (अहीर, जाट, गुर्जर, राजपूत) और मुस्लिम गठजोड़ पर टिकी रही है. अगर इस सीट के अनुमानित जातिगत आंकड़ों पर नजर डालें, तो यहां का समीकरण किसी भी दल का खेल बनाने और बिगाड़ने का दम रखता है.
मुस्लिम: करीब 89,000 से 90,000 (सबसे बड़ी संख्या)
जाट: करीब 61,000
सैनी: करीब 24,000
जाटव (दलित): करीब 23,000
क्षत्रिय (ठाकुर): करीब 19,000
कश्यप: करीब 15,000
पाल: करीब 12,000
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जब भी चुनाव 'हिंदू बनाम मुस्लिम' के ध्रुवीकरण पर जाता है तो बीजेपी को सीधा फायदा होता है. लेकिन अगर जाट, गुर्जर, कश्यप और ठाकुर वोटों में बिखराव होता है तो समीकरण पूरी तरह बदल जाते हैं. पिछले उपचुनाव में जाट, सैनी, ठाकुर और मुस्लिम वोटों का एक बड़ा हिस्सा मदन भैया के पक्ष में गया था जिससे उनकी जीत आसान हो गई थी.
बीजेपी और सपा के अपने-अपने बड़े दावे
आरएलडी के एनडीए (NDA) में शामिल होने के बाद बीजेपी बेहद गदगद है. बीजेपी नेताओं का कहना है 'खतौली उपचुनाव में जो भी चूक हमसे हुई थी, उसे हमने स्वीकार किया है. लेकिन आगामी विधानसभा चुनाव के लिए हमारी तैयारी पूरी है. केंद्र और प्रदेश सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के दम पर हम प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंच रहे हैं. अब मोदी-योगी के नाम पर पूरा जनसमर्थन हमारे साथ है और हम प्रचंड बहुमत से खतौली जीतेंगे.'
दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी आरएलडी के जाने के बाद भी डिगने को तैयार नहीं है. सपा खेमे का तर्क है 'खतौली विधानसभा में बूथ स्तर तक हमारा ढांचा बेहद मजबूत है. लोकसभा चुनाव में हम यहां महज 3,000 वोटों से पीछे थे. आज जनता बेरोजगारी, बिजली संकट और किसानों की कर्जमाफ़ी जैसे मुद्दों पर त्रस्त है. सरकार ने जो वादे किए थे वे अधूरे हैं. इसलिए जनता इस बार बदलाव के लिए सपा को वोट करेगी.'
स्थानीय पत्रकारों का आकलन
खतौली के ग्राउंड रियलिटी और राजनीतिक भविष्य को लेकर स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि वर्तमान विधायक मदन भैया को लेकर क्षेत्र की जनता में भारी नाराजगी है. स्थानीय लोगों की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि चुनाव जीतने के बाद मदन भैया क्षेत्र में दिखाई नहीं देते और जनता के काम के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं होते. पत्रकारों के मुताबिक, अभी तक किसी भी पार्टी से टिकट की तस्वीर साफ नहीं है.
बीजेपी-आरएलडी गठबंधन: चूंकि आरएलडी अब बीजेपी के साथ है, तो यह सीट किसके खाते में जाएगी, यह बड़ा सस्पेंस है. बीजेपी से पूर्व विधायक विक्रम सैनी, पूर्व सांसद राजपाल सैनी और मौजूदा जिला अध्यक्ष सुधीर सैनी (सैनी बाहुल्य होने के कारण) रेस में हैं.
समाजवादी पार्टी: सपा की तरफ से फिलहाल केवल श्यामलाल बच्ची सैनी का नाम चर्चाओं में चल रहा है.
बहुजन समाज पार्टी: बीएसपी का फिलहाल जमीन पर कोई मजबूत अता-पता नजर नहीं आ रहा है.
आरएलडी के पाला बदलने और त्रिकोणीय गठबंधन के बिखरने के बाद खतौली विधानसभा सीट का मुकाबला बेहद दिलचस्प और त्रिशंकु मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है. ठाकुर, जाट और मुस्लिम बाहुल्य वाले इस क्षेत्र में मदन भैया की व्यक्तिगत नाराजगी और नए गठबंधनों के दौर में यह सीट आगामी विधानसभा चुनाव में कांटे की टक्कर का गवाह बनने जा रही है.
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