प्रह्लाद जोशी और धर्मेंद्र प्रधान की वो 5 बातें जो हैं बिल्कुल एक जैसी! दोनों में से पहले कौन बना था सांसद?

आयशा शेख़

• 02:22 PM • 27 Jul 2026

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है. दोनों भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं, लेकिन उनके राजनीतिक सफर, शिक्षा, मंत्रालयों का अनुभव और कार्यशैली में कई अहम अंतर हैं.

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Pralhad Joshi vs Dharmendra Pradhan: देश की राजनीति में इन दिनों दो नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं- प्रह्लाद जोशी और धर्मेंद्र प्रधान. इसकी वजह है शिक्षा मंत्रालय में हुआ बड़ा बदलाव. धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई है.

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दोनों ही भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ चेहरे हैं. दोनों कई बार सांसद चुने जा चुके हैं, दोनों केंद्र सरकार में अहम मंत्रालय संभाल चुके हैं और संगठन में भी उनकी मजबूत पकड़ रही है. आखिर दोनों में क्या समानताएं हैं और सबसे बड़े अंतर क्या हैं? आइए आसान भाषा में पूरा प्रोफाइल समझते हैं.

कौन हैं प्रह्लाद जोशी?

प्रह्लाद वेंकटेश जोशी कर्नाटक के वरिष्ठ भाजपा नेता हैं. उनका जन्म 27 नवंबर 1962 को कर्नाटक के विजयपुर (तत्कालीन बीजापुर) में हुआ था. उन्होंने कर्नाटक यूनिवर्सिटी से संबद्ध केएस आर्ट कॉलेज, हुबली से बीए (B.A.) की पढ़ाई की. शुरुआती दिनों में वे सामाजिक कार्यों और बाद में राजनीति से जुड़े.

राष्ट्रीय राजनीति में उनकी पहचान एक शांत,  लेकिन मजबूत संगठनकर्ता के रूप में रही है. वे 2004 से लगातार धारवाड़ लोकसभा सीट से सांसद चुने जाते रहे हैं और पांच बार लोकसभा पहुंचे हैं.

प्रह्लाद जोशी का राजनीतिक करियर

  • RSS से जुड़े और बाद में भाजपा में सक्रिय राजनीति शुरू की.
  • 1998-2003 के दौरान भाजपा धारवाड़ जिला इकाई के महासचिव रहे.
  • 2004 में पहली बार लोकसभा सांसद बने.
  • इसके बाद लगातार पांच बार सांसद चुने गए.
  • मोदी सरकार में संसदीय कार्य, कोयला, खान, उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा जैसे अहम मंत्रालय संभाले.
  • जुलाई 2026 में उन्हें शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया.

कौन हैं धर्मेंद्र प्रधान?

धर्मेंद्र प्रधान ओडिशा के प्रमुख भाजपा नेता हैं. उनका जन्म 26 जून 1969 को ओडिशा के तलचर में हुआ. उनके पिता देबेंद्र प्रधान भी बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे हैं.

धर्मेंद्र प्रधान ने उत्कल विश्वविद्यालय से मानवशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएशन (M.A.) किया. छात्र राजनीति से शुरुआत करने के बाद वे भाजपा और भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के जरिए राष्ट्रीय राजनीति में पहुंचे.

धर्मेंद्र प्रधान का राजनीतिक करियर

  • ABVP और छात्र राजनीति से शुरुआत.
  • BJYM में राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदारियां संभालीं.
  • राज्यसभा और बाद में लोकसभा के सदस्य रहे.
  • पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री रहे.
  • कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय भी संभाला.
  • 2021 से शिक्षा मंत्री के रूप में नई शिक्षा नीति (NEP) लागू कराने, डिजिटल शिक्षा और कई शिक्षा सुधारों पर काम किया.
  • जुलाई 2026 में शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दिया.

दोनों नेताओं में समानताएं

  1. दोनों लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हैं और संगठन में मजबूत पकड़ रखते हैं.
  2. दोनों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में कई महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले हैं.
  3. दोनों नेताओं का राजनीतिक सफर संगठनात्मक राजनीति यानी आरएसएस से शुरू हुआ और धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा.
  4. दोनों कई वर्षों से संसद में सक्रिय हैं और संसदीय प्रक्रियाओं का अच्छा अनुभव रखते हैं.
  5. दोनों नेता 2004 में पहली बार लोकसभा पहुंचे थे. 

दोनों में सबसे बड़े अंतर

धर्मेंद्र प्रधान की पहचान नीति निर्माण और शिक्षा, ऊर्जा तथा कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले नेता की रही है. वहीं प्रह्लाद जोशी को संसदीय प्रबंधन, संगठन और प्रशासनिक समन्वय के लिए जाना जाता है.

धर्मेंद्र प्रधान ने पोस्ट ग्रेजुएशन किया है, जबकि प्रह्लाद जोशी स्नातक (B.A.) हैं. धर्मेंद्र प्रधान का राजनीतिक आधार ओडिशा है, जबकि प्रह्लाद जोशी कर्नाटक की राजनीति से राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे.

धर्मेंद्र प्रधान का अनुभव शिक्षा, पेट्रोलियम और स्किल डेवलपमेंट जैसे नीति-आधारित मंत्रालयों में ज्यादा रहा है. प्रह्लाद जोशी ने संसदीय कार्य, कोयला, खान, उपभोक्ता मामले और ऊर्जा जैसे प्रशासनिक मंत्रालयों में काम किया है.

अब सबसे बड़ी चुनौती क्या?

धर्मेंद्र प्रधान के बाद शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी ऐसे समय में प्रह्लाद जोशी को मिली है, जब शिक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर सरकार पर लगातार नजर बनी हुई है. ऐसे में उनके सामने सिर्फ मंत्रालय संभालना ही नहीं, बल्कि भरोसा कायम रखना भी बड़ी चुनौती होगी.