Mood kya hai Jalaun: जालौन में सपा बढ़ा सकती है बीजेपी की टेंशन, ग्राउंड पर मौजूद पत्रकारों ने क्या बताया?

अलीम सिद्दीकी

• 07:12 PM • 05 Aug 2026

Mood Kya Hai Jalaun: 2027 विधानसभा चुनाव से पहले जालौन का सियासी मूड बदलता दिख रहा है. जानिए उरई, कालपी और माधौगढ़ सीटों के जातीय समीकरण, प्रमुख चुनावी मुद्दे, बीजेपी-सपा की रणनीति और स्थानीय पत्रकारों का जमीनी विश्लेषण.

Mood kya hai jalaun

Mood kya hai jalaun

Google CTA

Mood kya hai Jalaun: बुंदेलखंड का प्रवेश द्वार माना जाने वाला जालौन जिला उत्तर प्रदेश की सियासत में हमेशा से एक अलग अहमियत रखता है. कभी कांशीराम के दौर में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का सबसे मजबूत किला रहा यह जिला समय के साथ भाजपा और बसपा की जंग का केंद्र बना. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में आए सियासी भूचाल के बाद अब 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर यहां का राजनीतिक मिजाज पूरी तरह बदल चुका है. स्थानीय पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार अब जालौन में बसपा का जनाधार खिसक चुका है और मुख्य मुकाबला सीधे 'भाजपा बनाम सपा के बीच सिमट गया है. यूपी Tak ने जालौन के वरिष्ठ पत्रकारों के साथ बातचीत कर उरई, कालपी और माधौगढ़ विधानसभा सीटों के जमीनी मूड और जातीय समीकरणों की पड़ताल की.

यह भी पढ़ें...

2017 से 2024: कैसे बदले जालौन के सियासी समीकरण?

2017 और 2019 के चुनावों में जालौन जिले की तीनों विधानसभा सीटों (उरई, कालपी और माधौगढ़) पर भारतीय जनता पार्टी का एकतरफा कब्जा था. हालांकि 2022 के विधानसभा चुनाव में कालपी सीट पर सपा के विनोद चतुर्वेदी ने जीत दर्ज की (हालांकि वह भाजपा समर्थित निषाद पार्टी के खाते में दर्ज की गई सीट थी, जिसे भाजपा अपनी गफलत मानती है). इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में बुंदेलखंड की हवा बदली और जालौन की 5 में से 4 लोकसभा विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा.

स्थानीय पत्रकारों का विश्लेषण

वरिष्ठ पत्रकार केपी सिंह के अनुसार 'उरई विधानसभा क्षेत्र में स्थानीय प्रत्याशी या चेहरे का कोई खास महत्व नहीं होता, यहां लोग दलों के आधार पर वोट करते हैं. जालौन कभी बसपा का पहला गढ़ हुआ करता था. लेकिन टिकट वितरण में ओबीसी की जगह सवर्णों को प्राथमिकता देने और मुस्लिम वोट बैंक छिटकने से बसपा का जनाधार लगभग शून्य हो गया है. अब लड़ाई सीधे सपा और भाजपा के बीच है. यदि किसी सीट पर एक ही जाति के दो प्रत्याशी खड़े होते हैं तो परंपरागत वोट बैंक अपनी प्राथमिकता वाले दल (जैसे भाजपा) की ओर शिफ्ट हो जाता है.'

कालपी का '84 गांव' फैक्टर और व्यक्तिगत प्रभाव

कालपी विधानसभा सीट का गणित पूरे जिले से थोड़ा अलग है. यहां प्रत्याशी का व्यक्तिगत प्रभाव और स्थानीय जातीय गोलबंदी काफी मायने रखती है.

84 गांव का ठाकुर समीकरण: वरिष्ठ पत्रकार राकेश द्विवेदी और मनोज जी बताते हैं कि जालौन में ठाकुर समाज के विशेष '84 गांव' हैं. कालपी सीट पर यदि 84 गांव क्षेत्र से कोई ठाकुर उम्मीदवार आता है (चाहे वह किसी भी दल से हो), तो वह सीधे मुख्य मुकाबले में आ जाता है.

ओबीसी और पाल कार्ड: सपा यदि कालपी और माधौगढ़ में बैकवर्ड या पाल चेहरा (जैसे श्री रामपाल या रश्मि पाल) उतारती है तो पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का कार्ड वहां काफी असरदार साबित हो सकता है.

2027 के चुनाव में हावी रहेंगे ये 4 बड़े मुद्दे

पत्रकारों के पैनल ने 2027 के चुनाव को प्रभावित करने वाले मुख्य मुद्दों के बारे में बात की.

मुफ्त राशन बनाम युवाओं का रुख: बुजुर्ग और सिंगल परिवार जहां राशन और किसान सम्मान निधि को तरजीह दे रहे हैं. वहीं युवा मतदाता बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं की धांधली और आरक्षण के मुद्दों को लेकर काफी मुखर हैं.

धार्मिक और सामाजिक ध्रुवीकरण: जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और स्थानीय मुद्दों को लेकर युवाओं में एक अलग नाराजगी देखी जा रही है.

भाजपा की अंदरूनी गुटबाजी: 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के अंदरूनी भितरघात और गुटबाजी का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा था.

सपा का 'पीडीए' और संविधान रक्षा का नैरेटिव: लोकसभा चुनाव में चला सपा का 'संविधान बचाओ' और 'पीडीए' का नारा अब भी पिछड़े और दलित मतदाताओं के बीच प्रासंगिक बना हुआ है.