उत्तर प्रदेश की राजनीति में बयानबाजी नई नहीं है. लेकिन कुछ बयान ऐसे होते हैं जो केवल सुर्खियां नहीं बनाते, बल्कि अपने आप में कई सवाल भी खड़े कर देते हैं. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर कई आरोप लगाए. लेकिन, इन आरोपों को सुनते समय यह सवाल स्वतः उठता है कि क्या वे उस अतीत को पूरी तरह भूल चुके हैं. जब उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था ‘नकल माफिया’, ‘पेपर लीक’ और ‘पर्ची-खर्ची’ जैसे शब्दों के साथ जुड़कर पहचानी जाती थी. आज जिस व्यवस्था पर सवाल उठाए जा रहे हैं, वही व्यवस्था पिछले 9 वर्षों में बुनियादी ढांचे, पारदर्शिता और तकनीक आधारित सुधारों के माध्यम से एक नए ढांचे में ढलती हुई दिखाई देती है. इसलिए यह तुलना केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि वास्तविकताओं के आधार पर भी जरूरी हो जाती है.
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बेसिक शिक्षा बना व्यवस्थित ढांचे का आधार
शिक्षा की नींव प्राथमिक स्तर पर ही रखी जाती है और प्रदेश में लंबे समय तक यही स्तर सबसे अधिक उपेक्षा का शिकार रहा. स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी, अव्यवस्थित ढांचा और योजनाओं का सीमित प्रभाव, यह सब उस दौर की वास्तविकता का हिस्सा था. लेकिन बीते वर्षों में ‘ऑपरेशन कायाकल्प’ के तहत 1.32 लाख परिषदीय विद्यालयों को कवर किया गया और बुनियादी सुविधाओं का संतृप्ति स्तर 36 प्रतिशत से बढ़कर 96.30 प्रतिशत तक पहुंच गया.
यह परिवर्तन केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि उस व्यवस्था में दिखाई देता है जहां अब विद्यालयों में डेस्क-बेंच, शौचालय और पेयजल जैसी सुविधाएं सामान्य रूप से उपलब्ध हैं. इसी के साथ, प्रतिवर्ष 1.30 करोड़ से अधिक विद्यार्थियों को 1200 रुपये प्रति छात्र डीबीटी के माध्यम से सीधे उनके खातों में भेजा जा रहा है.इस व्यवस्था ने न केवल पारदर्शिता बढ़ाई है, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया है कि लाभ सीधे छात्रों तक पहुंचे, बिना किसी मध्यस्थ के हस्तक्षेप के.
कम्पोजिट विद्यालय बनेंगे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का केन्द्र
शिक्षा के क्षेत्र में अक्सर योजनाएं बनती हैं. लेकिन उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वे जमीन पर कितनी प्रभावी ढंग से लागू होती हैं. ऐसे में पूर्ववर्ती सरकारों की अपेक्षा योगी सरकार की कार्यप्रणाली उसे अलग लीग में शामिल कर चुकी है. प्रदेश के 75 जनपदों में 150 मुख्यमंत्री मॉडल कम्पोजिट विद्यालय (प्री-प्राइमरी से कक्षा 12) स्थापित किए जा रहे हैं जिनमें से 141 के लिए भूमि चयन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है. इसके अतिरिक्त 75 मुख्यमंत्री अभ्युदय कम्पोजिट विद्यालय आधुनिक सुविधाओं के साथ विकसित किए जा चुके हैं. यह पहल शिक्षा को एक समेकित ढांचे में विकसित करने का प्रयास है, जहां छात्र-छात्राओं को प्रारंभिक से लेकर उच्चतर स्तर तक एक ही परिसर में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके.
भर्ती प्रक्रिया: जहां ‘प्रभाव’ से ‘पारदर्शिता’ तक दिखता है बदलाव
शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता का सीधा संबंध शिक्षकों से होता है और यही वह क्षेत्र है जहां पारदर्शिता सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है. पिछले वर्षों में बेसिक विद्यालयों में 1.26 लाख से अधिक शिक्षकों की नियुक्ति की गई है. जबकि अशासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में 34,074 शिक्षकों का चयन किया गया है. इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के माध्यम से 6,808 सहायक अध्यापक, 2,069 प्रवक्ता और 326 प्रधानाचार्य सहित कुल 9,191 अभ्यर्थियों की नियुक्ति की गई है. यह वही क्षेत्र है जहां पहले सिफारिश, प्रभाव और कथित अनियमितताओं की चर्चा आम थी. आज वही प्रक्रिया एक निर्धारित, पारदर्शी और योग्यता आधारित ढांचे में संचालित होती दिखाई देती है.
नकल संस्कृति: अतीत की छाया और वर्तमान की दिशा
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि उत्तर प्रदेश में सपा की सरकारों में शिक्षा व्यवस्था के संदर्भ में ‘मास नकल’ और ‘पेपर लीक’ जैसे शब्द किसी समय आम चर्चा का हिस्सा थे. आज प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाने वाले अखिलेश शायद यह भूल रहे हैं कि उनके कार्यकाल में परीक्षा केंद्रों की विश्वसनीयता पर न केवल सवाल उठते थे बल्कि पूरी व्यवस्था की गंभीरता पर भी प्रश्नचिह्न लगता था. ऐसे परिदृश्य में वर्तमान व्यवस्था को समझना आवश्यक है, जहां परीक्षा और भर्ती प्रक्रियाओं को नियंत्रित, व्यवस्थित और पारदर्शी बनाने पर विशेष जोर दिया गया है. यह बदलाव केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि मानसिकता के स्तर पर भी दिखाई देता है जहां शिक्षा को औपचारिकता नहीं, बल्कि गुणवत्ता के साथ जोड़कर देखा जा रहा है.
अटल आवासीय विद्यालय: समावेशी शिक्षा की दिशा में ठोस कदम
शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होता है जब वह समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे. प्रदेश में 18 मंडलों में अटल आवासीय विद्यालय स्थापित किए गए हैं, जहां वंचित और श्रमिक परिवारों के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान की जा रही है. यह पहल इस बात का संकेत है कि शिक्षा को केवल नीति नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव के साधन के रूप में देखा जा रहा है. इतना ही नहीं, उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी उत्तर प्रदेश ने एक विस्तारित ढांचा तैयार किया है. वर्तमान में 38 राज्य विश्वविद्यालय, 1 डीम्ड विश्वविद्यालय, 1 मुक्त विश्वविद्यालय और 52 निजी विश्वविद्यालय संचालित हैं.
‘एक जिला - एक विश्वविद्यालय’ के लक्ष्य की ओर बढ़ी योगी सरकार
मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ का मानना है कि प्रदेश के सभी जनपदों में अच्छी शिक्षण व्यवस्थाएं होनी चाहिए. निश्चित तौर पर, विश्वविद्यालय इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. ‘एक जिला - एक विश्वविद्यालय’ का लक्ष्य इसी सोच का विस्तार है, जो उच्च शिक्षा को अधिक सुलभ और व्यापक बनाने की दिशा में काम कर रहा है. यह प्रयास केवल संख्या बढ़ाने का नहीं, बल्कि अवसरों का दायरा विस्तारित करने का है.
आरोपों के बीच उभरती उन्नति की स्पष्ट तस्वीर
अखिलेश यादव की बयानबाजी भले ही एक पल के लिए राजनीतिक तौर पर मनोरंजन का साधन बन सकती है. मगर जब उन्हें जमीनी आंकड़ों और वास्तविक बदलावों के साथ देखा जाता है, तो तस्वीर एकदम साफ और स्पष्ट हो जाती है. एक ओर वह दौर था, जहां शिक्षा व्यवस्था की पहचान अव्यवस्था, नकल और अनियमितताओं से जुड़ी थी. वहीं, दूसरी ओर आज का समय है, जहां पारदर्शिता, बुनियादी ढांचे और तकनीक आधारित सुधार प्रमुख हैं. यह फर्क केवल समय का नहीं है, बल्कि सोच और प्राथमिकताओं का है और शायद यही कारण है कि आज उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था राजनीतिक आरोपों से ज्यादा अपने बदलाव की गाथा के लिए चर्चा में है, जहां परिणाम स्वयं अपनी कहानी पूरी दृढ़ता और सामर्थ्य से कह रहे हैं.
लेखक: डॉ. विनम्रसेन सिंह (असिस्टेंट प्रोफेसर, इलाहाबाद विश्वविद्यालय)
Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.
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