पांच बार से मुख्तार और अब उनके बेटे विधायक...2027 विधानसभा चुनाव में क्या अब्बास अंसारी बचा पाएंगे अपनी कुर्सी

UP Kiska: यूपी तक के शो 'यूपी किसका' में मऊ सदर का सियासी विश्लेषण. मुख्तार अंसारी के निधन के बाद क्या उनके बेटे अब्बास अंसारी बचा पाएंगे अपना किला? जानें मऊ का जातीय समीकरण और बीजेपी-सुभासपा की नई रणनीति.

Mukhtar Ansari and his son

रजत सिंह

• 05:41 PM • 02 Apr 2026

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UP Kiska: उत्तर प्रदेश की राजनीति में मऊ सदर एक ऐसी विधानसभा सीट है जिसकी पहचान पिछले दो दशकों से 'अंसारी परिवार' के अभेद्य किले के रूप में रही है. पांच बार मुख्तार अंसारी और अब उनके बेटे अब्बास अंसारी यहां से विधायक हैं. लेकिन मुख्तार अंसारी के निधन और बदलते सियासी समीकरणों के बीच सवाल यह है कि क्या 2027 में इस किले में सेंध लग पाएगी?

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दल बदलते रहे पर नहीं बदला विधायक

मऊ सदर की सियासत का दस्तूर निराला है. यहां मुख्तार अंसारी ने निर्दलीय, कौमी एकता दल और बसपा जैसे अलग-अलग झंडों के नीचे चुनाव लड़ा.लेकिन जीत का सिलसिला कभी नहीं टूटा. 2022 में विरासत बेटे अब्बास अंसारी को मिली जो सुभासपा (SBSP) के टिकट पर विधायक बने. अब जबकि ओम प्रकाश राजभर की पार्टी NDA का हिस्सा है. मऊ की जमीन पर 'टिकट' और 'वफादारी' की नई जंग शुरू हो गई है.

समीकरणों के भंवर में फंसी मऊ सदर

मऊ सदर की सीट पर जीत-हार का फैसला यहां के खास जातीय समीकरण करते हैं.

मुस्लिम-दलित गठजोड़: यहां करीब 1 लाख मुस्लिम और 1.20 लाख दलित वोटर निर्णायक भूमिका में हैं. अंसारी परिवार को हमेशा से इस बड़े वोट बैंक का साथ मिलता रहा है.

रॉबिनहुड वाली छवि: दुनिया जिसे बाहुबली कहती है.मऊ के एक बड़े वर्ग में मुख्तार की छवि 'रॉबिनहुड' की रही है जिसका फायदा उनके परिवार को हर चुनाव में मिलता है.

बीजेपी की घेराबंदी: बीजेपी के पूर्व प्रत्याशी अशोक सिंह जो पिछली बार रनर-अप रहे थे का दावा है कि इस बार 'कमल' खिलेगा. वहीं सुभासपा के स्थानीय नेता भी सीट पर अपनी दावेदारी ठोक रहे हैं. चर्चा ए.के. शर्मा के नाम की भी है जो स्थानीय होने के नाते यहां बड़ा उलटफेर कर सकते हैं.

2027 की चुनौतियां और पत्रकारों की राय

स्थानीय पत्रकारों का मानना है कि मुख्तार के न रहने से इस बार मुकाबला कड़ा होगा. सुभासपा का वोट बैंक (करीब 40,000 राजभर) अगर एनडीए के साथ जाता है तो अब्बास अंसारी के लिए राह मुश्किल हो सकती है, हालांकि नगरपालिका चुनाव में बसपा की जीत ने यह संकेत दिया है कि दलित-मुस्लिम समीकरण अब भी अंसारी परिवार या विपक्ष के पक्ष में झुक सकता है.साथ ही सवर्णों में कुछ मुद्दों को लेकर नाराजगी बीजेपी के लिए चिंता का सबब बन सकती है.