यूपी किसका: क्या ओबरा में भाजपा लगाएगी जीत की हैट्रिक? जानें क्या हैं यहं के सियासी समीकरण

UP Kiska: ओबरा विधानसभा सीट पर भाजपा की हैट्रिक या सपा का पहला मौका? राज्य मंत्री संजीव कुमार गोंड के विकास कार्यों और ओबरा के आदिवासी जातीय समीकरणों का पूरा विश्लेषण.

Sanjeev Singh BJP MLA

रजत सिंह

04 Apr 2026 (अपडेटेड: 04 Apr 2026, 03:09 PM)

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Obra Assembly Seat 2027: उत्तर प्रदेश के बिल्कुल बॉर्डर पर स्थित ओबरा विधानसभा सीट इन दिनों चर्चा का केंद्र बनी हुई है. साल 2012 में अस्तित्व में आई इस सीट पर अब तक हुए तीन चुनावों में भाजपा ने दो बार जीत दर्ज की है. जबकि समाजवादी पार्टी (सपा) को यहाँ आज तक अपनी पहली जीत का इंतजार है. वर्तमान में यहां से भाजपा के संजीव कुमार गोंड विधायक हैं, जो योगी सरकार में राज्य मंत्री भी हैं.

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आदिवासी वोट बैंक और भाजपा का अभेद्य किला

ओबरा सीट के सियासी गणित को समझें तो यहां सबसे बड़ी ताकत आदिवासी समुदाय है. भाजपा ने इस वर्ग से आने वाले संजीव कुमार गोंड को न सिर्फ मैदान में उतारा बल्कि उन्हें मंत्री बनाकर इलाके में अपनी पकड़ और मजबूत की है. 2017 और 2022 की जीत के बाद अब भाजपा यहां तीसरी बार कमल खिलाने की तैयारी में है. वहीं, विपक्ष का दावा है कि इस बार जनता बदलाव के मूड में है.

विकास के दावे बनाम विपक्ष की रणनीति

ओबरा के चुनावी रण में पक्ष और विपक्ष के अपने-अपने दावे हैं. राज्य मंत्री संजीव कुमार गोंड का कहना है कि उन्होंने क्षेत्र में बिजली, पानी और विशेष रूप से दुर्गम इलाकों में पुलों और सड़कों का जाल बिछाया है. बिजुल और रेणुका नदी पर बने पुलों ने आदिवासियों के जीवन को आसान बनाया है. उनका दावा है कि जनता उनके विकास कार्यों के आधार पर 2027 में भी उन्हें ही चुनेगी. पूर्व प्रत्याशी सुनील कुमार का आरोप है कि भाजपा धनबल और जाति-धर्म के नाम पर चुनाव जीतती आई है. उन्होंने कहा कि पिछली बार कुछ कमियां रह गई थीं जिन्हें इस बार सुधारा जाएगा और सपा यहाँ ऐतिहासिक जीत दर्ज करेगी.

जातीय समीकरण

ओबरा में करीब 75,000 आदिवासी मतदाता हैं जो हार-जीत तय करते हैं. इनके अलावा वैश्य (40,000), जाटव (25,000), ब्राह्मण (20,000) और कुर्मी (15,000) मतदाता भी निर्णायक भूमिका में हैं। भाजपा का कोर वोट बैंक (वैश्य, ब्राह्मण, कुर्मी) जब आदिवासी वोटों के साथ मिलता है, तो वह अजेय हो जाती है.

क्या कहते हैं स्थानीय पत्रकार?

इलाके के पत्रकारों का मानना है कि वर्तमान में संजीव कुमार गोंड का पलड़ा भारी है. उन्होंने उन दुर्गम इलाकों तक विकास पहुंचाया है जहां पहले लोग जा भी नहीं पाते थे. व्यापारियों के साथ भी उनके संबंध बेहतर बताए जा रहे हैं. हालांकि, 2027 का चुनाव अभी दूर है और ऊंट किस करवट बैठेगा यह आने वाले समय में चुनावी घोषणापत्रों और उम्मीदवारों के चयन पर निर्भर करेगा.