Bansi Assembly Seat 2027: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही सियासी गलियारों में बांसी विधानसभा की चर्चा तेज हो गई है. सिद्धार्थनगर की यह हाई-प्रोफाइल सीट पारंपरिक रूप से बीजेपी का गढ़ रही है, जहां राजघराने से ताल्लुक रखने वाले जय प्रताप सिंह का दबदबा दशकों से कायम है. हालांकि, समाजवादी पार्टी 2027 में इस किले को ढहाने के लिए 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) और संगठन की मजबूती का दम भर रही है.
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जय प्रताप सिंह: बांसी के अजेय योद्धा?
बांसी का चुनावी इतिहास जय प्रताप सिंह के इर्द-गिर्द घूमता है. उन्होंने 1989 से 2022 के बीच हुए 9 चुनावों में से 8 बार जीत दर्ज की है. 1989 और 1991 में उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल की. 1993 में वे बीजेपी से जुड़े और तब से केवल 2007 को छोड़कर (जब सपा के लाल जी यादव जीते थे), वे लगातार विधायक रहे हैं.
मतदाता और जातिगत समीकरण (अनुमानित)
बांसी में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 3,21,722 है. जातिगत आंकड़ों पर नजर डालें तो यहाँ का समीकरण काफी दिलचस्प है.
मुस्लिम: 70,000
एससी/एसटी: 65,000
ब्राह्मण: 42,000
यादव: 40,000
वैश्य: 1,00,000 (लगभग)
इसके अलावा लोधी (21,000), कुर्मी (18,000), और निषाद (15,000) मतदाता भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं.
सियासी वार-पलटवार
वर्तमान में बीजेपी विधायक जय प्रताप सिंह का कहना है कि जनता का विश्वास और क्षेत्र में हुआ विकास (जैसे 50 बेड का अस्पताल, सड़कों का जाल और बिजली इंफ्रास्ट्रक्चर) उनकी सबसे बड़ी ताकत है. वहीं समाजवादी पार्टी के नेताओं का आरोप है कि धरातल पर कोई काम नहीं हुआ है और सड़कें जर्जर हैं. वे 2027 में 'पीडीए' फार्मूले के जरिए बदलाव का दावा कर रहे हैं.
पत्रकारों की राय
स्थानीय पत्रकारों के अनुसार, बांसी में जय प्रताप सिंह की शांतिप्रिय छवि और धार्मिक ध्रुवीकरण बीजेपी की जीत का बड़ा कारण बनते हैं. हालांकि, 2027 में मुकाबला काफी कड़ा होने की उम्मीद है, क्योंकि विपक्ष इस बार बूथ स्तर पर घेराबंदी कर रहा है.
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