अली खामनेई की मौत के बाद भाजपा विधायक राजेश्वर सिंह ने किया ये पोस्ट, अब इससे नाराज हुआ लखनऊ का शिया समाज?

Rajeshwar Singh on Ali khamenei's Death: आज का यूपी में देखें ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामनेई की मौत के बाद लखनऊ के शियाओं में भाजपा के प्रति आक्रोश. भाजपा विधायक राजेश्वर सिंह के ट्वीट से बढ़ा विवाद और अखिलेश-मायावती की चुप्पी का विश्लेषण.

MLA Rajeshwar Singh

कुमार अभिषेक

03 Mar 2026 (अपडेटेड: 03 Mar 2026, 11:02 AM)

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Rajeshwar Singh on Ali khamenei's Death News: यूपी Tak का खास शो आज का यूपी राज्य की राजनीतिक और सामाजिक हलचलों का सटीक विश्लेषण पेश करता है. आज के अंक में हम राज्य की तीन बड़ी खबरों का विश्लेषण कर रहे हैं. पहली खबर ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामनेई की मौत के बाद उत्तर प्रदेश, विशेषकर लखनऊ के शिया समुदाय में उपजे आक्रोश और भाजपा के प्रति उनके बदलते नजरिए पर है. दूसरी खबर भाजपा विधायक राजेश्वर सिंह के उस विवादास्पद ट्वीट की है जिसने शिया समुदाय की नाराजगी को और हवा दे दी है. वहीं, तीसरी खबर में हम विश्लेषण करेंगे कि इस अंतरराष्ट्रीय संकट पर उत्तर प्रदेश के बड़े सियासी सूरमाओं अखिलेश यादव और मायावती की रहस्यमयी चुप्पी या छायावादी रुख के मायने क्या हैं?

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भाजपा और शिया मतदाता, क्या खत्म हो रहा है दशकों पुराना साथ?

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामनेई की मौत के बाद पूरे मिडिल ईस्ट में युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं, लेकिन इसका एक गहरा असर लखनऊ की गलियों में भी देखा जा रहा है. ऐतिहासिक रूप से लखनऊ का शिया समुदाय भाजपा के प्रति एक नरम रुख रखता आया है. अटल बिहारी वाजपेयी के दौर से लेकर वर्तमान में राजनाथ सिंह के कार्यकाल तक, शियाओं का एक वर्ग भाजपा का समर्थक माना जाता रहा है.

हालांकि, मौजूदा घटनाक्रम ने इस समीकरण को हिला दिया है. ईरान और खामनेई के साथ लखनऊ के शियाओं का गहरा धार्मिक और भावनात्मक जुड़ाव है. भारत सरकार की ओर से कोई ठोस कूटनीतिक प्रतिक्रिया न आने और भाजपा के कुछ नेताओं के तीखे बयानों ने शिया मतदाताओं के भीतर मोहभंग की स्थिति पैदा कर दी है. राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जो रहा-सहा जनाधार भाजपा के पास इस समुदाय में था, वह अब खिसकता नजर आ रहा है.

भाजपा विधायक राजेश्वर सिंह का ट्वीट और शियाओं की तीखी प्रतिक्रिया

भाजपा के भीतर कद्दावर नेता माने जाने वाले सरोजनी नगर से विधायक राजेश्वर सिंह के एक ट्वीट ने इस आग में घी डालने का काम किया है. राजेश्वर सिंह ने लखनऊ में हो रहे प्रदर्शनों की नैतिकता पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने अपने पोस्ट में ईरान में बाल विवाह की उम्र और अफगानिस्तान में महिलाओं की शिक्षा पर पाबंदी जैसे मुद्दों का जिक्र करते हुए पूछा कि तब वैश्विक मानवाधिकार की आवाजें और संगठित विरोध कहां था?

राजेश्वर सिंह का तर्क है कि लोकतंत्र में बोलना अधिकार है, लेकिन क्या यह विरोध चयनात्मक है? उनके इस बयान के बाद शिया समुदाय में तीव्र प्रतिक्रिया हुई है. समुदाय का मानना है कि उनके सर्वोच्च धार्मिक नेता की शहादत के समय इस तरह की टिप्पणियां उनके जख्मों पर नमक छिड़कने जैसी हैं. इसने भाजपा और शियाओं के बीच की दूरी को और बढ़ा दिया है.

विपक्षी दिग्गजों की चुप्पी, अखिलेश का छायावाद और मायावती का मौन

जहां एक ओर मुस्लिम धर्मगुरु एक सुर में इस घटना की निंदा कर रहे हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के बड़े राजनीतिक दल एक अजीब सी खामोशी ओढ़े हुए हैं. कांग्रेस को छोड़कर कोई भी दल खुलकर स्टैंड नहीं ले रहा है.

अखिलेश यादव: समाजवादी पार्टी के मुखिया ने ट्वीट तो किया, लेकिन उनके शब्दों में एक छायावाद नजर आया. उन्होंने न तो खामनेई का नाम लिया, न ईरान का और न ही शिया समुदाय का जिक्र किया. उन्होंने एक जेनेरिक बयान देते हुए सरकार से युद्ध या शांति पर रुख साफ करने और खबरों की पुष्टि करने की मांग की.

मायावती: बसपा सुप्रीमो मायावती की ओर से अब तक एक शब्द भी नहीं आया है. माना जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों के पेचीदा मामले होने के कारण वे केंद्र की औपचारिक प्रतिक्रिया का इंतजार कर रही हैं. हालांकि, 2027 के लिए 'दलित-मुस्लिम-ब्राह्मण' गठजोड़ की कोशिश में जुटी मायावती के लिए यह चुप्पी उनके शिया समर्थकों के बीच सवाल खड़े कर सकती है.