Opinion: यूपी में सपा की सियासी राह मुश्किल, पुरानी छवि और नए समीकरणों के बीच फंसी अखिलेश यादव की पार्टी!

यूपी तक

14 Jul 2026 (अपडेटेड: 14 Jul 2026, 01:08 PM)

भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका हमेशा से महत्वपूर्ण रही है और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) इसका एक बड़ा उदाहरण है. ‘लोहियावाद’ और सामाजिक न्याय की पृष्ठभूमि से निकली इस पार्टी ने चार बार सूबे की सत्ता पर राज किया.

Akhilesh Yadav

Akhilesh Yadav (Photo Enhanced by AI)

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Opinion: भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका हमेशा से महत्वपूर्ण रही है और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) इसका एक बड़ा उदाहरण है. ‘लोहियावाद’ और सामाजिक न्याय की पृष्ठभूमि से निकली इस पार्टी ने चार बार सूबे की सत्ता पर राज किया. लेकिन, लगभग एक दशक में इस पार्टी के राजनीतिक ग्राफ में भारी गिरावट देखने को मिली है तो इसकी सबसे बड़ी वजह उसकी स्वार्थ व संकीर्णता से भरी विचारधारा के प्रति सनातन समाज की जागरूकता है. आज सपा उस दोराहे पर खड़ी है, जहां वह मुस्लिम तुष्टिकरण से किनारा किए बिना भाजपा के हार्डकोर मतदाताओं को अपने पाले में लाना चाहती है. लेकिन, स्पष्टता के इसी अभाव का नतीजा है कि उसके प्रति अविश्वास की खाई और गहरी होती दिखाई दे रही है.

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समाजवादी पार्टी की हालिया बड़ी गलती अयोध्या चढ़ावा कांड पर उसका जल्दबाजी में उठाया गया कदम है. पार्टी ने बिना परिणाम की चिंता किए बगैर सीधे यूपी सरकार व भाजपा को निशाने पर ले लिया, जबकि यह तथ्य है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट एक स्वायत्तशासी संस्था है, जिसका केंद्र या उत्तर प्रदेश सरकार या भाजपा से कोई लेना-देना नहीं. योगी सरकार के खिलाफ मुद्दे की तलाश में भटक रही सपा उत्तेजना में यह भी भूल गई कि उसके बयान अयोध्या धाम, श्रीराम जन्मभूमि मंदिर व सनातनी आस्था को चोट पहुंचा रहे हैं. अंधेरे में सपा ने रस्सी समझ कर सांप पकड़ लिया. और, जब योगी आदित्यनाथ ने सपा के इन्हीं बयानों पर उसे पुराने कृत्यों की याद दिलाते हुए कठघरे में खड़ा करना शुरू किया तो पार्टी को कोई जवाब नहीं सूझ रहा है. खासतौर पर हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों पर नमाज/इफ्तार कराने के आरोप पर वह बगलें झांकती नजर आ रही है.

2027 के रास्ते में सपा के सामने सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि वह पिछले दो विधानसभा चुनावों में करारी हार को देखते सनातनी मतदाताओं को लुभाना तो चाह रही है, लेकिन मुस्लिम तुष्टिकरण की संकीर्ण विचारधारा से पीछे भी नहीं हटना चाहती. यही वजह है कि योगी आदित्यनाथ के कई बार ललकारने के बावजूद सपा मुखिया अखिलेश यादव श्रीकृष्ण जन्मभूमि के मुद्दे पर मौन हैं. स्पष्ट है कि वह इसके पक्ष में बोलकर मुस्लिम मतदाताओं को नाराज नहीं करना चाहते. वह सपा शासनकाल में वक्फ संपत्तियों के नाम पर जमीनों की लूट-खसोट के आरोप पर भी कोई जवाब नहीं दे पा रहे. इसकी बड़ी वजह शायद उनका अपने पिता सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के फार्मूले पर अब भी टिके रहना है. 

​मुलायम सिंह यादव के दौर में मुस्लिम व यादव (एमवाई) समीकरण सपा की जीत का अचूक फॉर्मूला माना जाता था. लेकिन समय के साथ, इस समीकरण ने बहुसंख्यक समाज के एक बड़े हिस्से में यह संदेश दिया कि पार्टी केवल एक विशेष समुदाय के हितों के लिए काम कर रही है. टिकट बंटवारे से लेकर प्रशासनिक पदों पर नियुक्तियों तक, एक खास वर्ग को तरजीह दी गई, जिससे दलितों, गैर-यादव ओबीसी और सामान्य वर्ग के हिंदू मतदाताओं में यह भावना घर कर गई कि उनके हितों की अनदेखी हो रही है. वर्ष 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के समय तत्कालीन सरकार की भूमिका और उसके बाद के घटनाक्रमों ने इस धारणा को और मजबूत किया कि पार्टी का झुकाव एकतरफा था. वह बहुसंख्यक समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं के प्रति संवेदनशील नहीं रही.

​1990 में अयोध्या जा रहे कारसेवकों पर गोलीबारी की घटना आज भी सपा के गले की फांस है. पार्टी ने इसे कानून-व्यवस्था बनाए रखने का कदम बताया, लेकिन जनमानस में यह 'हिंदू विरोधी' कृत्य के रूप में चस्पा हो गया. उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और धार्मिक अस्मिता का उभार हुआ, तब सपा अयोध्या, काशी व मथुरा जैसे मुद्दों पर स्पष्ट स्टैंड लेने में हिचकिचाती दिखी. बहुसंख्यक आबादी के एक बड़े हिस्से ने इस हिचकिचाहट को उनके धार्मिक गौरव के विरोध के रूप में देखा. ​सपा सरकारों के दौरान एक वर्ग विशेष के अपराधियों को मिले राजनीतिक संरक्षण से यह संदेश और गहराया. यही वजह रही कि 2017 और उसके बाद के चुनावों में जनता ने सख्त कानून-व्यवस्था के हक में और तुष्टिकरण के खिलाफ मतदान किया.

भाजपा ने सपा के 'मुस्लिम तुष्टिकरण' के दांव को 'सबका साथ-सबका विकास' और 'हिंदू एकता' के बड़े विमर्श से काट दिया. इसमें उसका साथ दिया ​गैर-यादव पिछड़ी जातियों (जैसे मौर्य, कुर्मी, सैनी) और गैर-जाटव दलितों ने, जो लगातार महसूस कर रहे थे कि सपा राज में सिर्फ एक परिवार और एक विशेष समुदाय का भला होता है. भारतीय राजनीति के बदलते दौर में, जहां बहुसंख्यक समाज अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को लेकर अधिक मुखर हुआ है, वहां 'तुष्टिकरण' के पुराने फॉर्मूले अप्रासंगिक हो गए हैं. समाजवादी पार्टी "हिंदू विरोधी" और "मुस्लिम परस्त" होने का लेबल हटाने में नाकाम रही है. हालांकि, हाल के दिनों में पार्टी नेतृत्व ने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नया नारा देकर और सॉफ्ट-हिंदुत्व की राह पर चलकर इस छवि को बदलने की कोशिश की है. लेकिन इतिहास और जनता की स्मृति इतनी जल्दी नहीं बदलती. स्वार्थ व संकीर्णता का वृक्ष मीठा फल नहीं देता.

(लेखिका दीप्ति तनेजा, दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं.)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखिक की व्यक्तिगत राय हैं.)