Opinion: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की आहट के साथ सामाजिक समीकरणों की चर्चा फिर तेज हो गई है. समाजवादी पार्टी इस चुनाव में PDA (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक) के सहारे अपनी लड़ाई लड़ने की तैयारी कर रही है.अखिलेश यादव का दावा है कि यह सिर्फ चुनावी समीकरण नहीं बल्कि सामाजिक न्याय का नया मॉडल है.
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लेकिन सवाल यह है कि जिस पीडीए के नाम पर समाजवादी पार्टी नया सामाजिक गठबंधन खड़ा करने का दावा कर रही है उसी पीडीए के भीतर से सबसे ज्यादा सवाल क्यों उठ रहे हैं? दिलचस्प यह है कि ये सवाल सिर्फ बीजेपी नहीं उठा रही.कांग्रेस, ओवैसी और मायावती जैसे विपक्षी नेता तो सपा को घेर ही रहे हैं. लेकिन समय-समय पर पार्टी के भीतर से भी ऐसी आवाजें सामने आई हैं जिन्होंने इस दावे पर बहस को और तेज कर दिया है.
कांग्रेस के भीतर से उठ रही आवाज
इस बहस को सबसे ज्यादा धार कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के हालिया बयान ने दी. उन्होंने अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी पर कई गंभीर आरोप लगाए. मसूद ने कहा कि 'अखिलेश यादव को बोलता हुआ मुसलमान पसंद नहीं है.' उन्होंने आजम खान की अनदेखी से लेकर प्रभावशाली मुस्लिम नेताओं के साथ पार्टी के रवैये तक कई उदाहरण गिनाते हुए आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी ने मुस्लिम समाज को सिर्फ वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया.लेकिन उन्हें बराबरी का राजनीतिक सम्मान नहीं दिया.
उन्होंने गठबंधन पर भी सीधा दावा किया. उनके मुताबिक, 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के बेहतर प्रदर्शन के पीछे कांग्रेस की बड़ी भूमिका थी. उनका कहना है कि गठबंधन की जरूरत कांग्रेस से ज्यादा समाजवादी पार्टी को थी. यह पहला मौका नहीं है जब इमरान मसूद ने सपा पर सवाल उठाए हों. इससे पहले भी वे कई मौकों पर पार्टी की मुस्लिम राजनीति और नेतृत्व शैली की आलोचना कर चुके हैं.
इसी क्रम में कांग्रेस के उत्तर प्रदेश प्रभारी राजकुमार गौतम का बयान भी अहम माना गया। उन्होंने साफ कहा कि अगर विधानसभा चुनाव में गठबंधन होता है तो कांग्रेस बराबरी की हिस्सेदारी चाहेगी. यह सिर्फ सीटों की मांग नहीं थी बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी था कि कांग्रेस अब उत्तर प्रदेश में खुद को समाजवादी पार्टी का जूनियर पार्टनर मानने को तैयार नहीं दिख रही.
सवाल सिर्फ बाहर से नहीं पार्टी के भीतर से भी उठे
समाजवादी पार्टी भले ही पीडीए की राजनीति को मजबूती से आगे बढ़ा रही हो लेकिन उसके लिए सबसे असहज स्थिति तब बनती है, जब सवाल बाहर से नहीं बल्कि संगठन के भीतर से उठते हैं.
पिछले कुछ समय में पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल तक कई ऐसी घटनाएं सामने आईं जिन्होंने पार्टी के भीतर असंतोष की चर्चा को हवा दी. खासकर गैर-यादव पिछड़े समाज से आने वाले नेताओं ने खुले मंचों पर उपेक्षा और अपमान के आरोप लगाए.
बांदा से सांसद कृष्णा देवी शिवशंकर पटेल और सपा विधायक विशंभर दास यादव के बीच सार्वजनिक विवाद इसकी बड़ी मिसाल बना. कृष्णा देवी पटेल ने आरोप लगाया कि उन्हें उनकी ही पार्टी के नेताओं द्वारा अपमानित किया जा रहा है.
इसी तरह मुरादाबाद में सांसद रुचि वीरा, कमाल अख्तर और एसटी हसन के बीच खुलकर सामने आई खींचतान ने भी संगठन के भीतर की गुटबाजी को उजागर किया. चंदौली में सपा नेता गार्गी पटेल के साथ उनकी ही पार्टी के स्थानीय नेताओं द्वारा मारपीट का मामला भी चर्चा में रहा. हरदोई में पार्टी के एक नेता का महिलाओं के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने वाला वीडियो वायरल हुआ.जबकि अमेठी में विधायक महाराजी प्रजापति के साथ हुई अभद्रता में भी स्थानीय सपा नेताओं के नाम सामने आए.
ये घटनाएं अलग-अलग जिलों की जरूर हैं. लेकिन इन्होंने एक जैसी राजनीतिक बहस को जन्म दिया. सवाल यही उठा कि क्या समाजवादी पार्टी में गैर-यादव पिछड़े नेताओं को वास्तव में उतना सम्मान और राजनीतिक स्पेस मिल रहा है जितना पीडीए के मंच से दावा किया जाता है?
यही वजह है कि विपक्ष जब पीडीए पर सवाल उठाता है तो उसके पास सिर्फ राजनीतिक आरोप नहीं होते बल्कि पार्टी के भीतर से सामने आए ऐसे कई उदाहरण भी होते हैं.
ओवैसी भी उठा रहे हैं प्रतिनिधित्व का सवाल
समाजवादी पार्टी पर सवाल सिर्फ कांग्रेस नहीं उठा रही. एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी भी लगातार इसी मुद्दे को लेकर सपा पर हमलावर हैं.
उत्तर प्रदेश में अपनी सक्रियता बढ़ाने के साथ ही ओवैसी लगभग हर जनसभा में समाजवादी पार्टी को निशाने पर लेते हैं. उनका आरोप है कि सपा को मुस्लिमों का वोट तो चाहिए लेकिन नेतृत्व नहीं. वे बार-बार कहते हैं कि समाजवादी पार्टी में मुस्लिमों को सिर्फ 'दरी बिछाने और भीड़ जुटाने' तक सीमित कर दिया गया है जबकि निर्णय लेने वाली राजनीति में उनकी हिस्सेदारी बेहद सीमित है. यानी जिस अल्पसंख्यक समाज को पीडीए का अहम स्तंभ बताया जाता है, उसी समाज के प्रतिनिधित्व को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं.
गैर-यादव पिछड़ों की नाराजगी भी लगातार मुद्दा
पीडीए का सबसे बड़ा आधार पिछड़ा वर्ग माना जाता है. लेकिन सबसे ज्यादा सवाल भी इसी वर्ग से उठ रहे हैं. सुभासपा प्रमुख और योगी सरकार में मंत्री ओमप्रकाश राजभर लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि पीडीए केवल चुनावी नारा है. उनका कहना है कि संगठन, टिकट वितरण और राजनीतिक हिस्सेदारी में गैर-यादव पिछड़ों को बराबरी का सम्मान नहीं मिलता. समय-समय पर कुर्मी, निषाद और अन्य पिछड़ी जातियों के नेताओं की ओर से भी ऐसे सवाल उठते रहे हैं कि क्या समाजवादी पार्टी में गैर-यादव पिछड़ों की वास्तविक हिस्सेदारी उतनी ही है जितनी मंच से दिखाई जाती है.
दलित राजनीति भी पूरी तरह साथ नहीं दिखती
पीडीए का तीसरा स्तंभ दलित समाज है लेकिन यहां भी तस्वीर पूरी तरह समाजवादी पार्टी के पक्ष में नहीं दिखती. बसपा प्रमुख मायावती लगातार सपा को यादववादी पार्टी बताती रही हैं. उनका आरोप रहा है कि समाजवादी पार्टी दलितों की बात तो करती है. लेकिन व्यवहार में उन्हें बराबरी का सम्मान नहीं देती. बसपा लगातार यह नैरेटिव गढ़ती रही है कि दलितों का सबसे ज्यादा राजनीतिक और सामाजिक नुकसान समाजवादी पार्टी के शासनकाल में हुआ.
आखिर सवाल भरोसे का ही है
राजनीति केवल नारों से नहीं चलती, भरोसे से चलती है. अगर कांग्रेस मुस्लिम प्रतिनिधित्व पर सवाल उठा रही है, ओवैसी नेतृत्व में हिस्सेदारी का मुद्दा बना रहे हैं, राजभर गैर-यादव पिछड़ों की उपेक्षा की बात कर रहे हैं, मायावती दलित सम्मान का सवाल उठा रही हैं और समय-समय पर समाजवादी पार्टी के भीतर से भी असंतोष सामने आता रहा है तो स्वाभाविक है कि पीडीए के दावे पर बहस होगी.
2027 का विधानसभा चुनाव सिर्फ भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच सत्ता की लड़ाई नहीं होगा. यह उस राजनीतिक प्रयोग की भी परीक्षा होगी, जिसे अखिलेश यादव ने पीडीए के रूप में प्रदेश के सामने रखा है. क्योंकि किसी भी राजनीतिक नारे की असली ताकत उसके शब्दों में नहीं बल्कि उन लोगों के भरोसे में होती है जिनके नाम पर वह नारा बनाया जाता है.
लेखक- डॉ. विनम्र सेन सिंह
(इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रयागराज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं.भारतीय राजनीति के गंभीर अध्येता और विश्लेषक है.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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