Amethi News: मंदिर, मैट और भंडारे,अमेठी में 2027 से पहले गरमाई 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की राजनीति, 2027 से पहले बदली विपक्ष की रणनीति?

Newzo

• 11:37 AM • 14 Jul 2026

UP Assembly Election 2027: अमेठी में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले धार्मिक गतिविधियों को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पर 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की राजनीति अपनाने के आरोप लग रहे हैं, जबकि भाजपा इसे चुनावी रणनीति बता रही है. विपक्ष की ओर से फिलहाल इस मुद्दे पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है.

मंदिर, मैट और भंडारे,अमेठी में 2027 से पहले गरमाई 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की राजनीति, 2027 से पहले बदली विपक्ष की रणनीति?

मंदिर, मैट और भंडारे,अमेठी में 2027 से पहले गरमाई 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की राजनीति, 2027 से पहले बदली विपक्ष की रणनीति?

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UP Assembly Election 2027: विधानसभा चुनाव 2027 से पहले अमेठी की राजनीति में धार्मिक गतिविधियों को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पर सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति अपनाने के आरोप लग रहे हैं. एक ओर कांग्रेस सांसद किशोरी लाल शर्मा की सांसद निधि से जिले के विभिन्न सिद्धपीठों और देवी मंदिरों में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मैट बिछाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के नेता और तिलोई विधानसभा क्षेत्र से पूर्व प्रत्याशी जैनुल हसन द्वारा बड़े मंगल के अवसर पर विशाल भंडारे का आयोजन कराया गया था.

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राजनीतिक गलियारों में इन गतिविधियों को आगामी विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है. चर्चा है कि दोनों दल धार्मिक आयोजनों और मंदिरों से जुड़ी गतिविधियों के माध्यम से हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं.

इसी मुद्दे पर भाजपा ने कांग्रेस और सपा पर तीखा हमला बोला है, भाजपा के वरिष्ठ नेता गोविंद सिंह चौहान ने कहा कि 2027 के चुनाव को देखते हुए विपक्षी दलों को अब सॉफ्ट हिंदुत्व की याद आ रही है. उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी लाभ के लिए मंदिरों में मैट बिछाए जा रहे हैं और भंडारे कराए जा रहे हैं.

गोविंद सिंह चौहान ने कहा, "2027 का चुनाव नजदीक आते ही कांग्रेस और सपा को मां दुर्गा और हनुमान जी याद आने लगे हैं. जिन लोगों ने पहले राम मंदिर और कारसेवकों के मुद्दे पर अलग रुख अपनाया, वे आज धार्मिक आस्था के सहारे राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं. जनता सब समझ रही है और केवल प्रतीकात्मक कार्यक्रमों से चुनावी फायदा नहीं मिलने वाला है."

हालांकि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की ओर से इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों की बढ़ती अहमियत को देखते हुए सभी दल अपनी-अपनी रणनीति के तहत मतदाताओं तक पहुंचने का प्रयास कर रहे हैं.