Opinion: उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछले कुछ हफ्तों से ओम प्रकाश राजभर के सोशल मीडिया पोस्ट्स ने जो हलचल मचाई है, वह महज एक तात्कालिक राजनीतिक बयानबाजी नहीं है. ये पोस्ट दशकों से हाशिए पर पड़े गैर-यादव अति पिछड़ा वर्ग राजभर, निषाद, बिंद, कहार, प्रजापति, मल्लाह आदि जातियों के उस संचित आक्रोश और दर्द की अभिव्यक्ति हैं, जिसे लंबे समय तक दबाकर रखा गया. जब समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के तथाकथित पीडीए के नारे की जमीनी हकीकत पर तीखे सवाल उठाए जाते हैं, तो यह सीधे तौर पर लंबे समय से शोषित गैर-यादव ओबीसी समाज की आवाज बन जाता है. ओम प्रकाश राजभर के सोशल मीडिया पोस्ट असल में उसी लंबी वैचारिक और जमीनी लड़ाई का डिजिटल विस्तार है, जिसे यह समाज यादव वर्चस्व के खिलाफ लंबे समय से लड़ता आ रहा है.
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सामाजिक न्याय की आड़ में पनपा जातीय शोषण
उत्तर प्रदेश में सामाजिक न्याय के नाम पर जो राजनीति शुरू हुई, उसने अनुसूचित जाति और जनजातियों के संघर्ष को तो रेखांकित किया, लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग के भीतर एक गहरा असंतोष छोड़ दिया. पिछड़ा वर्ग की राजनीति पर एक ऐसी जाति का एकाधिकार स्थापित हो गया जो राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से बेहद ताकतवर थी और इस फेहरिस्त में यादव समाज सबसे ऊपर रहा. समाजवादी पार्टी के उभार के साथ ही सामाजिक न्याय का पूरा नैरेटिव 'यादव-केंद्रित' हो गया, जिसका नतीजा यह हुआ कि गैर-यादव पिछड़ों को सिर्फ वोट बैंक समझकर छोड़ दिया गया. सत्ता, संगठन और मलाईदार पदों पर तो दूर, समाज के भीतर भी इन्हें बराबरी का दर्जा नहीं मिला.
जमीनी हकीकत और गांवों में यादव वर्चस्व का दंश
इस राजनीतिक वर्चस्व का सबसे भयावह रूप उत्तर प्रदेश के गांवों और कस्बों में देखने को मिलता है. ऐतिहासिक रूप से क्षत्रिय समाज से जुड़ा यादव समाज आज भी ग्रामीण इलाकों में छोटी और अति पिछड़ी जातियों पर भारी पड़ता है. यूपी पुलिस के रिकॉर्ड के अनुसार जमीन स्तर पर मारपीट, गाली-गलौज, कमजोरों की जमीनों पर कब्जे और यहां तक कि बहन-बेटियों की आबरू से खिलवाड़ व हत्या जैसे मामलों में भी गैर-यादव पिछड़ों को सबसे ज्यादा प्रताड़ित यादव समाज के दबंगों द्वारा ही किया गया है. यह एक ऐसा कड़वा सच है जिसे भुक्तभोगी समाज रोज जीता है, लेकिन मुख्यधारा की राजनीति में इस पर बात करने से हमेशा परहेज किया गया.
कद्दावर गैर-यादव नेताओं की ऐतिहासिक उपेक्षा
इतिहास इस बात का गवाह है कि जब भी गैर-यादव पिछड़ों के किसी कद्दावर नेता ने इस वर्चस्व के खिलाफ सिर उठाने की कोशिश की, उसे कुचल दिया गया. बेनी प्रसाद वर्मा जैसे दिग्गज नेता मुलायम सिंह के बेहद करीबी होने के बावजूद इसी जातीय पक्षपात के कारण बार-बार हाशिए पर धकेले गए. ठीक इसी तरह, डॉ. सोनेलाल पटेल ने अपना दल की स्थापना ही इसलिए की थी क्योंकि वे समझ चुके थे कि सामाजिक न्याय के मुखौटे के पीछे वास्तव में 'यादववाद' को पोषित किया जा रहा है, जहां गैर-यादव पिछड़ों की नियति सिर्फ बड़े नेताओं के पीछे झंडा और झोला ढोने तक सीमित कर दी गई है.
राजनीतिक दलों की चुप्पी और 'तुच्छ' मानसिकता का प्रकटीकरण
गैर-यादव ओबीसी समाज के भीतर यह दंश दशकों से एक घाव की तरह पक रहा था, लेकिन वोट बैंक खिसकने के डर से उत्तर प्रदेश का कोई भी राजनीतिक दल इस जमीनी हकीकत पर खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. इस समाज की वास्तविक स्थिति और उनके प्रति यादव नेतृत्व के नजरिए का अंदाजा शिवपाल यादव जैसे वरिष्ठ नेताओं के उन बयानों से भी समय-समय पर लगता रहा है, जिनमें गैर-यादव पिछड़ों के लिए 'तुच्छ' जैसे शब्दों का इस्तेमाल यदा-कदा सामने आता रहा है. यह मानसिकता दर्शाती है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग इस वर्ग को आज भी अपने से हीन और कमतर आंकते हैं.
ओम प्रकाश राजभर : दबी हुई आवाजों का मुखर नेतृत्व
ऐसे सन्नाटे और राजनीतिक ढोंग के बीच ओम प्रकाश राजभर ने इस वर्जित विषय पर खुलकर बोलना शुरू किया है. वाराणसी के एक साधारण परिवार से आने वाले और जमीनी संघर्षों से तपे राजभर आज प्रतिदिन अखिलेश यादव और उनके यादव समर्थकों को सीधे टारगेट कर रहे हैं. वे केवल राजनीतिक हमला नहीं कर रहे, बल्कि उस गैर-यादव ओबीसी समाज की दबी हुई चीख को मुख्यधारा के विमर्श में ला रहे हैं, जिस पर अब तक पर्दा डाला जाता रहा था. राजभर के ट्वीट्स और बयान इस शोषित वर्ग को यह हौसला दे रहे हैं कि वे अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ खड़े हो सकें.
विशिष्ट घटनाओं के जरिए जमीनी हकीकत का पर्दाफाश
राजभर अपने सोशल मीडिया पोस्ट्स में केवल हवा-हवाई बातें नहीं करते, बल्कि वे उन विशिष्ट घटनाओं को उजागर कर रहे हैं जहां यादव समाज का अहंकार साफ दिखता है. मेरठ के मवाना में दलित पूर्व मंत्री और गुर्जर जिलाध्यक्ष को मंच से बेइज्जत करके हटाने की घटना हो, या चंदौली में कुर्मी नेता गार्गी पटेल और बांदा में सांसद कृष्णा देवी पटेल के साथ किया गया दुर्व्यवहार हो राजभर इन ठोस उदाहरणों से पूरे प्रदेश को बता रहे हैं कि सपा के रसूखदार यादवों की नजर में गैर-यादव ओबीसी और दलितों की आज भी क्या 'औकात' समझी जाती है.
अखिलेश का खोखला पीडीए बनाम यादव समाज की हेय दृष्टि
एक तरफ अखिलेश यादव सभी मंचों पर पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का राग अलाप रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ जमीन पर उनके अपने समाज की ओर से ऐसा कोई बदलाव या भाईचारा नहीं दिख रहा है. हकीकत यह है कि यादव समाज आज भी गैर-यादव ओबीसी को हेय दृष्टि से देखता है और उन्हें अपने बराबर मानने को तैयार नहीं है. चुनावी लाभ के लिए मंच से नारे देना बेहद आसान है, लेकिन जब तक यादव समाज के भीतर गैर-यादव पिछड़ों के प्रति जमीनी स्तर पर शोषण और हिकारत की भावना बनी रहेगी, तब तक अखिलेश का यह नैरेटिव पूरी तरह खोखला और पाखंड नजर आएगा.
युवा पीढ़ी में बढ़ती राजनीतिक चेतना और नई दिशा
राजभर के इन आक्रामक पोस्ट्स का सबसे बड़ा असर गैर-यादव ओबीसी समाज की नई पीढ़ी पर पड़ रहा है. सोशल मीडिया के माध्यम से आज का युवा यह साफ-साफ पढ़ और समझ रहा है कि 'नारों' की आड़ में उनके पिताओं और दादाओं ने कितना सामाजिक और आर्थिक शोषण झेला है. यह डिजिटल जागरूकता इस युवा वर्ग को यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि वे क्यों उस व्यवस्था का हिस्सा बने रहें जो उन्हें सम्मान की जगह सिर्फ प्रताड़ना देती है. यह चेतना भविष्य की राजनीति को अधिक तार्किक और समावेशी बनाने की ओर बढ़ रही है.
सच्चे और समावेशी सामाजिक न्याय की अनिवार्यता
निष्कर्ष के तौर पर, ओम प्रकाश राजभर के पोस्ट्स को महज चुनावी बयानबाजी या व्यक्तिगत हमला मान लेना बहुत बड़ी भूल होगी. ये उस गहरे असंतोष और विद्रोह की गूंज हैं जो दशकों से उत्तर प्रदेश के गांवों, मजरों और गैर-यादव अति पिछड़े समाज की चौपालों में दबा हुआ था. सामाजिक न्याय की परिभाषा किसी एक जाति विशेष के प्रभुत्व और उसके द्वारा किए जाने वाले शोषण तक सीमित नहीं रह सकती. राजभर के इन तीखे सवालों को इसी अधूरे सपने को पूरा करने और उत्तर प्रदेश की राजनीति में यादव वर्चस्व को उखाड़कर 'सच्चे और समावेशी सामाजिक न्याय' की एक नई लकीर खींचने के ऐतिहासिक प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए.
(लेखक भावेष पांडेय, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में अधिवक्ता हैं. राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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