Opinion: उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनाव से पहले एक बार फिर राम मंदिर सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार बहस मंदिर निर्माण को लेकर नहीं, बल्कि राम जन्मभूमि परिसर में कथित गड़बड़ियों और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों को लेकर शुरू हुई. समाजवादी पार्टी लगातार इस मुद्दे को उठाकर बीजेपी को घेरने की कोशिश कर रही है. अखिलेश यादव का आरोप है कि जिस राम मंदिर के नाम पर बीजेपी ने राजनीति की, उसी मंदिर में अब भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के सवाल उठ रहे हैं.
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पहली नजर में लगा कि यह मुद्दा बीजेपी के लिए असहज साबित हो सकता है. आखिर राम मंदिर उसकी सबसे बड़ी वैचारिक और राजनीतिक पूंजी रहा है. लेकिन कुछ ही दिनों में राजनीतिक तस्वीर बदलती नजर आने लगी. इसकी सबसे बड़ी वजह बने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ.
योगी आदित्यनाथ ने इस पूरे विवाद में केवल सफाई देने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि बहस का केंद्र ही बदल दिया. उन्होंने कहा कि पूरे मामले में निष्पक्ष जांच चल रही है और सरकार ने किसी को बचाने की कोशिश नहीं की. यहीं से उन्होंने विपक्ष के आरोपों को पलटकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के राजनीतिक इतिहास पर सवाल उठाने शुरू कर दिए.
योगी ने कैसे सपा के नैरेटिव को घेरा
जब राम मंदिर में कथित गड़बड़ी का मुद्दा सामने आया तो समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने इसे तुरंत राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश की. दोनों दलों ने पहली बार खुद को राम और सनातन की राजनीति के करीब दिखाने का प्रयास किया. जिन दलों पर लंबे समय तक खुले मंच से राम का नाम लेने से बचने के आरोप लगते रहे, वे अचानक राम मंदिर और हिंदू आस्था के सबसे बड़े पक्षधर के रूप में सामने आने लगे.
चूंकि चंदे में कथित गड़बड़ी या चोरी जैसी खबर स्वाभाविक रूप से लोगों की भावनाओं को प्रभावित करने वाली थी, इसलिए इस मुद्दे को तेजी से तूल भी मिला. समाजवादी पार्टी को लगा कि यह ऐसा मुद्दा है जिसके सहारे बीजेपी की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत को ही कटघरे में खड़ा किया जा सकता है. आखिर बीजेपी की पूरी वैचारिक यात्रा राम मंदिर आंदोलन के इर्द-गिर्द ही विकसित हुई है.
दूसरी ओर, शुरुआती दिनों में बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरफ से बहुत आक्रामक प्रतिक्रिया नहीं आई. विपक्ष को लगा कि उसने बीजेपी को रक्षात्मक स्थिति में ला दिया है. लेकिन इसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मोर्चा संभाला और पूरी बहस की दिशा ही बदल दी.
वक्फ के मुद्दे पर पलटवार
योगी आदित्यनाथ ने सवाल उठाया कि जो सपा आज राम मंदिर के नाम पर हिंदू आस्था की बात कर रही है, वही पार्टी वक्फ की जमीनों के कथित दुरुपयोग पर आखिर क्यों चुप रहती है. उन्होंने तीखे अंदाज में पूछा कि हजारों हेक्टेयर जमीन, जो गरीबों, कमजोर वर्गों और सार्वजनिक उपयोग के काम आ सकती थी, वह वक्फ के नाम पर चली गई या बेच दी गई. उस समय समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने कभी कोई सवाल क्यों नहीं उठाया? यानी योगी ने बहस को केवल राम मंदिर तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे व्यापक हिंदू आस्था और कथित तुष्टिकरण की राजनीति से जोड़ दिया.
योगी के सवालों ने बदल दिया पूरा नैरेटिव
योगी यहीं नहीं रुके. उन्होंने समाजवादी पार्टी के पूरे राजनीतिक इतिहास को बहस के केंद्र में ला दिया. उन्होंने अयोध्या में रामभक्तों पर चली गोलियों की याद दिलाई. कांवड़ यात्रा पर लगाए गए प्रतिबंधों का जिक्र किया. अवैध बूचड़खानों, गौतस्करी और कब्रिस्तानों की चारदीवारी के लिए सरकारी धन खर्च किए जाने जैसे पुराने मुद्दों को भी सामने रखा.
यानी बहस अब केवल कथित चोरी या वित्तीय अनियमितताओं तक सीमित नहीं रही. योगी ने इसे सीधे-सीधे समाजवादी पार्टी की वैचारिक विश्वसनीयता से जोड़ दिया. उनका संदेश साफ था कि जो दल वर्षों तक राम मंदिर आंदोलन का विरोध करता रहा, वह आज राम मंदिर का सबसे बड़ा हितैषी बनने की कोशिश कर रहा है.
कृष्ण जन्मभूमि और बाबरी के सवालों पर सपा घिरी
योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी के सामने दो ऐसे सवाल भी खड़े किए, जिनका राजनीतिक जवाब देना उसके लिए आसान नहीं है. उन्होंने कहा कि अगर अखिलेश यादव का सनातन प्रेम वास्तव में जाग गया है और वे खुद को सनातनी बताना चाहते हैं, तो फिर उन्हें कृष्ण जन्मभूमि के मुद्दे पर भी अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए.
इसके साथ ही योगी लगातार बाबरी मस्जिद के मुद्दे का भी जिक्र कर रहे हैं. उनका आरोप है कि समाजवादी पार्टी का पुराना रुख आज भी नहीं बदला है और वह राम मंदिर के मुद्दे पर भी उसी मानसिकता के साथ राजनीति कर रही है.
राजनीतिक रूप से देखें तो ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब देना समाजवादी पार्टी के लिए आसान नहीं है. अगर वह बाबरी मस्जिद को लेकर खुलकर कोई पक्ष लेती है तो उसका असर उसके पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक पर पड़ सकता है. वहीं कृष्ण जन्मभूमि पर स्पष्ट समर्थन देने की स्थिति में भी उसके सामने राजनीतिक असहजता पैदा हो सकती है. यही वजह है कि बीजेपी बार-बार इन मुद्दों को बहस के केंद्र में ला रही है.
सपा का मुद्दा कमजोर क्यों पड़ता दिख रहा है
राजनीतिक नजरिए से देखें तो यही वह मोड़ है, जहां समाजवादी पार्टी का नैरेटिव कमजोर पड़ता दिखाई देता है. क्योंकि सपा जिस बहस को भ्रष्टाचार बनाम ईमानदारी तक सीमित रखना चाहती थी, योगी आदित्यनाथ उसे रामभक्त बनाम राम विरोधी राजनीति की बहस में बदलने में सफल नजर आते हैं.
योगी के तेवर का राजनीतिक असर
योगी आदित्यनाथ के इस आक्रामक रुख का असर अब राजनीतिक बहस में भी दिखाई देने लगा है. समाजवादी पार्टी के पुराने बयान फिर से सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे हैं. मुलायम सिंह यादव से लेकर रामगोपाल यादव तक के राम मंदिर से जुड़े पुराने बयान फिर चर्चा में हैं. संसद में राम मंदिर को लेकर समाजवादी पार्टी के विरोध का भी जिक्र किया जा रहा है.
सोशल मीडिया पर यह सवाल भी पूछा जा रहा है कि जो लोग कभी राम के अस्तित्व या राम मंदिर आंदोलन को लेकर अलग रुख रखते थे, उनका राम प्रेम अचानक अब क्यों दिखाई दे रहा है. बहस यह भी हो रही है कि जब राम मंदिर का निर्माण हो रहा था और उसकी भव्यता की चर्चा थी, तब समाजवादी पार्टी ने सकारात्मक राजनीति क्यों नहीं की. अब जब कथित गड़बड़ी का मुद्दा सामने आया है, तभी राम और आस्था की बात क्यों की जा रही है.
यहीं समाजवादी पार्टी के सामने राजनीतिक चुनौती खड़ी होती है. क्योंकि अगर वह केवल कथित अनियमितताओं की बात करती है तो बीजेपी उसके सामने उसके पुराने राजनीतिक रिकॉर्ड की पूरी फाइल खोल देती है. रामभक्तों पर गोलीकांड से लेकर मंदिर आंदोलन तक, हर मुद्दा फिर चर्चा में आ जाता है. ऐसे में बहस वर्तमान से ज्यादा अतीत पर पहुंच जाती है और यही बीजेपी की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बन जाती है.
यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम में सियासी बढ़त फिलहाल योगी आदित्यनाथ के पक्ष में जाती हुई दिखाई देती है. समाजवादी पार्टी ने जिस मुद्दे पर बीजेपी को घेरने की शुरुआत की थी, उसी बहस में अब उसे अपने पुराने राजनीतिक फैसलों, राम मंदिर आंदोलन के दौर और हिंदुत्व से जुड़े अपने रिकॉर्ड पर सफाई देनी पड़ रही है.
लेखक डॉ. अभय पाण्डेय,दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक विषयों पर लेखन करते रहते हैं.
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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