Opinion: MY समीकरण बनाम जाट राजनीति... पश्चिमी यूपी में जाट वोट सपा से दूर क्यों रहता है?

यूपी तक

• 11:02 AM • 03 Jul 2026

Opinion: पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाट बिरादरी की भूमिका बेहद निर्णायक है. कई विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां जाट मतदाता सीधे तौर पर हार-जीत तय करते हैं. यही कारण है कि भाजपा, सपा और रालोद तीनों ही इस वोट बैंक को अपने पाले में करने के लिए जोर आजमाइश करती हैं.

Akhilesh Yadav (File Photo)

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Opinion: उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. चुनाव से पहले प्रदेश में जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों पर चर्चा तेज हो गई है. इन समीकरणों में सबसे ज्यादा नजरें पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर हैं. इसकी एक वजह हाल के दिनों में समाजवादी पार्टी के भीतर सामने आई खींचतान भी है. सांसद रुचि वीरा, कमाल अख्तर और एसटी हसन के बीच खुलकर तल्खी देखने को मिली. विवाद इतना बढ़ा कि कमाल अख्तर को मुख्य सचेतक पद से इस्तीफा देना पड़ा. यह केवल नेताओं के बीच का विवाद नहीं था, बल्कि इसने यह संकेत भी दिया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है.

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लेकिन सवाल सिर्फ पार्टी की अंदरूनी कलह का नहीं है. सवाल उस सामाजिक समीकरण का भी है, जिसके बिना पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति की कल्पना ही नहीं की जा सकती- और वह है जाट राजनीति. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कई विधानसभा सीटों पर जाट मतदाता सीधे चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. यही वजह है कि भाजपा, राष्ट्रीय लोकदल और समाजवादी पार्टी- तीनों की राजनीति किसी न किसी रूप में जाट वोटों के इर्द-गिर्द घूमती रही है.

लेकिन पिछले एक दशक का राजनीतिक इतिहास बताता है कि जाट समाज और समाजवादी पार्टी के बीच भरोसे का रिश्ता कभी मजबूत नहीं बन पाया. सवाल यह है कि आखिर इसकी वजह क्या है?

2013: जिसने खाई और गहरी कर दी

अगर जाट और सपा के रिश्तों में सबसे बड़ा मोड़ तलाशना हो तो वह 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे हैं. इन दंगों के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सामाजिक और राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गया. जाट और मुस्लिम, जो कभी किसान आंदोलनों और चौधरी चरण सिंह की राजनीति के दौर में एक साथ दिखाई देते थे, उनके बीच गहरी दूरी पैदा हो गई. उस समय प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी.

दंगों के बाद जाट समाज के एक बड़े वर्ग में यह धारणा मजबूत हुई कि उस समय की सरकार कानून-व्यवस्था संभालने और सभी पक्षों के साथ समान व्यवहार करने में सफल नहीं रही. इसी दौर में यह धारणा भी मजबूत हुई कि सपा की राजनीति में मुस्लिम वोट बैंक को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जाती है. यही धारणा आज भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति को प्रभावित करती दिखाई देती है.

MY समीकरण और जाटों की दूरी

समाजवादी पार्टी की पहचान लंबे समय से *यादव-मुस्लिम (MY)* समीकरण की पार्टी के रूप में रही है. यही उसकी सबसे बड़ी चुनावी ताकत भी रही है, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है. जाट समाज खुद को किसान, जमीन से जुड़ा और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली वर्ग मानता है. ऐसे में उसके एक बड़े हिस्से को यह महसूस होता है कि सपा में सबसे ज्यादा राजनीतिक महत्व यादव और मुस्लिम नेतृत्व को मिलता है, जबकि जाट नेतृत्व को अपेक्षाकृत कम जगह मिलती है. यही वजह है कि जाट मतदाताओं का बड़ा वर्ग आज भी सपा को अपना स्वाभाविक राजनीतिक विकल्प नहीं मानता.

मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति की धारणा

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का सबसे मजबूत आधार मुस्लिम मतदाता रहे हैं. कई विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी की रणनीति मुस्लिम और यादव वोटों के समीकरण पर आधारित रही है. यहीं से जाट समाज के एक वर्ग में यह धारणा बनी कि सपा की प्राथमिकता मुस्लिम वोट बैंक को साधने की रही है. यही कारण है कि जब भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक तनाव, पहचान की राजनीति या कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे सामने आते हैं, तो जाट मतदाताओं का झुकाव अक्सर भाजपा की ओर दिखाई देता है.

मुरादाबाद फैक्टर भी चर्चा में रहता है

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक और चर्चा लंबे समय से होती रही है- *मुरादाबाद फैक्टर.* समाजवादी पार्टी पर समय-समय पर आरोप लगता रहा है कि पश्चिमी यूपी में संगठन और राजनीतिक फैसलों में मुरादाबाद मंडल के नेताओं का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक रहा है. टिकट वितरण हो, संगठन हो या राजनीतिक प्राथमिकताएं. विरोधी दलों के साथ-साथ कई स्थानीय नेता भी यह आरोप लगाते रहे हैं कि मुरादाबाद मंडल को ज्यादा तरजीह दी जाती है.

इस धारणा को इसलिए भी बल मिलता है क्योंकि सपा सरकार के दौरान भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश से जुड़े कई अहम संगठनात्मक पदों पर मुरादाबाद मंडल के नेताओं का प्रभाव दिखाई देता था. आज भी पश्चिमी यूपी में सपा के कई बड़े और चर्चित चेहरे इसी क्षेत्र से आते हैं. सपा में जाट नेताओं का सूखा सा दिखाई देता है.

किसान आंदोलन ने उम्मीद जगाई, लेकिन...

2020-21 के किसान आंदोलन के दौरान पहली बार लगा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति फिर पुराने किसान समीकरण की ओर लौट सकती है. इसके बाद राष्ट्रीय लोकदल और समाजवादी पार्टी ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा. हालांकि यह प्रयोग लंबे समय तक नहीं चल सका. 2022 के विधानसभा चुनाव में रालोद ने 33 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन उसे सिर्फ 8 सीटों पर जीत मिली. बाद में रालोद का एनडीए में शामिल होना इस बात का संकेत माना गया कि जाट राजनीति पूरी तरह समाजवादी पार्टी के साथ नहीं आ पाई.

भाजपा की बढ़त क्यों बनी हुई है?

भाजपा ने पिछले एक दशक में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट समाज के बीच लगातार अपनी पकड़ मजबूत की है. राष्ट्रीय सुरक्षा, हिंदुत्व, किसान कल्याण की योजनाएं और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न दिए जाने जैसे कदमों ने जाट समाज के एक हिस्से में भाजपा की स्वीकार्यता बढ़ाई है. वहीं गन्ना किसानों के भुगतान और उनसे जुड़े मुद्दों पर सरकार के लगातार फोकस ने भी भाजपा को इस वर्ग के बीच राजनीतिक बढ़त दिलाने में मदद की है.

(लेखक भावेश पांडेय इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में अधिवक्ता हैं. सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर निरंतर लेखन करते हैं.)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)