Opinion: 'भाजपा जीती तो देश में नहीं होंगे चुनाव...", क्यों औचित्यहीन है यह विपक्षी दावा?

Opinion: क्या यूपी में भाजपा की जीत के बाद वाकई बंद हो जाएंगे चुनाव? उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले सपा प्रमुख अखिलेश यादव के बयानों और विपक्ष के 'अंतिम चुनाव' वाले नैरेटिव का एक सटीक और बेबाक राजनीतिक विश्लेषण.

Akhilesh Yadav

Akhilesh Yadav (File Photo)

यूपी तक

• 08:44 AM • 29 Jun 2026

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Opinion: यूपी विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीने बचे हैं. सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी तैयारियों में जुटे हैं. इसी बीच समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव का एक बयान सुर्खियों में है. अखिलेश यादव ने दावा किया है कि अगर आने वाले विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा जीत गई, तो भविष्य में चुनाव नहीं होंगे. यह पहला मौका नहीं है जब सपा प्रमुख ने इस तरह का दावा किया हो. बीते लोकसभा और विधानसभा चुनावों के दौरान अखिलेश यादव समेत विपक्षी दलों के कई नेता लोकतंत्र और संविधान को लेकर इसी तरह की आशंकाएं जताते रहे हैं. "संविधान खतरे में है", "लोकतंत्र बचाना है" जैसे दावे विपक्ष की चुनावी सभाओं में लगातार सुनाई देते रहे हैं.

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सवाल उठना लाज़िमी है कि विपक्षी दलों के इन दावों में आखिर कितना दम है? क्या वास्तव में देश का संविधान खतरे में है? क्या सचमुच ऐसा हो सकता है कि अगर उत्तर प्रदेश में भाजपा फिर से सत्ता में आ गई तो आगे चुनाव ही नहीं होंगे? दरअसल, अखिलेश यादव जिस तरह लोकतंत्र खत्म होने या चुनाव न होने जैसी बातें करते हैं, उसे चुनावी हार की'आशंका' के तौर पर देखा जाना चाहिए. यह समर्थकों को अपने साथ जोड़कर रखने और उन्हें यह संदेश देने की कोशिश दिखती है कि मौजूदा चुनाव सामान्य राजनीतिक मुकाबला नहीं, बल्कि लोकतंत्र के भविष्य का चुनाव है.

वोटरों को साथ रखने की बड़ी चुनौती

इसके पीछे एक राजनीतिक संदर्भ भी है. 2012 में उत्तर प्रदेश की सत्ता में आने के बाद समाजवादी पार्टी लगातार सत्ता से बाहर रही है. हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन बेहतर रहा, लेकिन उससे पहले विधानसभा और अन्य चुनावों में उसे लगातार हार का सामना करना पड़ा. ऐसे में अपने कोर वोटरों और समर्थकों को पार्टी के साथ बनाए रखना भी अखिलेश यादव के सामने एक बड़ी राजनीतिक चुनौती है. रही बात इन दावों की, तो चुनाव से पहले ऐसे बयान अक्सर सुनने को मिलते हैं. लेकिन सवाल यह भी है कि चुनावी नतीजों के बाद इन दावों का क्या होता है?

2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी कांग्रेस और समाजवादी पार्टी समेत विपक्षी दलों ने बार-बार आरोप लगाया कि अगर भाजपा को बड़ा बहुमत मिला तो संविधान और आरक्षण पर खतरा पैदा हो सकता है. दूसरी ओर भाजपा ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए इन्हें चुनावी दुष्प्रचार बताया था. चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा फिर सत्ता में लौटी, और विपक्ष के सभी दावे झूठे साबित हुए.

2027 में फिर से वही राग

अब 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव फिर कह रहे हैं कि अगर भाजपा दोबारा जीत गई तो भविष्य में चुनाव नहीं होंगे. सवाल है कि जब पिछले कई चुनावों से इसी तरह के दावे किए जाते रहे हैं, तो उनका क्या निष्कर्ष निकला? क्या संविधान समाप्त हुआ? क्या भाजपा की जीत के बाद देश में चुनाव फिर नहीं हुए? अब तक के घटनाक्रम को देखें तो ऐसा नहीं हुआ. देश में संवैधानिक व्यवस्था के तहत चुनाव होते रहे हैं और सभी राजनीतिक दल चुनावों की तैयारियों में जुटे दिखाई देते हैं. लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता करती है. चुनावी दावों और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों के बीच मतदाता ही तय करता है कि किस दलील पर भरोसा करना है. भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि हर पांच साल बाद सभी राजनीतिक दल फिर से जनता के बीच वोट मांगने पहुंचते हैं. इस प्रक्रिया में सभी भारतीय राजनीतिक दल शामिल होते हैं.

इसलिए विपक्ष 'ये चुनाव अंतिम चुनाव होगा' जैसे औचित्यहीन दावे करने से परहेज करना चाहिए. सच्चाई ये है कि ऐसा भ्रम फैलाकर विपक्षी दल देश की संवैधानिक व्यवस्था का मजाक उड़ा रहे हैं. जनता के मुद्दों से दूर रहने की आदत पर पर्दा डालने के लिए ऐसा नैरेटिव फैलाना केवल राजनीतिक दलों के लिए नहीं बल्कि प्रत्येक भारतीय के लिए नुकसानदायक है.

(लेखक- संतोष ओझा, दिल्ली बीजेपी के पूर्वांचल मोर्चा के अध्यक्ष हैं.)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)