उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीने बचे हैं. सभी राजनीतिक दल अपने-अपने सामाजिक समीकरणों को साधने और नए वोट बैंक जोड़ने में जुटे हैं. लेकिन चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि उसका अपना सबसे मजबूत सामाजिक आधार बनता दिखाई दे रहा है.
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पिछले तीन दशकों में उत्तर प्रदेश की राजनीति में अगर किसी सामाजिक समीकरण ने सबसे ज्यादा चर्चा बटोरी है तो वह मुस्लिम-यादव यानी MY समीकरण. इसी समीकरण ने समाजवादी पार्टी को प्रदेश की राजनीति में एक अलग पहचान दी और उसे लंबे समय तक सत्ता की राजनीति के केंद्र में बनाए रखा. लेकिन अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह समीकरण पहले जितना मजबूत रह गया है या फिर इसके भीतर दरारें पड़नी शुरू हो गई हैं?
2017 से बदलने लगे थे समीकरण
साल 2017 का विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के लिए सिर्फ सत्ता गंवाने का चुनाव नहीं था, बल्कि राजनीतिक बदलाव की शुरुआत भी था. भाजपा ने गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों को बड़े पैमाने पर अपने साथ जोड़ लिया. इसके बाद सपा नेतृत्व को एहसास हुआ कि सिर्फ MY समीकरण के भरोसे सत्ता तक पहुंचना आसान नहीं होगा.
यही वजह थी कि 2022 के चुनाव में अखिलेश यादव ने छोटे दलों के साथ गठबंधन का रास्ता चुना. पार्टी ने यादव और मुस्लिम वोटों के साथ दूसरे पिछड़े वर्गों को जोड़ने की कोशिश की. चुनाव में प्रदर्शन बेहतर हुआ, लेकिन सत्ता अभी भी दूर रही.
2024 में बदले हालात
लोकसभा चुनाव 2024 ने समाजवादी पार्टी को नई राजनीतिक ऊर्जा दी. कांग्रेस के साथ गठबंधन और PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले की मदद से सपा ने शानदार प्रदर्शन किया. पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वह अब सिर्फ MY समीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि एक व्यापक सामाजिक गठबंधन की राजनीति कर रही है.
लेकिन इसी सफलता के बाद नए सवाल भी पैदा होने लगे. जब किसी दल का सामाजिक आधार बढ़ता है तो उसके पुराने समर्थक अपने राजनीतिक हिस्से और प्रतिनिधित्व को लेकर ज्यादा सजग हो जाते हैं. यही अब समाजवादी पार्टी के सामने भी दिखाई दे रहा है.
फिर बदलने लगी तस्वीर
पिछले कुछ महीनों में समाजवादी पार्टी के भीतर और बाहर से ऐसी आवाजें सुनाई देने लगी हैं जो संकेत देती हैं कि सब कुछ उतना सहज नहीं है जितना दिखाई देता है. कई मुस्लिम नेता और संगठन खुलकर यह सवाल उठा रहे हैं कि पार्टी में उनकी वास्तविक राजनीतिक भागीदारी कितनी है. कई मुद्दों पर सपा नेतृत्व की चुप्पी और संगठन में मुस्लिम नेतृत्व की भूमिका को लेकर भी सवाल उठे हैं. यानी जो वोट बैंक वर्षों तक बिना किसी बड़ी शर्त के सपा के साथ खड़ा दिखाई देता था, वह अब अपनी राजनीतिक अपेक्षाओं को खुलकर सामने रख रहा है.
मुस्लिम असहज क्यों हैं?
इस असहजता की कई वजहें हैं. सबसे बड़ा सवाल प्रतिनिधित्व का है. मुस्लिम समाज के एक वर्ग के भीतर यह भावना मजबूत हुई है कि कांग्रेस और सपा जैसे दलों ने उन्हें लंबे समय तक एक भरोसेमंद वोट बैंक के रूप में देखा, लेकिन सत्ता और संगठन में उनकी हिस्सेदारी उस अनुपात में नहीं बढ़ी.
राजनीतिक प्रतिनिधित्व और नेतृत्व में उनकी भागीदारी को लेकर ठोस चर्चा क्यों नहीं होती? यही वजह है कि टिकट वितरण, संगठन में हिस्सेदारी और नेतृत्व की भूमिका जैसे सवाल लगातार उठ रहे हैं.
आजम खान फैक्टर
इस पूरे विमर्श में आजम खान का नाम भी बार-बार सामने आता है. 2017 के बाद जब उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई तेज हुई और उनकी राजनीतिक ताकत कमजोर पड़ी, तब समाजवादी पार्टी उनके साथ मजबूती से खड़ी नहीं दिखाई दी. लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव, आजम खान और उनके परिवार की भूमिका पहले जैसी नहीं रही. कई मौकों पर खुद आजम खान भी अपनी उपेक्षा को लेकर सार्वजनिक तौर पर नाराजगी जता चुके हैं. इसका असर मुस्लिम राजनीति की धारणा पर भी पड़ा और यह संदेश गया कि पार्टी अपने सबसे बड़े मुस्लिम चेहरे को भी पर्याप्त राजनीतिक संरक्षण नहीं दे सकी.
ओवैसी के सपा से तीखे सवाल
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी भले ही उत्तर प्रदेश में अभी बड़ी चुनावी ताकत न बने हों, लेकिन उनके सवाल लगातार चर्चा में रहते हैं. ओवैसी अक्सर पूछते हैं कि अगर प्रदेश में मुस्लिम आबादी करीब 20 प्रतिशत है और यादव आबादी 7-8 प्रतिशत के आसपास मानी जाती है, तो फिर सत्ता, संगठन और नेतृत्व में मुस्लिमों की हिस्सेदारी उसी अनुपात में क्यों दिखाई नहीं देती? उनका आरोप है कि मुस्लिमों को सिर्फ वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन नेतृत्व की भूमिका में आगे नहीं बढ़ाया जाता.
हाल ही में बहराइच की एक रैली में उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि जब समाजवादी पार्टी की सरकार गई तो सबसे ज्यादा राजनीतिक और कानूनी दबाव आजम खान ने झेला, लेकिन पार्टी नेतृत्व उनके साथ मजबूती से खड़ा क्यों नहीं दिखाई दिया. ऐसे सवाल सीधे सपा के पारंपरिक वोट बैंक के भीतर चल रही बहस को हवा देते हैं.
गठबंधन को लेकर भी सवाल
ओवैसी ने तब सपा की मुश्किलें और बढ़ा दीं जब उन्होंने भाजपा को रोकने के नाम पर समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की इच्छा जताई, लेकिन साथ ही सम्मानजनक हिस्सेदारी की शर्त भी रख दी. अब गेंद सपा के पाले में है. अगर अखिलेश यादव ओवैसी के साथ समझौता नहीं करते हैं या उन्हें पर्याप्त राजनीतिक महत्व नहीं देते हैं, तो एक संदेश यह जा सकता है कि पार्टी मुस्लिम वोट तो चाहती है लेकिन राजनीतिक हिस्सेदारी देने को तैयार नहीं है.
उधर कांग्रेस भी सीट बंटवारे और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर लगातार दबाव बना रही है. सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद समेत कई नेता समय-समय पर सपा पर मुस्लिम नेतृत्व की उपेक्षा के आरोप लगाते रहे हैं.
सपा के सामने असली चुनौती
समाजवादी पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा से मुकाबला भर नहीं है. असली चुनौती अपने पुराने सामाजिक आधार को संतुष्ट रखते हुए नए सामाजिक समूहों को साथ जोड़ने की है. 2027 का चुनाव नजदीक आते-आते यही सवाल और बड़ा होगा. क्योंकि चुनाव सिर्फ नए वोट जोड़कर नहीं जीते जाते, बल्कि पुराने भरोसे को बचाकर भी जीते जाते हैं. और फिलहाल समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ी परीक्षा इसी भरोसे को बनाए रखने की है.
(लेखक मोहम्मद वसीम अहमद दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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