Opinion: पिछड़े नाराज, दलित असहज, मुस्लिम मांग रहे भागीदारी... अखिलेश के लिए मुश्किल होगा PDA समीकरण बरकरार रखना

Opinion: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण में आंतरिक असंतोष उभर रहा है. गैर-यादव पिछड़ों, दलितों और ओवैसी के हमलों के बीच जानें अखिलेश यादव के सामने क्या हैं चुनौतियां.

Akhilesh Yadav News

Akhilesh Yadav (Photo Samajwadi Party/ X)

यूपी तक

• 02:32 PM • 17 Jun 2026

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Opinion: उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं और चुनावी माहौल धीरे-धीरे गर्म होने लगा है. करीब एक दशक से सत्ता से बाहर समाजवादी पार्टी इस बार PDA (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के सहारे सत्ता में वापसी का सपना देख रही है. पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार PDA को अपनी राजनीति का केंद्र बना रहे हैं. उनका मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में इसी सामाजिक समीकरण ने सपा को बड़ी सफलता दिलाई थी.

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लेकिन 2027 का रास्ता 2024 जितना आसान दिखाई नहीं दे रहा. वजह यह है कि जिस PDA को अखिलेश यादव अपनी सबसे बड़ी ताकत मानते हैं, उसी PDA के भीतर से अब सबसे ज्यादा सवाल उठने लगे हैं. पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक-तीनों वर्गों के बीच सपा और उसके नेतृत्व को लेकर अलग-अलग तरह की नाराजगी और असंतोष दिखाई दे रहा है.

पिछड़ों में क्यों बना हुआ है संदेह?

सपा लंबे समय से यादव और मुस्लिम वोटों की पार्टी मानी जाती रही है. PDA के जरिए अखिलेश यादव ने गैर-यादव पिछड़ी जातियों को भी साथ जोड़ने की कोशिश की. लेकिन राजभर, निषाद, कुर्मी, मौर्य और कई अन्य पिछड़ी जातियों के बीच आज भी यह धारणा पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है कि सपा में सबसे ज्यादा महत्व यादव नेतृत्व को ही मिलता है.

विपक्षी दल भी लगातार यही आरोप लगाते हैं कि सपा की राजनीति में सामाजिक न्याय की बात तो होती है, लेकिन संगठन और सत्ता में भागीदारी के मामले में यादव समाज का वर्चस्व बना रहता है. यही वजह है कि गैर-यादव पिछड़ों का एक बड़ा वर्ग अभी भी पूरी तरह सपा के साथ सहज नजर नहीं आता.

दलितों की नाराजगी भी चुनौती

अखिलेश यादव ने पिछले कुछ वर्षों में दलित महापुरुषों, प्रतीकों और मुद्दों को प्रमुखता से उठाने की कोशिश की है. लेकिन दलित राजनीति की अपनी यादें और अपने अनुभव हैं. दलित संगठनों का एक वर्ग आरोप लगाता है कि सपा का दलित प्रेम चुनावी जरूरतों तक सीमित रहता है. कई बार यह भी कहा जाता है कि दलितों पर होने वाले अत्याचारों के मामलों में सपा का रवैया चयनात्मक दिखाई देता है. खासकर तब, जब आरोप किसी प्रभावशाली सामाजिक समूह के लोगों पर हों.

यही कारण है कि PDA के नारे के बावजूद दलित समाज का बड़ा हिस्सा अभी भी पूरी तरह सपा के साथ स्थायी रूप से जुड़ा हुआ नहीं दिखता. बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती भी समय-समय पर इसी मुद्दे को उठाकर सपा पर निशाना साधती रही हैं.

अब मुस्लिम समाज से भी उठ रहे हैं सवाल

सपा को लंबे समय से मुस्लिम वोटों का सबसे बड़ा राजनीतिक लाभार्थी माना जाता रहा है. लेकिन हाल के दिनों में मुस्लिम समाज के भीतर से भी कुछ असहज सवाल सामने आने लगे हैं. बहराइच में AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की रैली इसका एक उदाहरण मानी जा सकती है. ओवैसी ने सपा पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि सपा सरकार के दौरान भी मुसलमानों को कई गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा. उन्होंने मुजफ्फरनगर दंगों का मुद्दा भी उठाया.

सिर्फ ओवैसी ही नहीं, मुस्लिम समाज के कुछ स्थानीय नेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने भी समय-समय पर यह सवाल उठाया है कि चुनाव के समय मुस्लिमों की भूमिका तो अहम होती है, लेकिन सत्ता और संगठन में उनकी हिस्सेदारी उतनी नहीं दिखाई देती. प्रतिनिधित्व, नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी को लेकर असंतोष की आवाजें सुनाई देती रही हैं. यानी जिस अल्पसंख्यक वर्ग को PDA का सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता है, वहीं अब सवाल भी उठने लगे हैं.

2024 और 2027 में बड़ा फर्क

यहीं पर 2024 और 2027 के बीच का अंतर समझना जरूरी है. 2024 का लोकसभा चुनाव काफी हद तक भाजपा के खिलाफ विपक्षी वोटों के ध्रुवीकरण का चुनाव था. लेकिन 2027 का विधानसभा चुनाव अलग होगा. क्योंकि इन बीते करीब 3 सालों में कई समीकरण बदले हैं. बीजेपी ने गैर यादव पिछड़ी जातियों को साधा है. वहीं, समाजवादी पार्टी अकेले दिखती है. बसपा की सक्रियता और ओवैसी का लगातार सपा पर हमलावर होना भी पीडीए को चुनौती देता दिख रहा है. यही वजह है कि 2024 में सफल दिखा PDA फॉर्मूला 2027 में भी उसी प्रभाव के साथ काम करेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है.

सबसे बड़ी चुनौती बाहर नहीं, भीतर है

अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा से लड़ने की नहीं, बल्कि PDA के भीतर भरोसा बनाए रखने की है. राजनीतिक गठबंधन केवल नारों से नहीं चलते. उन्हें टिकाए रखने के लिए सम्मान, भागीदारी और प्रतिनिधित्व का एहसास भी जरूरी होता है. अगर पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समाज के बीच यह भावना मजबूत होती है कि वे सिर्फ वोट देने के लिए हैं, लेकिन फैसले लेने में उनकी बराबर की हिस्सेदारी नहीं है, तो PDA का नारा कमजोर पड़ सकता है.

लेखक डॉ अभय पांडेय (लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक विषयों पर लेखन करते रहते हैं.)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)