स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की गविष्ठि यात्रा अब गौ-रक्षा के धार्मिक अभियान से कहीं आगे निकल चुकी है. एटा-कासगंज पहुंचते ही यह यात्रा आजम खान परिवार की राजनीतिक छत्रछाया में आ गई है. सवाल उठता है कि आखिर आजम खान फैमिली को अविमुक्तेश्वरानंद में अपना भविष्य क्यों नजर आ रहा है? ये सवाल इसलिए क्योंकि गौ-रक्षा का धार्मिक आवरण ओढ़कर चल रही यह यात्रा अब साफ तौर पर समाजवादी पार्टी और आजम खान परिवार की राजनीतिक मशीन में तब्दील हो गई है.
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कासगंज की पटियाली विधानसभा में इसकी तस्वीर साफ हो गई. सपा विधायक नादिरा सुल्तान (आजम खान के भांजे की पत्नी) ने स्वागत की अगुवाई की. उनके साथ सपा की राष्ट्रीय प्रवक्ता जाहिदा सुल्तान (नादिरा की सगी बहन) भी पूरी ताकत से मौजूद रहीं. अविमुक्तेश्वरानंद ने जाहिदा सुल्तान को कासगंज में अपना विधानसभा प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया है.
विशेष उल्लेखनीय है कि जाहिदा सुल्तान केवल एक सामाजिक कार्यकर्ता नहीं हैं. वे समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता भी हैं और कासगंज विधानसभा से टिकट की दावेदार मानी जाती हैं. राजनीतिक गलियारों में उनकी पहचान एक सक्रिय सपा नेता के रूप में है. इतना ही नहीं, उनका पारिवारिक संबंध भी उस राजनीतिक नेटवर्क से जुड़ा बताया जाता है, जिसे लंबे समय से आजम खान की राजनीतिक विरासत का हिस्सा माना जाता रहा है.
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि गविष्ठि यात्रा वास्तव में गैर-राजनीतिक और सर्वदलीय जनआंदोलन है, तो उसके विधानसभा प्रतिनिधि के रूप में किसी राजनीतिक दल की राष्ट्रीय प्रवक्ता को नियुक्त करने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि पिछले कई सप्ताहों से यात्रा में जिन नेताओं की सबसे अधिक सक्रियता दिखाई दे रही है, वे लगभग सभी एक ही राजनीतिक धारा से क्यों जुड़े हुए हैं? रात्रि विश्राम की व्यवस्था से लेकर स्वागत मंचों तक, स्थानीय समन्वय से लेकर जनसभाओं तक, हर जगह एक ही राजनीतिक नेटवर्क दिखाई देना अब संयोग नहीं लगता.
सवाल यह भी उठ रहे हैं कि आखिर आजम खान परिवार को अविमुक्तेश्वरानंद में भविष्य क्यों दिख रहा है, क्या इसके पीछे कुछ ठोस राजनीतिक गणित है. क्या यह 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में यादव-मुस्लिम-पिछड़े गठजोड़ को फिर से मजबूत करने की कवायद है.
दरअसल, एटा-कासगंज जैसे क्षेत्रों में यादव, शाक्य, लोध, कुर्मी और मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका निभाते हैं. गौ-रक्षा जैसे भावनात्मक मुद्दे पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के नाम का इस्तेमाल करके सपा हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण को अपने पक्ष में मोड़ना चाहती है. अविमुक्तेश्वरानंद के तीखे भाजपा-विरोधी बयान, 'नकली हिन्दुओं की सरकार', 'कालेनेमि के लक्षण भाजपा में', योगी आदित्यनाथ पर किसी राजनेता की तरह अशोभनीय तंज और गाय को राष्ट्रमाता न बनाने का आरोप ठीक उसी एजेंडे को मजबूती देते हैं जिसकी आजम खान फैमिली को जरूरत है.
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपनी यात्रा के दौरान खुलकर 2027 में सरकार बदलने की अपील कर रहे हैं. यह सब कुछ सपा के वोट बैंक को धार देने का काम कर रहा है. जब यात्रा का स्वागत, प्रतिनिधि नियुक्ति और राजनीतिक एजेंडा आजम खान परिवार के लोगों के हाथ में हो, तो यह साफ है कि अविमुक्तेश्वरानंद अब सपा-मुस्लिम फंडेड और समर्थित प्रोपगैंडा का चेहरा बन चुके हैं.
हर कोई जानता है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद खुद ज्योतिरमठ के शंकराचार्य पद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में विवादित हैं. उन्हीं को आजम खान परिवार राजनीतिक संरक्षण और मंच दे रहा है. दरअसल, सपा को एक ऐसे चेहरे की जरूरत शुरू से थी जो हिन्दू भावनाओं को छू सके और साथ ही भाजपा-योगी पर हमला बोल सके. अविमुक्तेश्वरानंद उस भूमिका को बखूबी निभा रहे हैं.
असल में गविष्ठि यात्रा अब गौ-रक्षा से ज्यादा आजम खान फैमिली की सत्ता-रक्षा और वोट-रक्षा की यात्रा बन चुकी है. यह यात्रा हिन्दू समाज के लिए चेतावनी भी है कि धार्मिक मुद्दों का दुरुपयोग करके कौन किसका भविष्य संवारने की कोशिश कर रहा है. हिन्दू समाज को समझना होगा कि असली संत वह होता है जो धर्म की रक्षा करता है, न कि जो राजनीतिक परिवारों के भविष्य की रक्षा के लिए इस्तेमाल होता है.
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