Opinion: 'संकीर्ण स्वार्थ में राजनीतिकरण', राष्ट्रहित के मुद्दे पर 'अराजकता' फैलाने वालों को मायावती ने दिखाया आईना

यूपी तक

• 08:30 PM • 26 Jul 2026

नीट पेपर लीक और छात्र आंदोलन पर मायावती ने संतुलित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि छात्रों के भविष्य से जुड़े मुद्दों का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए. उन्होंने भ्रष्टाचार, संवैधानिक नैतिकता और शांतिपूर्ण समाधान की आवश्यकता पर जोर दिया है.

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Opinion: नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक के मुद्दे को लेकर देशभर में आक्रोश है. राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा CJP का आंदोलन अब सड़क से निकलकर संसद तक पहुंच चुका है. कई मौकों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं, जिससे माहौल तनावपूर्ण हो गया. अब यह मुद्दा पूरी तरह राजनीतिक रंग ले चुका है. विपक्ष सरकार पर हमलावर है, तो सत्ता पक्ष भी पलटवार कर रहा है.

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इसी बीच बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने इस पूरे विवाद पर एक अलग और संतुलित दृष्टिकोण रखा है. उन्होंने इसे सिर्फ सरकार और विपक्ष की लड़ाई नहीं माना, बल्कि राष्ट्रहित, विद्यार्थियों के भविष्य और संवैधानिक जिम्मेदारी से जुड़ा विषय बताया. उनका संदेश उन सभी राजनीतिक दलों के लिए एक आईना है, जो छात्रों के मुद्दे को अपने-अपने राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.

'संकीर्ण स्वार्थ' में न खो जाए छात्रों का भविष्य

मायावती ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में सबसे पहले यह स्वीकार किया कि पेपर लीक जैसी घटनाओं ने लाखों विद्यार्थियों और उनके परिवारों का भविष्य प्रभावित किया है. उन्होंने माना कि आंदोलन का विस्तार सड़क से लेकर संसद तक दिखाई दे रहा है. लेकिन इसके साथ ही उन्होंने सबसे महत्वपूर्ण बात कही कि जब किसी जनहित के मुद्दे का राजनीतिकरण होने लगता है, तो उसका मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है.

इसी संदर्भ में उन्होंने "संकीर्ण स्वार्थ में राजनीतिकरण" शब्दों का इस्तेमाल किया. उनका साफ संदेश है कि छात्रों के भविष्य जैसे गंभीर विषय को राजनीतिक लाभ का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए. जब आंदोलन समाधान की जगह राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मंच बन जाता है, तब टकराव बढ़ता है और वास्तविक मुद्दा कमजोर पड़ जाता है.

समस्या की जड़ भ्रष्टाचार, सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप नहीं

मायावती ने अपने पोस्ट में केवल पेपर लीक का ही जिक्र नहीं किया. उन्होंने कहा कि चाहे प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक का मामला हो या अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे में कथित गड़बड़ी का मुद्दा, दोनों की जड़ भ्रष्टाचार है. उनके मुताबिक, व्यवस्था में फैला भ्रष्टाचार ही ऐसी घटनाओं को जन्म देता है. इसलिए केवल राजनीतिक बयानबाजी से समाधान नहीं निकलेगा, बल्कि व्यवस्था में सुधार की जरूरत है.

बाबा साहेब की 'संवैधानिक नैतिकता' की याद

अपने संदेश में मायावती ने संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि बाबा साहेब ने संवैधानिक नैतिकता  को सुशासन की सबसे बड़ी शर्त माना था. यदि शासन और संस्थाओं में संवैधानिक नैतिकता कमजोर पड़ती है, तो भ्रष्टाचार धीरे-धीरे पूरे तंत्र को दीमक की तरह खोखला कर देता है.

यानी मायावती ने इस पूरे विवाद को केवल एक आंदोलन या एक परीक्षा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे सुशासन और संस्थागत जवाबदेही से भी जोड़ा.

सरकार ही नहीं, आंदोलनकारियों को भी नसीहत

मायावती ने सिर्फ सरकार को सलाह नहीं दी, बल्कि आंदोलनकारियों और राजनीतिक दलों को भी जिम्मेदारी का संदेश दिया. उन्होंने कहा कि सरकार, आंदोलनकारी और संवैधानिक संस्थाएं मिलकर इस संकट का शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण समाधान निकालें. इसके साथ ही उन्होंने आंदोलन का अपने-अपने "संकीर्ण स्वार्थ" के लिए इस्तेमाल करने और सड़क से लेकर संसद तक टकराव व हिंसा का माहौल बनाने को घोर अनुचित बताया.

क्या विद्यार्थियों का मुद्दा राजनीति की भेंट चढ़ रहा है?

यही मायावती के पूरे बयान का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है. उनका कहना है कि छात्र, शिक्षा और भविष्य जैसे विषय राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर होने चाहिए. आंदोलन का उद्देश्य सरकार पर दबाव बनाकर समाधान निकालना हो सकता है, लेकिन अगर वही आंदोलन राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में बदल जाए तो सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं छात्रों का होता है, जिनके लिए यह लड़ाई शुरू हुई थी.

दिल्ली में पिछले कुछ दिनों की तस्वीरें भी यही सवाल खड़े करती हैं. विरोध-प्रदर्शन के दौरान बढ़ता तनाव, पुलिस के साथ टकराव, संसद तक पहुंची सियासी लड़ाई और अलग-अलग दलों की सक्रियता ने मूल मुद्दे को पीछे धकेल दिया है. चर्चा अब छात्रों की समस्याओं से ज्यादा राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप पर केंद्रित होती दिख रही है.

मायावती की अपील क्यों मायने रखती है?

मायावती का संदेश इसीलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्होंने न तो केवल सरकार को कटघरे में खड़ा किया और न ही केवल आंदोलन का समर्थन किया. उन्होंने दोनों पक्षों से संयम और जिम्मेदारी की अपेक्षा की. उनका कहना है कि राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों का समाधान संवाद, संवैधानिक संस्थाओं की सक्रिय भूमिका और शांतिपूर्ण माहौल में ही संभव है.

आज जब हर जनआंदोलन राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा बनने लगता है, तब मायावती की यह अपील लोकतंत्र की एक बुनियादी सीख याद दिलाती है-जनहित के मुद्दों पर राजनीति हो सकती है, लेकिन ऐसा राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए जो समाधान की जगह अराजकता, टकराव और हिंसा को जन्म दे. यही संदेश उनके पूरे पोस्ट का सार भी है और यही इस समय की सबसे बड़ी जरूरत भी.

(लेखक डॉ. पतंजलि मिश्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं. समसामयिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)