Opinion: भारतीय सनातन परंपरा में संन्यास का स्थान किसी भी लौकिक सत्ता, राजनीतिक दल या सांसारिक पद से बहुत ऊपर रहा है. आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'मठाम्नाय महानुशासन' में पीठों के अधीक्षकों (शंकराचार्यों) के लिए जो नियम और आचार-संहिता तय की गई है, वह स्पष्ट कहती है कि एक संन्यासी का एकमात्र कर्तव्य राग-द्वेष, निजी महत्त्वाकांक्षा और दलीय राजनीति से ऊपर उठकर केवल धर्म की रक्षा करना है. शास्त्रकारों ने संतों को परखने के लिए पांच बहुत ही सीधी और स्पष्ट कसौटियां निर्धारित की हैं, समदर्शिता, क्षमा और दया, संतोष और संयम, सत्य और सरलता, तथा भक्ति और निर्लेपता. परंतु जब हम स्वयं को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य बताने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के हालिया बयानों, उनकी चुनावी सक्रियता और उनके सार्वजनिक आचरण को देखते हैं, तो ‘मठाम्नाय महानुशासन’ के सिद्धांत टूटते हुए दिखाई देते हैं. उनके वक्तव्य सनातन की इन पांचों कसौटियों पर न सिर्फ पूरी तरह विफल साबित होते हैं, बल्कि एक तय राजनीतिक एजेंडे और व्यक्तिगत विरोध की पुष्टि करते हैं. एक साधारण इंसान भी उनका वर्तमान आचरण देखकर बता सकता है कि वह एक संन्यासी के स्थापित आदर्शों के विपरीत जा रहे हैं.
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समदर्शिता का अभाव : निजी विरोध और एकतरफा राजनीतिक झुकाव
शास्त्रकारों के अनुसार, धर्मपीठ पर बैठे महापुरुष की दृष्टि में संपूर्ण संसार के लिए समानता होनी चाहिए. परंतु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के आचरण से यह समदर्शिता पूरी तरह गायब है और इसकी जगह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रति एक गहरे व्यक्तिगत विरोध ने ले ली है. मुख्यमंत्री को 'मांस का व्यापारी' कहना और 'मूंछ नहीं है, फिर भी मूंछों पर ताव दे रहे हैं' जैसी हल्की टिप्पणियां करना किसी शंकराचार्य के पद की गरिमा के अनुरूप नहीं है और एक संन्यासी की समान दृष्टि के बिल्कुल उलट है.
इससे भी ज्यादा चिंताजनक उनका राजनीतिक पक्षपात है. वे उन कथित सेक्युलर दलों (सपा, कांग्रेस, राजद) के प्रति बेहद नरम और सहयोगी दिखते हैं, जिनका इतिहास हमेशा सनातन और हिंदू हितों के विरोध का रहा है. बिहार के चुनाव में एक ऐसे दल को परोक्ष रूप से फायदा पहुंचाने के लिए अपना उम्मीदवार खड़ा कर देना, जो सिर्फ मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के लिए जाना जाता है, उनके संन्यासी धर्म पर बड़ा सवाल खड़ा करता है. यहां तक कि तमिलनाडु की टीवीके पार्टी द्वारा गोहत्या के समर्थन में कोर्ट जाने को 'टेक्निकल' मामला बताकर पल्ला झाड़ लेते हैं.
इसी तरह, उत्तर प्रदेश के चुनाव से ठीक पहले ‘गविष्टि यात्रा’ के नाम पर विधानसभाओं में निकाली जा रही उनकी यात्राओं को समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं के दम पर चलाना और उसमें उन नेताओं का स्वागत स्वीकार करना, जिनका अतीत हिंदू विरोधी रहा है, उनके राजनीतिक एजेंडे को साफ कर देता है.
वे अब यह कहानी गढ़ रहे हैं कि 'अखिलेश यादव ने उन्हें भाजपाई समझकर पिटवाया था.' सवाल उठता है कि क्या कोई भी सत्ता इतनी नादान हो सकती है कि वह आंदोलन के मुख्य चेहरे को न पहचान सके? 2015 के काशी आंदोलन में समाज के सभी वर्गों के साथ-साथ विश्व हिंदू परिषद और भाजपा तक ने उनका खुलकर साथ दिया था, परंतु आज राजनीतिक लाभ के लिए वे इन सब बातों को छिपाकर सपा-कांग्रेस के हित में खड़े दिखाई देते हैं.
क्षमा भाव से दूरी : आक्रामक भाषा और देश की संप्रभुता पर चोट
'क्षमा और दया' संन्यासी जीवन का सबसे बड़ा आभूषण माना जाता है, जो समाज को शांति का संदेश देता है. परंतु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के व्यावहारिक जीवन में इस शांत भाव का घोर अभाव दिखता है. सार्वजनिक मंचों और मीडिया के सामने बार-बार झल्लाहट दिखाना, चीखना-चिल्लान, गालियां देना, तीखे और कड़वे शब्दों का इस्तेमाल करना और कठिन सवाल करने वाले पत्रकारों को 'गोदी मीडिया' कहकर डांटना उनके भीतर क्षमा और धैर्य की कमी को ही प्रदर्शित करता है.
इससे भी आगे बढ़कर, उनके कुछ बयान भारत की संप्रभुता और संवैधानिक व्यवस्था पर सीधा प्रहार करते हैं. कश्मीर के मामले में पुरानी 'रणबीर दंड संहिता' की वकालत करना और धारा 370 को हटाए जाने का विरोध करना सीधे तौर पर देश की अखंडता को चुनौती देने जैसा है. यह सिद्ध करता है कि उनका आचरण आध्यात्मिक मार्ग से भटककर बेहद आक्रामक हो चुका है. वे उन ताकतों को बढ़ावा दे रहे हैं जो देश की व्यवस्था को कमजोर करना चाहती हैं.
संतोष का त्याग : मठ-मंदिरों की संपत्ति पर दृष्टि और अति महत्त्वाकांक्षा
'मठाम्नाय महानुशासन' स्पष्ट निर्देश देता है कि पीठों की स्थापना धन, वैभव या सत्ता इकट्ठा करने के लिए नहीं, बल्कि केवल आत्मज्ञान और शास्त्रों के प्रचार के लिए हुई है. संन्यास का असली मतलब ही 'संतोष और संयम' है, जिसका अर्थ है सांसारिक चीजों और नियंत्रण की इच्छा से पूरी तरह मुक्त हो जाना. परंतु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बयानों में इसके विपरीत एक बड़ी संस्थागत और आर्थिक नियंत्रण की महत्त्वाकांक्षा साफ दिखाई देती है.
वे देश के मठ-मंदिरों की व्यवस्थाओं पर अपना अधिकार जमाने के लिए उतावले नजर आने लगे हैं. उनका यह कहना कि 'मंदिरों में बहुत पैसा देखकर आरएसएस वाले उन पर कब्जा कर रहे हैं, इसलिए सबको वहां से हटाओ,' यह उनकी आध्यात्मिक विरक्ति को नहीं, बल्कि मंदिरों की अकूत संपत्ति के प्रति खिंचाव को दिखाता है. वे बार-बार अयोध्या के 'श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट' को भंग करके एक ऐसा 'धर्माचार्यों का बोर्ड' बनाने की जिद कर रहे हैं, जिसका सारा जिम्मा उनके और उनके करीबियों के हाथ में आ जाए. करोड़ों हिंदुओं की आस्था के केंद्र भव्य श्रीराम मंदिर को 'भारतीय जनता पार्टी का कार्यालय' कहना और उसमें 'चढ़ावे की चोरी' के झूठे आरोप लगाना सनातन आस्था का घोर अपमान है. स्वयं उनकी अपनी गद्दी (ज्योतिषपीठ) के असली होने को लेकर भी लंबे समय से कोर्ट और धार्मिक हलकों में विवाद चल रहे हैं. जब संन्यासी खुद गद्दियों के झगड़ों, ट्रस्टों के नियंत्रण और चढ़ावे के पैसों के जोड़-तोड़ में इस हद तक उलझ जाए, तो संतोष और संयम के आदर्श अपने आप खत्म हो जाते हैं.
सत्य की सरलता का लोप: कुतर्कों और भ्रामक आंकड़ों का सहारा
'सत्य और सरलता' का सीधा अर्थ है किसी भी बात को बिना किसी लाग-लपेट या हेर-फेर के समाज के सामने वैसे ही रख देना जैसी वह है. परंतु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बयानों में सत्य की यह सहज सरलता कहीं दिखाई नहीं देती. वे अपनी राजनीतिक यात्राओं और सभाओं में भीड़ जुटाने और ध्यान खींचने के लिए खुलेआम भ्रामक और जमीनी हकीकत से परे आंकड़े पेश करते हैं. उनका यह दावा कि 'उत्तर प्रदेश में केरल और बंगाल से भी ज्यादा तेजी से गायें कट रही हैं और यूपी बीफ एक्सपोर्ट का सबसे बड़ा केंद्र है,' पूरी तरह से एक झूठा, मनगढ़ंत और सनसनीखेज बयान है, जिसका उद्देश्य केवल सरकार को बदनाम करना है.
इतना ही नहीं, अपनी बातों को सही साबित करने के लिए वे भाषा और इतिहास की ऐसी अजीबोगरीब व्याख्याएं गढ़ते हैं जो विद्वता की कसौटी पर कहीं नहीं टिकतीं. उदाहरण के लिए, यह कहना कि 'अलीगढ़ एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है जहां भौरा भी प्रवेश न कर सके,' यह भाषाई और ऐतिहासिक रूप से एक हास्यास्पद कुतर्क के अलावा कुछ नहीं है. जबकि पूरी दुनिया जानती है कि प्रसिद्ध मुगल गवर्नर नजफ अली खान या 'अली कुली खान' के नाम पर इस शहर और किले का नाम 'अलीगढ़' पड़ा था.
(लेखक, दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक विषयों पर लेखन करते रहते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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