उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों भाजपा के भीतर एक मजबूत टीम वर्क दिखाई दे रहा है. राज्य के दोनों उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और केशव प्रसाद मौर्य एक टीम की तरह मुख्यमंत्री के साथ मिलकर सरकार के कामों और योजनाओं को आगे बढ़ा रहे हैं और मिलकर अपनी बात जनता के बीच रख रहे हैं. इसके उलट, समाजवादी पार्टी में तालमेल की कमी दिखती है, जहां सारे फैसले केवल बड़े नेतृत्व के स्तर पर ही होते हैं. वहां पार्टी के दूसरे नेताओं को खुलकर अपनी बात रखने का मौका कम ही मिलता है और पूरी चर्चा का केंद्र केवल मुख्य नेता ही रहते हैं. टीवी चैनलों और बड़े कार्यक्रमों में भी ज्यादातर सिर्फ अखिलेश यादव ही सपा का पक्ष रखते नजर आते हैं. वहीं भाजपा के पास अपनी बात रखने के लिए नेताओं और प्रवक्ताओं की एक बड़ी टीम है. ये नेता टीवी की चर्चाओं में पूरी तैयारी, आंकड़ों और अनुशासन के साथ अपनी पार्टी का पक्ष रखते हैं.
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मजबूत संगठन बनाम परिवार केंद्रित व्यवस्था
किसी भी राजनीतिक दल की लंबे समय की सफलता और मजबूती उसके संगठन के ढांचे पर टिकी होती है. भाजपा में अलग-अलग मोर्चे, कमेटियां, महिला और युवा विंग जमीनी स्तर पर साल के बारहों महीने काम करते हैं. यहां बूथ स्तर के छोटे से छोटे कार्यकर्ता से लेकर बड़े नेताओं तक बातचीत का एक सीधा रास्ता बना रहता है, जो चुनाव के अलावा आम दिनों में भी जनता के बीच सक्रिय रहते हैं. इसके विपरीत, समाजवादी पार्टी के संगठन में इस तरह के लगातार बने रहने वाले काम की कमी दिखती है. वहां अहम फैसले लेने का काम केवल कुछ खास बड़े नेताओं और परिवार के लोगों तक ही सीमित रहता है. इसका असर यह होता है कि आम कार्यकर्ताओं को अपनी पहचान और काम दिखाने के लिए केवल चुनाव आने का इंतजार करना पड़ता है, जिससे जमीन पर पार्टी की पकड़ कमजोर हो जाती है.
कार्यकर्ताओं का अनुशासन और काम करने का तरीका
दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के व्यवहार और काम करने के तरीके में भी बड़ा अंतर देखने को मिलता है. भाजपा में अनुशासन को सबसे जरूरी माना जाता है. वहां हर कार्यकर्ता से यह उम्मीद की जाती है कि वह पार्टी के नियमों और मर्यादाओं में रहकर ही लोगों के बीच काम करे. दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं पर अक्सर सार्वजनिक जीवन में कम अनुशासित होने और मनमानी करने के आरोप लगते रहे हैं. जानकारों का मानना है कि जब किसी पार्टी के लोग अनुशासन में रहकर काम करते हैं, तो जमीन पर उनका काम ज्यादा अच्छा और भरोसेमंद दिखता है. इसके उलट, जब कार्यकर्ताओं में नियमों की कमी होती है और उन पर नेतृत्व का काबू नहीं रहता, तो इससे आम जनता के बीच पार्टी की छवि खराब होती है.
सबको साथ लेकर चलने की नीति बनाम जातिगत राजनीति
सोचने और नीतियां बनाने के तरीके में भी दोनों पार्टियों का रास्ता अलग है. समाजवादी पार्टी का पूरा ध्यान आज भी अपनी पुरानी जातिगत राजनीति और खास सामाजिक समीकरणों पर ही टिका रहता है, जिससे उनकी नीतियां एक तय दायरे से बाहर नहीं निकल पातीं. इसके विपरीत, भाजपा एक ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश कर रही है जिसमें समाज के सभी वर्गों चाहे वे अगड़े हों, पिछड़े हों, दलित हों या गरीब हों, को साथ लेकर चलने का दावा किया जाता है. भाजपा अपनी नीतियों में हर वर्ग को आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी और संगठन में जगह देने की बात करती है. यह तरीका सपा के सीमित जातिगत समीकरणों के मुकाबले ज्यादा बड़ा और असरदार साबित हो रहा है, जिससे समाज के हर वर्ग के लोग पार्टी से जुड़ रहे हैं.
चुनाव के समय जमीन पर काम का असर
जब चुनाव का समय आता है और जमीन पर काम की परीक्षा होती है, तब दोनों पार्टियों का यह फर्क और भी साफ हो जाता है. भाजपा का पन्ना प्रमुख और बूथ स्तर का कार्यकर्ता सरकारी योजनाओं और पार्टी के संदेश को घर-घर पहुंचाने के लिए पूरी ताकत से जुट जाता है, क्योंकि वे एक व्यवस्थित तंत्र का हिस्सा हैं. दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी का काम ज्यादातर स्थानीय स्तर के बड़े चेहरों और व्यक्तिगत वफादारी पर ही निर्भर करता है. अनुशासित कार्यकर्ताओं के योजनाबद्ध काम और केवल चुनावी माहौल में जुटने वाली भीड़ के बीच का यही अंतर आखिरकार चुनावी नतीजों में नजर आता है. समझदार वोटर भी अब इस बात को महसूस करने लगे हैं कि बेहतर व्यवस्था के लिए एक मजबूत और अनुशासित संगठन का होना कितना जरूरी है.
साल 2027 का चुनाव और संगठन की असली परीक्षा
आने वाले 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए यह साफ हो रहा है कि मुकाबला केवल दो पार्टियों का नहीं, बल्कि काम करने के दो अलग तरीकों का है. भाजपा अपनी सांगठनिक मजबूती, अनुशासित कार्यकर्ताओं और सबको साथ लेकर चलने वाले विकास के दम पर वोटरों के बीच अपनी पैठ बढ़ा रही है. बूथ स्तर पर फैला भाजपा का यह सक्रिय ढांचा विपक्ष के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है. दूसरी तरफ, परिवार के दायरे में सिमटकर फैसले लेने वाली और आपसी तालमेल की दिक्कतों से जूझ रही समाजवादी पार्टी के लिए इस अनुशासित संगठन के सामने खुद को मजबूत साबित करना एक बड़ी परीक्षा होगी. उत्तर प्रदेश की जनता आखिरकार उसी मॉडल को पसंद करेगी जो ज्यादा अनुशासित, सबको साथ लेकर चलने वाला और हमेशा सक्रिय रहने वाला हो.
(लेखक भावेष पांडेय इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में वकील हैं. राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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