Opinion : आज भले ही उत्तर प्रदेश में महिलाएं स्वयं को सुरक्षित महसूस करती हैं. आधी रात को भी बेखौफ होकर कहीं भी आ-जा सकती हैं, नौकरी और व्यापार कर सकती हैं और अपनी जिंदगी महफूज ढंग से जी सकती हैं. उनकी ओर आंख उठाने वालों का आज योगी सरकार क्या अंजाम करती है, वह हर कोई जानता है. लेकिन 10 साल पहले अखिलेश यादव सरकार के शासनकाल में हालात बिल्कुल अलग थे. सोमवार को ही ओम प्रकाश राजभर ने सोशल मीडिया पर बुलंदशहर गैंगरेप कांड की याद दिलाकर उसी अंधकारपूर्ण दौर को फिर से राष्ट्रीय चर्चा में ला दिया है.
ADVERTISEMENT
29 जुलाई 2016 की वह जघन्य घटना आज भी यूपी की कानून-व्यवस्था के इतिहास में एक काला अध्याय बनी हुई है. इस मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया था और अखिलेश यादव सरकार की महिला सुरक्षा व नारी सम्मान को लेकर खूब किरकिरी हुई थी. इस घटना के बाद कानून-व्यवस्था को लेकर तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार को भारी आलोचना का सामना करना पड़ा था. पीड़ित परिवार को करीब नौ साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार इंसाफ मिला. साल 2025 में विशेष पॉक्सो अदालत ने इस मामले में दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी.
क्या था पूरा मामला?
करीब 10 साल पहले 29 जुलाई 2016 को नोएडा का एक परिवार कार से शाहजहांपुर जा रहा था. नोएडा से शाहजहांपुर की दूरी करीब 321 किलोमीटर है, लेकिन परिवार अभी नोएडा से लगभग 70 किलोमीटर ही आगे बढ़ा था कि बदमाशों ने हाईवे पर लोहे की कीलें बिछाकर उनकी कार रोक दी.
कार रुकते ही बदमाशों ने पूरे परिवार को बंधक बना लिया. इसके बाद परिवार के साथ लूटपाट की गई. इसी दौरान परिवार की एक महिला और उसकी 14 वर्षीय बेटी को पास के खेत में ले जाकर सामूहिक दुष्कर्म किया गया. वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी मौके से फरार हो गए.
इस घटना से पूरे देश में पैदा हुआ आक्रोश
इस घटना ने पूरे देश में आक्रोश पैदा कर दिया था. तत्कालीन सपा सरकार में कानून-व्यवस्था को लेकर लोग आक्रोश में थे. अखिलेश यादव सरकार घिर रही थी. इस बीच अखिलेश यादव के सबसे पावरफुल मंत्री आजम खान का विवादित बयान तत्कालीन राज्य सरकार की आलोचना का कारण बन गया.
क्या था आजम खान का विवादित बयान?
आजम खान ने बुलंदशहर की घटना को राजनीतिक साजिश करार दिया था. उन्होंने कहा, 'कभी-कभी राजनीतिक साजिश के तहत सरकार को बदनाम करने के लिए भी ऐसी घटनाएं कराई जाती हैं.' उनके इस बयान की विपक्षी दलों और महिला संगठनों ने कड़ी आलोचना की थी. आरोप लगा कि सरकार इस तरह की घटना को हल्के में लेकर इसे राजनीतिक साजिश बता रही है. इस बयान की वजह से सपा सरकार की काफी आलोचना हुई.
जांच पर उठे सवाल
घटना के बाद बुलंदशहर पुलिस ने मुख्य आरोपी सलीम बावरिया समेत कई लोगों को गिरफ्तार किया. हालांकि शुरुआती जांच को लेकर पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठे. यहां तक कि बुलंदशहर के तत्कालीन एसएसपी वैभव कृष्ण सहित मामले की जांच से संबंधित सभी अधिकारियों को निलंबित करना पड़ा. बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दी गई.
कौन थे आरोपी?
सीबीआई जांच में सामने आया कि वारदात को कुख्यात बावरिया गैंग के सदस्यों ने अंजाम दिया था. जांच के बाद जिन आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चला, उनमें जुबैर उर्फ सुनील उर्फ परवेज, साजिद, धर्मवीर उर्फ जितेंद्र, नरेश उर्फ संदीप बहेलिया और सुनील कुमार उर्फ सागर शामिल थे.
सीबीआई जांच में शुरुआती पुलिस कार्रवाई की कई खामियां भी सामने आईं. इससे न सिर्फ कानून-व्यवस्था पर सवाल उठे, बल्कि घटना के बाद हुई पुलिस जांच को लेकर भी तत्कालीन सरकार की काफी आलोचना हुई. पीड़ित परिवार को करीब नौ वर्षों की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद योगी सरकार में इंसाफ मिला.
अदालत का फैसला
अदालत में लंबी सुनवाई के बाद 20 दिसंबर 2025 को बुलंदशहर की विशेष पॉक्सो अदालत ने पांच आरोपियों को दोषी करार दिया. इसके दो दिन बाद 22 दिसंबर 2025 को अदालत ने सभी पांच दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई. इसके साथ ही सभी दोषियों पर 1.81 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया. इस मामले का मुख्य आरोपी सलीम बावरिया मुकदमे के दौरान ही वर्ष 2019 में मौत का शिकार हो गया था.
मामला बना था राष्ट्रीय मुद्दा
बुलंदशहर गैंगरेप केस, उस समय उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर सबसे बड़े सवालों में से एक बन गया था. हाईवे पर खुलेआम बेखौफ होकर परिवार को बंधक बनाकर लूटपाट और मां-बेटी के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था.
घटना के बाद तत्कालीन सपा सरकार जनता के निशाने पर आ गई. महिलाओं की सुरक्षा, पुलिस की कार्यशैली और अपराधियों के बढ़ते मनोबल को लेकर सरकार की व्यापक आलोचना हुई. शुरुआती पुलिस जांच पर उठे सवालों और बाद में मामला सीबीआई को सौंपे जाने से यह केस लंबे समय तक राष्ट्रीय बहस का विषय बना रहा. करीब 10 साल बाद भी यह मामला आज उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा से जुड़े सबसे चर्चित मामलों में गिना जाता है. आज ओम प्रकाश राजभर द्वारा इस घटना को याद दिलाए जाने का मतलब साफ है, हमें उस दौर को कभी नहीं भूलना चाहिए, जब यूपी में महिलाओं की सुरक्षा महज एक सपना थी. आज भले हालात बदले हैं, लेकिन अतीत की गलतियों से सबक लेकर आगे बढ़ना ही सही रास्ता है.
(लेखक आशुतोष सिंह, दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं. राजनैतिक और समसामयिक विषयों पर लेखन करते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
ADVERTISEMENT











