Opinion: 'ढांचा बदलने' की बात क्यों? क्या चंदा चोरी की आड़ में नया राजनीतिक खेल खेल रही है सपा!

यूपी तक

• 08:14 PM • 09 Jul 2026

Ram Mandir Politics: राम मंदिर में कथित चढ़ावा चोरी के मामले पर समाजवादी पार्टी के हमलों और अखिलेश यादव के 'ढांचा बदलने' वाले बयान के बाद राजनीतिक बहस तेज हो गई है. पढ़िए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में अधिवक्ता भावेष पांडेय का यह विशेष ओपिनियन कि कैसे अब यह पूरा मामला वित्तीय अनियमितता से आगे बढ़कर आस्था और राजनीति का केंद्र बन गया है.

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Opinion: किसी भी मंदिर, संस्था या ट्रस्ट में अगर वित्तीय गड़बड़ी होती है तो उसकी जांच होनी चाहिए, दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए और जवाबदेही तय होनी चाहिए. लेकिन समाजवादी पार्टी जिस तरह राम मंदिर के पूरे मामले को आगे बढ़ा रही है, उसने बहस की दिशा ही बदल दी है. अब सवाल चोरी का कम और राम मंदिर का ज्यादा होने लगा है. यही वजह है कि यह मामला अब सिर्फ एक अनियमितता का नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का विषय बन गया है.

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समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का वह बयान, जिसमें उन्होंने कहा कि "राम मंदिर का सिर्फ सांचा नहीं, पूरा ढांचा बदलना चाहिए", इस पूरी बहस का सबसे बड़ा केंद्र बन गया. अगर चर्चा केवल गड़बड़ी तक सीमित होती तो सवाल जांच, कार्रवाई और जवाबदेही तक रहते. लेकिन "ढांचा बदलने" जैसी टिप्पणी ने बहस को सीधे राम मंदिर के स्वरूप तक पहुंचा दिया. लेकिन यह पहला मौका भी नहीं है जब समाजवादी पार्टी ने राम मंदिर को लेकर ऐसा आक्रामक रुख अपनाया हो.

कुछ दिन पहले पार्टी के आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से एक वीडियो साझा किया गया, जिसमें यह संदेश देने की कोशिश की गई कि "रामलला अयोध्या छोड़कर चले गए हैं." उस वीडियो से ये सवाल उठा कि अगर उद्देश्य केवल चोरी के खिलाफ आवाज उठाना था, तो फिर भगवान राम और मंदिर की छवि को इस तरह राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनाने की जरूरत क्यों पड़ी?

यही वह बिंदु है जहां यह पूरा विवाद चोरी से निकलकर आस्था तक पहुंच जाता है. राम मंदिर करोड़ों हिंदुओं की श्रद्धा का केंद्र है. यह केवल एक भवन नहीं, बल्कि सदियों तक चले आंदोलन, लाखों लोगों के संघर्ष, न्यायिक प्रक्रिया और करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं का परिणाम है. इसलिए जब किसी घटना के बहाने पूरे मंदिर की संरचना, उसकी विश्वसनीयता या उसकी प्रतीकात्मक छवि पर सवाल उठने लगें, तो स्वाभाविक रूप से राजनीतिक मंशा पर भी चर्चा होती है.

राम मंदिर और सपा का पुराना राजनीतिक टकराव

अगर समाजवादी पार्टी के राजनीतिक इतिहास को देखें तो राम मंदिर का मुद्दा उसके लिए हमेशा सहज नहीं रहा. 1990 में कारसेवकों पर गोली चलाने का फैसला मुलायम सिंह यादव की सरकार के दौरान हुआ. यही घटना आगे चलकर समाजवादी पार्टी की सबसे बड़ी राजनीतिक पहचान और सबसे बड़ा विवाद दोनों बन गई. वर्षों तक बीजेपी इसी मुद्दे को उठाकर समाजवादी पार्टी पर हिंदू विरोधी राजनीति का आरोप लगाती रही.

बाद के वर्षों में भी पार्टी के कई नेताओं के बयान लगातार विवादों में रहे. समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव ने संसद में कहा था कि कारसेवकों पर गोली चलाने के फैसले पर उन्हें कोई पछतावा नहीं है. यह बयान भी लंबे समय तक राजनीतिक बहस का हिस्सा बना रहा.

यानी इतिहास गवाह है कि राम मंदिर का मुद्दा आते ही समाजवादी पार्टी और विवाद साथ-साथ चलते रहे हैं.

जब जश्न था तब खामोशी, जब विवाद आया तब सक्रियता

राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का अवसर देश के लिए ऐतिहासिक क्षण था. देशभर में उत्सव का माहौल था. करोड़ों लोगों ने इसे अपनी आस्था का पर्व माना. लेकिन उस समय समाजवादी पार्टी की ओर से वैसा उत्साह दिखाई नहीं दिया, जैसा आज कथित दान चोरी के मामले में दिखाई दे रहा है.

अब स्थिति यह है कि मंदिर से जुड़ी किसी भी नकारात्मक खबर पर पार्टी सबसे पहले प्रतिक्रिया देती है. सोशल मीडिया पर अभियान चलता है. वीडियो बनाए जाते हैं. पोस्टर जारी होते हैं. बयान दिए जाते हैं. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर पार्टी की सक्रियता केवल विवादों के समय ही क्यों दिखाई देती है?

'ढांचा' शब्द पर क्यों हो रही सबसे ज्यादा चर्चा?

राजनीति में शब्द कभी सामान्य नहीं होते. खासकर तब, जब विषय अयोध्या और राम मंदिर जैसा संवेदनशील हो. अखिलेश यादव का "ढांचा बदलने" वाला बयान इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि अयोध्या आंदोलन के दौरान बाबरी मस्जिद को भी लंबे समय तक "विवादित ढांचा" कहा जाता था. ऐसे में जब राम मंदिर के संदर्भ में "ढांचा" शब्द इस्तेमाल होता है, तो उसके राजनीतिक और प्रतीकात्मक अर्थ भी निकाले जाते हैं.

क्या दो निशाने साधने की कोशिश?

समाजवादी पार्टी की राजनीति लंबे समय तक एमवाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण के इर्द-गिर्द घूमती रही है. हाल के वर्षों में पार्टी ने पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नया नारा दिया, लेकिन राम मंदिर का मुद्दा आते ही उसकी राजनीतिक भाषा फिर पुराने विवादों की याद दिलाने लगती है.

ऐसे में ये चर्चा तेज है कि क्या पार्टी एक साथ दो राजनीतिक संदेश देना चाहती है. एक तरफ बीजेपी को घेरने के लिए राम मंदिर की व्यवस्था पर लगातार सवाल उठाना और दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद विवाद से जुड़ी पुरानी राजनीतिक भावनाओं को फिर से जीवित करना.

सवाल सिर्फ चोरी का नहीं, राजनीति की दिशा का भी है

अगर किसी व्यक्ति ने गलत किया है तो कार्रवाई उसी पर होनी चाहिए. लेकिन जब चोरी की चर्चा धीरे-धीरे राम मंदिर, उसकी व्यवस्था, उसकी विश्वसनीयता और उसके पूरे स्वरूप तक पहुंच जाए, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर राजनीतिक लक्ष्य क्या है. आज बहस इस बात की नहीं है कि दोषियों पर कार्रवाई हो या नहीं. बहस इस बात की है कि क्या एक घटना के बहाने पूरे राम मंदिर को राजनीतिक विवाद का केंद्र बनाया जा रहा है.

(लेखक भावेष पांडेय, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में अधिवक्ता हैं. राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)