Opinion: दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रोटेस्ट ने इंडिया गठबंधन के भीतर छिपे मतभेदों को एक बार फिर उजागर कर दिया है. समाजवादी पार्टी (सपा) इस प्रोटेस्ट को खुलकर समर्थन दे रही है. जबकि कांग्रेस केंद्र की राजनीति में पूरी तरह खामोश नजर आ रही है. यह घटनाक्रम गठबंधन की एकता पर गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है. समाजवादी पार्टी ने सीजेपी प्रोटेस्ट में सक्रिय भूमिका निभाई है. डिंपल यादव समेत सपा के कई सांसद मंच पर पहुंचकर प्रोटेस्ट को मजबूती दे चुके हैं. अखिलेश यादव की पार्टी लगातार इस आंदोलन के साथ खड़ी दिख रही है. यह समर्थन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सपा मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश की क्षेत्रीय राजनीति का प्रतिनिधित्व करती है. फिर भी वह दिल्ली के इस प्रोटेस्ट में इतनी खुली भागीदारी दिखा रही है.
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दिलचस्प बात यह है कि इंडिया गठबंधन के भीतर लंबे समय से एक अनकही समझ बनी हुई थी. लखनऊ में अखिलेश यादव और दिल्ली में राहुल गांधी-गठबंधन के दोनों प्रमुख चेहरे अलग-अलग केंद्रों से ताकत हासिल करते हुए एक-दूसरे के पूरक बने रहे. सपा और कांग्रेस के बीच इस बुनियादी समझ पर आमतौर पर कोई मतभेद नहीं रहा. लेकिन सीजेपी प्रोटेस्ट के मामले में यह समझ टूटती दिख रही है.
कांग्रेस जो केंद्र की राजनीति में सबसे ताकतवर विपक्षी दल मानी जाती है, इस पूरे प्रोटेस्ट के दौरान चुप्पी साधे हुए है. पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक समर्थन या नेताओं की सक्रिय भागीदारी नहीं दिखी. यह खामोशी सपा की आक्रामक मुद्रा से बिल्कुल विपरीत है. सपा के सांसद मंच पर दिख रहे हैं. जबकि कांग्रेस के शीर्ष नेता इस मुद्दे से दूरी बनाए हुए हैं.
मतभेद के कारण
यह मतभेद महज संयोग नहीं लगता. ऐसा लगता है कि कांग्रेस शायद सीजेपी प्रोटेस्ट को अपनी राष्ट्रीय छवि या भविष्य की रणनीति के अनुकूल नहीं मान रही है. ऐसे आंदोलनों में उलझकर वह अपने विकल्प सीमित नहीं करना चाहती. दूसरी तरफ सपा उत्तर प्रदेश में अपनी क्षेत्रीय ताकत को बनाए रखने और विपक्षी एकता का संदेश देने के लिए इस प्रोटेस्ट को अवसर के रूप में देख रही है. दोनों दलों के रुख में स्पष्ट अंतर उभर रहा है. जहां सपा आंदोलन को खुला समर्थन देकर अपनी सक्रियता दिखा रही है. वहीं कांग्रेस रणनीतिक चुप्पी अपनाकर भविष्य के लिए संभावनाएं खुली रखना चाहती है. यह अंतर गठबंधन के भीतर समन्वय की कमी को उजागर करता है.
सीजेपी प्रोटेस्ट पर कांग्रेस और सपा के अलग-अलग रुख से इंडिया गठबंधन की एकता पर सवाल उठ रहे हैं. अगर गठबंधन के प्रमुख दल किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर एकमत नहीं हो पा रहे हैं, तो बड़े चुनावों में समन्वय कैसे होगा? यूपी जैसे राज्य में जहां सपा और कांग्रेस दोनों की भूमिका अहम है. ऐसे मतभेद भविष्य के गठबंधन को कमजोर कर सकते हैं. अभी तक इस बदलती राजनीतिक धारा के पूरे निहितार्थ सामने नहीं आए हैं. लेकिन एक बात साफ है-इंडिया गठबंधन के दलों के बीच सीजेपी प्रोटेस्ट को लेकर एकराय नहीं है. सपा की सक्रियता और कांग्रेस की खामोशी इस अंतर को सार्वजनिक रूप से उजागर कर रही है.
गठबंधन की सफलता के लिए क्षेत्रीय और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सहमति जरूरी है. फिलहाल सीजेपी प्रोटेस्ट ने सपा और कांग्रेस के बीच मौजूद रणनीतिक मतभेदों को सामने ला दिया है. आने वाले समय में यह अंतर और गहरा होता है या दोनों दल इसे संभाल लेते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा.
लेखक-भावेष पांडेय (इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में अधिवक्ता हैं. राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखिक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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