Opinion: यूपी में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. इसे लेकर सभी राजनीतिक दल पूरी ताकत के साथ मैदान में उतर चुके हैं. एक तरफ भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी कर इतिहास रचने की कोशिश में है तो दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के सहारे सत्ता में वापसी का सपना देख रही है.
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सपा प्रमुख अखिलेश यादव लगातार दावा कर रहे हैं कि जिस तरह उनकी पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में शानदार प्रदर्शन किया था उसी तरह विधानसभा चुनाव में भी वह वही करिश्मा दोहराएंगे. लेकिन सवाल यह है कि क्या वाकई पीडीए का जादू विधानसभा चुनाव में भी चलेगा? क्या लोकसभा चुनाव वाला समीकरण जस का तस बना हुआ है? इसका जवाब समझने के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव से लेकर अब तक के करीब दो साल के राजनीतिक घटनाक्रम और चुनावी नतीजों को समझना होगा.
लोकसभा चुनाव 2024 में क्या हुआ था?
लोकसभा चुनाव 2024 में सपा, कांग्रेस और विपक्षी दलों ने एक बड़ा नैरेटिव खड़ा किया. दावा किया गया कि अगर भाजपा दोबारा सत्ता में आई तो संविधान बदल दिया जाएगा. इस मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया पर व्यापक अभियान चलाया गया. विपक्षी नेताओं ने अपनी रैलियों और सभाओं में लगातार यह संदेश देने की कोशिश की कि संविधान खतरे में है और उसे बचाने के लिए भाजपा को रोकना जरूरी है.
इसका असर खासकर दलित और पिछड़े वर्गों के बीच देखने को मिला. बड़ी संख्या में ऐसे वोटर, जो 2014 के बाद भाजपा के साथ जुड़े थे, विपक्ष की ओर शिफ्ट हुए. सपा और कांग्रेस को इसका सीधा राजनीतिक लाभ मिला और उत्तर प्रदेश में भाजपा को अपेक्षा से बड़ा झटका लगा.
लेकिन इसके बाद तस्वीर बदलने लगी
लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा ने आत्ममंथन किया. भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत यही मानी जाती है कि वह चुनावी झटकों से जल्दी सीखती है और अपनी रणनीति में तेजी से बदलाव करती है.
लोकसभा चुनाव में संविधान और जातीय समीकरणों के जरिए जिस तरह विपक्ष ने भाजपा के सामाजिक आधार में सेंध लगाई, उसे पार्टी ने गंभीरता से लिया. इसके बाद भाजपा ने इस चुनौती का जवाब खोजने पर काम शुरू किया और अगर लोकसभा चुनाव के बाद हुए विभिन्न राज्यों के चुनावों को देखें तो ऐसा लगता है कि भाजपा ने काफी हद तक इसका समाधान भी निकाल लिया.
पीडीए की राजनीति का जवाब
लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में विधानसभा चुनाव हुए. इनमें महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा ने शानदार जीत दर्ज की. इसी दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक नारा दिया 'बंटोगे तो कटोगे.' बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे आगे बढ़ाते हुए कहा-'एक रहोगे तो सेफ रहोगे.'
इन नारों को केवल राजनीतिक स्लोगन समझने की भूल नहीं करनी चाहिए. दरअसल, भाजपा ने इसके जरिए एक बड़ा संदेश देने की कोशिश की. संदेश यह था कि जातियों में बंटकर राजनीति करने के बजाय हिंदू समाज की एकता ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है. भाजपा ने अगड़ा, पिछड़ा और दलित की अलग-अलग पहचान के बजाय साझा हिंदू पहचान को मजबूत करने का प्रयास किया. यही पीडीए की राजनीति के जवाब में भाजपा का सबसे बड़ा दांव था.
दिल्ली और बिहार में भी दिखा असर
इस रणनीति का असर बाद के चुनावों में भी दिखाई दिया. दिल्ली विधानसभा चुनाव और फिर बिहार के चुनाव में विपक्ष ने संविधान, ईवीएम, एसआईआर और अन्य मुद्दों को उठाया. लेकिन वे जनता के बीच वैसा प्रभाव नहीं छोड़ पाए जैसा लोकसभा चुनाव में देखने को मिला था. नतीजा यह हुआ कि भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया और विपक्ष के कई बड़े मुद्दे चुनावी मैदान में कमजोर पड़ गए.
पश्चिम बंगाल भी एक बड़ा उदाहरण
अगर इस रणनीति को समझना हो तो पश्चिम बंगाल का उदाहरण भी महत्वपूर्ण है. पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी बड़ी संख्या में है और वहां की राजनीति लंबे समय से अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों पर आधारित रही है. लेकिन भाजपा ने वहां हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण और हिंदू समाज से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया.
भाजपा ने पीडीए जैसी सामाजिक गोलबंदी के बजाय हिंदू पहचान और उससे जुड़े सवालों को केंद्र में रखा. बीजेपी ने अपने प्रचार में बंगाल में हिंदुओं के साथ हुए अत्याचार पर फोकस रखा. इसका असर यह हुआ कि ममता बनर्जी का राजनीतिक किला ढह गया.
कुंदरकी का जिक्र भी जरूरी
इन सब राज्यों में आए नतीजों के बीच यूपी में लोकसभा के बाद हुए विधानसभा के उपचुनावों का जिक्र भी जरूरी है. इनमें सबसे ज्यादा चर्चा कुंदरकी सीट की रही. कुंदरकी को ऐसी सीट माना जाता है जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं. इसके बावजूद भाजपा ने यहां जीत हासिल कर सबको चौंका दिया. करीब तीन दशक बाद इस सीट पर मिली जीत ने ये साबित कर दिया कि भाजपा ने विपक्ष के सामाजिक समीकरणों की काट निकाल ली है.
जातीय समीकरणों में भी भाजपा आगे?
अगर जातीय राजनीति के नजरिए से देखें तो भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग भी सपा से कहीं ज्यादा व्यापक दिखाई देती है. सपा लगातार पीडीए की बात करती है, लेकिन भाजपा के साथ राजभर, निषाद, पटेल और जाट समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले कई राजनीतिक दल खड़े दिखाई देते हैं.
इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि भाजपा ने पिछले दस वर्षों में बहुमत के बावजूद सत्ता और संगठन दोनों स्तरों पर अपने सहयोगी दलों को हिस्सेदारी दी है. मंत्रालयों से लेकर विभिन्न पदों तक सहयोगी दलों को प्रतिनिधित्व दिया गया है.
यही कारण है कि भाजपा के सहयोगी दल अक्सर सपा के पीडीए मॉडल पर सवाल उठाते हैं. उनका आरोप रहता है कि पीडीए की बात भले की जाती हो, लेकिन वास्तव में पीडीए में केवल एक ही जाति और धर्म का बोलबाला है.
सपा की चुनौती क्या है?
बीजेपी के उलट समाजवादी पार्टी को अगर देखें तो यहां पावर सेंटर एक ही व्यक्ति में सिमटा दिखता है. इसलिए पीडीए का दांव सवालों के घेरे में भी आता है. फिलहाल पिछले दो वर्षों के चुनावी नतीजे और राजनीतिक घटनाक्रम यही संकेत देते हैं कि सपा पीडीए की बात जरूर कर रही है. लेकिन भाजपा उसकी काट, उसका जवाब और उससे बड़ा सामाजिक समीकरण तैयार कर चुकी है. इसलिए अखिलेश यादव का ये दांव चलने की उम्मीद बेहद कम है.
लेखक- डॉ. विनम्र सेन सिंह (इलाहाबाद विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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