Opinion: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की रणभूमि में अवध और पूर्वांचल क्षेत्र हमेशा से निर्णायक साबित होते रहे हैं. इन इलाकों की राजनीति जातीय समीकरणों, ऐतिहासिक गौरव और सांप्रदायिक-सामाजिक ध्रुवीकरण पर टिकी हुई है. इस बार तकरीबन 1000 साल पुराने दो ऐतिहासिक व्यक्तित्व महाराजा सुहेलदेव राजभर और सालार मसूद गाज़ी चुनावी समीकरणों को गहराई से प्रभावित करने जा रहे हैं. एक तरफ जहां महाराजा सुहेलदेव हिंदू प्रतिरोध और स्थानीय गौरव के प्रतीक हैं, वहीं महमूद गजनवी के भांजे और सेनापति सैयद सालार मसूद गाज़ी को लेकर समाजवादी पार्टी (सपा) और एआईएमआईएम की साझा रणनीति अब नई बहस खड़ी करने लगी है.
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हजार साल बाद भी राजभर समाज के हीरो हैं महाराजा सुहेलदेव
महाराजा सुहेलदेव 11वीं शताब्दी के श्रावस्ती (आधुनिक बहराइच क्षेत्र) के राजा थे. लोककथाओं और मिरात-ए-मसूदी जैसी फारसी रचनाओं के अनुसार, उन्होंने गजनवी सेना के कमांडर सैयद सालार मसूद गाज़ी को बहराइच के चित्तौरा झील के किनारे युद्ध में पराजित करते हुए मार गिराया था. 13 जून 1034 को हुए उस भीषण युद्ध के एक हजार साल बाद आज भी राजभर समाज उन्हें अपना महापुरुष मानता है, जो हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए विदेशी आक्रमणकारी के खिलाफ शूरवीरता के साथ लड़े. उन्होंने विभिन्न जनजातियों और छोटे राज्यों को एकजुट कर प्रतिरोध का मोर्चा खड़ा किया था.
100 से अधिक सीटों पर राजभर समाज का प्रभाव
वैसे तो राजभर समाज यूपी में लगभग 2.5 से 2.6 प्रतिशत आबादी वाला ओबीसी समुदाय है, लेकिन पूर्वांचल और अवध के कई विधानसभा क्षेत्रों में उनकी संख्या 10 से 20 प्रतिशत तक पहुंच जाती है. पूर्वांचल के कई जिलों में तो वे 18 प्रतिशत या उससे अधिक प्रभाव रखते हैं. यह वोट बैंक पूर्वी यूपी की 100 से अधिक सीटों पर असर डाल सकता है. अखिलेश यादव जिस पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले की बात करते हैं उसमें राजभर वोट महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन महाराजा सुहेलदेव को लेकर सपा का अनिश्चय भरा रुख और गाज़ी मियां को सूफी संत बताने वाली बातें राजभरों में अब नाराजगी पैदा करने लगी हैं.
गाजी को लेकर सपा और एआईएमआईएम की एक ही रणनीति
दूसरी ओर सालार मसूद गाज़ी को एक आम हिन्दुस्तानी विदेशी आक्रमणकारी ही मानता है. सालार मसूद गाजी की मजार बहराइच में है, जहां हर साल मेला लगता है. सपा के दिग्गज नेता रविदास मल्होत्रा पहले ही गाज़ी को सूफी संत करार दे चुके हैं. अब एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी बहराइच में उनकी मजार पर जा रहे हैं. इससे साफ है कि सपा और एमआईएम सालार गाज़ी को लेकर एक ही रणनीति पर खड़े हैं. उन्हें अल्पसंख्यक वोटों के लिए प्रतीक बनाने में दोनों में होड़ लगी है.
ओवैसी का विवाद में शामिल होना नई बहस जन्म देगा
ओवैसी का दौरा महाराजा सुहेलदेव के अनुयायियों के लिए सीधी चुनौती की तरह है. राजभर समुदाय इसे अपने महापुरुष के अपमान के रूप में देख रहा है. सवाल उठता है कि क्या अखिलेश यादव का पीडीए फॉर्मूला राजभरों के गौरव को कुचल देगा? क्या सपा महाराजा सुहेलदेव राजभर के खिलाफ और उनके अनुयायियों के विरुद्ध खड़ी हो जाएगी? यह सवाल पूर्वांचल और अवध की राजनीति को गरमा रहा है. अगर सपा और एमआईएम मिलकर गाज़ी मियां को सूफी संत के रूप में प्रचारित करता रहा, तो राजभर वोटों का ध्रुवीकरण निश्चित रूप से भाजपा के पक्ष में हो सकता है.
महापुरुषों के सम्मान से बढ़ा है जातीय गौरव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'पंच प्रण' में विरासत पर गर्व और गुलामी के अंशों को मिटाने की बात शामिल है. आजादी के बाद वामपंथी बुद्धिजीवियों ने कई महापुरुषों को इतिहास से मिटाने की कोशिश की. लेकिन वर्तमान सरकार ने महारानी उदा देवी पासी, झलकारी बाई, अहिल्याबाई होलकर जैसी हस्तियों को न केवल सम्मान दिया है, बल्कि उन्हें लोक विमर्श का मुद्दा भी बनाया है. इसी प्रकार महाराजा सुहेलदेव स्मारक का शिलान्यास, उनकी जयंती मनाना और बहराइच मेले को 'महाराजा सुहेलदेव विजयोत्सव' के रूप में मनाना इसी दिशा में कदम हैं. इससे जातीय गौरव बढ़ा है और ओबीसी-दलित समुदायों में सशक्तिकरण का भाव भी जगा है.
अवध और पूर्वांचल में इन दो प्रतीकों का सीधा प्रभाव है. एक तरफ महाराजा सुहेलदेव राजभर समाज और तमाम गैर-यादव ओबीसी समाज को एकजुट कर रहे हैं, जबकि गाज़ी मियां पर विवाद अल्पसंख्यक वोटों को सपा और एमआईएम की ओर खींचने की कोशिश है. ओवैसी के दौरे से बहस तेज होगी, क्या इतिहास को चुनिंदा रूप से पेश करना सही है? क्या एक आक्रमणकारी को सूफी संत कहकर दूसरे की वीरता को कम करना उचित है?
राजभर बिगाड़ सकते हैं सपा के पीडीए का गणित
राजभर समुदाय के नेता ओम प्रकाश राजभर जैसे लोग सुहेलदेव की विरासत को मजबूती से उठा रहे हैं. सपा अगर राजभरों के महापुरुष का अपमान करती रही, तो पीडीए का गणित बिगड़ सकता है. पूर्वांचल में छोटे दलों की भूमिका निर्णायक है और राजभर वोट्स कई सीटों पर मार्जिन तय करते हैं. 2027 का यह चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि ऐतिहासिक गौरव की बहाली और समुदायों के सम्मान की लड़ाई भी बनने जा रहा है. इस जंग में मोदी सरकार की विरासत संरक्षण की नीति एक तरफ, जबकि विपक्ष की वोट बैंक पॉलिटिक्स दूसरी तरफ खड़ी है, बिल्कुल आमने-सामने.
लेखक- डॉ. पतंजलि मिश्र, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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