Opinion: गेस्ट हाउस कांड से PDA तक... मायावती से संबंधों पर क्यों कठघरे में खड़ी दिखती है सपा?

Opinion: अखिलेश यादव के PDA फॉर्मूले के बीच सपा और मायावती के रिश्तों का इतिहास फिर चर्चा में है. 1995 का गेस्ट हाउस कांड, मुलायम-शिवपाल सिंह यादव की निजी टिप्पणियां और दलित राजनीति के अंतर्विरोधों पर पढ़िए डॉ. शब्द प्रकाश का यह विशेष ओपिनियन.

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• 11:05 AM • 09 Jun 2026

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Opinion: उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. चुनावी सरगर्मियां तेज हैं. नए सामाजिक समीकरण गढ़े जा रहे हैं और पुराने राजनीतिक रिश्तों की फिर से समीक्षा हो रही है. समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव इन दिनों PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के जरिए एक व्यापक सामाजिक गठबंधन खड़ा करने की कोशिश में जुटे हैं. लेकिन दलित राजनीति की जमीन पर कदम बढ़ाते ही सपा को बार-बार अपने अतीत से टकराना पड़ता है.

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यह वही अतीत है जिसके केंद्र में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और उसकी सर्वमान्य नेता मायावती हैं. सपा और बसपा के बीच टकराव का इतिहास तीन दशक से भी ज्यादा पुराना है. दोनों दलों ने साथ मिलकर सरकार बनाई, एक-दूसरे को सत्ता तक पहुंचाने में भूमिका निभाई और चुनावी गठबंधन भी किए. इसके बावजूद दोनों के बीच अविश्वास की खाई कभी नहीं भर सकी. 

आज जब 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं और अखिलेश यादव PDA के जरिए दलित वोटों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं, तब मायावती और सपा के रिश्तों का इतिहास एक बार फिर चर्चा में है. सपा खुद को PDA की राजनीति का सबसे बड़ा प्रतिनिधि बताने की कोशिश कर रही है. लेकिन सवाल यह है कि क्या दलित राजनीति की सबसे बड़ी नेता रहीं मायावती के प्रति सपा का ऐतिहासिक व्यवहार इस दावे के साथ सहज बैठता है?

इसे समझने के लिए उन घटनाओं और बयानों को याद करना होगा, जब सपा और उसके नेताओं ने राजनीतिक विरोध से आगे बढ़कर मर्यादा की सीमाओं को लांघ दिया.

1995: जब राजनीतिक टकराव ने मर्यादा की सीमाएं तोड़ीं

सपा-बसपा रिश्तों की चर्चा 2 जून 1995 के गेस्ट हाउस कांड के बिना पूरी नहीं हो सकती. 1993 में भाजपा को रोकने के लिए मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने हाथ मिलाया था. "मिले मुलायम-कांशीराम, हवा हो गए जय श्रीराम" का नारा उस दौर की राजनीति का सबसे चर्चित नारा बन गया. गठबंधन सरकार बनी और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने. लेकिन यह प्रयोग ज्यादा समय तक नहीं चल सका. 1995 में बसपा ने गठबंधन धर्म न निभाने का आरोप लगाते हुए सरकार से समर्थन वापस लेने का फैसला कर लिया.

बसपा का यह फैसला सपा को इतना नागवार गुजरा कि जब मायावती अपने विधायकों के साथ लखनऊ के मीराबाई गेस्ट हाउस में बैठक कर रही थीं, तब वहां हंगामा हुआ. मायावती को जान से मारने की कोशिश तक हुई. सपा कार्यकर्ताओं ने अभद्रता की सारी हदें पार कर दीं. इस घटना ने उत्तर प्रदेश की राजनीति की दिशा बदल दी. यहीं से मायावती और सपा के रिश्ते राजनीतिक विरोध से आगे बढ़कर सम्मान और अपमान की बहस में बदल गए.

राजनीति से ज्यादा निजी कटुता

गेस्ट हाउस कांड के बाद सपा और बसपा के रिश्तों में स्थायी तल्खी आ गई. कई मौकों पर यह राजनीतिक संघर्ष व्यक्तिगत टिप्पणियों तक पहुंच गया. एक चुनावी सभा में मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि उन्हें समझ नहीं आता कि वे मायावती को "कुमारी" कहें, "श्रीमती" कहें या "बहन" कहें. इस बयान पर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया.

मायावती ने भी पलटवार करते हुए कहा कि मुलायम सिंह यादव का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है और उन्हें आगरा के मानसिक चिकित्सालय में भर्ती करा देना चाहिए. लेकिन विवाद यहीं खत्म नहीं हुआ.

शिवपाल ने जब तार-तार कीं सारी मर्यादाएं

बसपा और खासकर मायावती पर हमले यहीं नहीं रुके. सपा के वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव ने भी कई बार ऐसे बयान दिए, जिन पर विवाद खड़ा हुआ. एक मौके पर उन्होंने मायावती और बसपा संस्थापक कांशीराम के संबंधों को लेकर टिप्पणी की. शिवपाल ने कहा कि पूरा देश जानता है कि कांशीराम ने मायावती को किस कीमत पर नेता बनाया और दोनों के क्या संबंध थे. शिवपाल यहीं नहीं रुके. उन्होंने यहां तक कह दिया कि मायावती को अपने कुंवारेपन का टेस्ट कराना चाहिए.

राजनीति में विरोध एक बात है, लेकिन किसी महिला नेता की निजी जिंदगी, व्यक्तिगत संबंधों और चरित्र पर टिप्पणी करना दूसरी बात. लेकिन मुलायम और शिवपाल के बाद सपा कार्यकर्ता भी सारी सीमाएं लांघ गए. एक बार सपा नेता लीलावती कुशवाहा ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि मायावती को अपना कौमार्य परीक्षण कराना चाहिए और दुनिया को बताना चाहिए कि वह "कुमारी" हैं या नहीं. शिवपाल यादव ने यह भी कहा कि मायावती अपनी जुबान पर लगाम लगाएं, नहीं तो सपा कार्यकर्ताओं को रोकना मुश्किल होगा. 

अखिलेश आए, लेकिन भरोसा नहीं लौटा

मुलायम सिंह यादव के बाद सपा की कमान अखिलेश यादव के हाथों में आ गई. हालांकि नेतृत्व बदलने के बावजूद दोनों दलों के रिश्तों में कोई बड़ा बदलाव दिखाई नहीं दिया.

बीच-बीच में कई राजनीतिक प्रयोग जरूर हुए. 2019 में जब सपा और बसपा ने लोकसभा चुनाव साथ लड़ने का फैसला किया, तब इसे उत्तर प्रदेश की राजनीति का सबसे बड़ा घटनाक्रम माना गया. मायावती ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उन्होंने गेस्ट हाउस कांड को पीछे छोड़ दिया है.

लेकिन यह गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं चल सका. चुनाव खत्म होते ही दोनों दलों के रास्ते अलग हो गए. इसके बाद मायावती फिर सपा पर हमलावर हो गईं. वहीं सपा की ओर से भी उन पर लगातार राजनीतिक हमले होते रहे. अखिलेश यादव ने कई बार "बुआ" वाले राजनीतिक संदर्भ में मायावती पर तंज कसा. दूसरी तरफ मायावती लगातार यह दावा करती रहीं कि सपा का मूल चरित्र नहीं बदला है. बसपा का संदेश साफ था कि नेतृत्व भले बदल गया हो, लेकिन पार्टी की राजनीतिक संस्कृति वही पुरानी है.

PDA की बात पर मायावती का जिक्र क्यों जरूरी है?

आज अखिलेश यादव PDA की राजनीति के जरिए दलितों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. वह भाजपा पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाते हैं और खुद को सामाजिक न्याय की राजनीति का असली वाहक बताते हैं.

लेकिन यहीं सपा का अतीत उसके सामने खड़ा दिखाई देता है. सवाल उठता है कि दलित राजनीति के सबसे बड़े चेहरे रही मायावती के साथ जिस तरह का व्यवहार अतीत में हुआ, उसके बाद सपा दलित समाज के बीच अपनी छवि को किस तरह पेश करेगी. जब सपा दलितों के खिलाफ अत्याचार की घटनाओं को मुद्दा बनाती है, तब उसके विरोधी बार-बार मायावती से जुड़े पुराने विवादों और बयानों की याद दिलाते हैं.

2027 का चुनाव सिर्फ सीटों का चुनाव नहीं होगा, बल्कि सामाजिक गठबंधनों की भी परीक्षा होगी. अगर सपा दलित समाज में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना चाहती है, तो उसे सिर्फ PDA का नारा नहीं, बल्कि अपने अतीत से जुड़े सवालों का भी सामना करना होगा. क्योंकि दलित राजनीति की स्मृति में गेस्ट हाउस कांड सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि सम्मान और स्वाभिमान का प्रतीक है.

इसी तरह मायावती की निजी जिंदगी को लेकर की गई टिप्पणियां भी बसपा के राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनी हुई हैं. यही वजह है कि तीन दशक बाद भी सपा और मायावती के रिश्तों की चर्चा होते ही राजनीतिक मतभेदों से पहले सम्मान, मर्यादा और गेस्ट हाउस कांड की याद सामने आ जाती है.

(लेखक डॉ. शब्द प्रकाश दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर लेखन करते हैं.)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)