Opinion: क्या सनातन विरोधियों के हाथों हाईजैक हो गई है गविष्ठि यात्रा?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा मुलायम सिंह यादव परिवार को 'संत सेवक' बताने पर छिड़ा विवाद. 1990 का अयोध्या गोलीकांड, शंकराचार्य स्वरूपानंद की गिरफ्तारी, 2015 का बनारस लाठीचार्ज और गो-तस्करी के इतिहास पर उठे गंभीर सवाल. जानिए क्या है पूरा सच.

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यूपी तक

• 01:24 PM • 08 Jun 2026

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हाल ही में इटावा और सैफई में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने मुलायम सिंह यादव परिवार तथा समाजवादी पार्टी के प्रति खुला समर्थन व्यक्त किया है. उन्होंने मुलायम सिंह यादव को संतों का सम्मान करने वाला और दशकों पुराना सच्चा हितैषी बताया. साथ ही अखिलेश यादव तथा डिंपल यादव को बड़े दिल वाला करार दिया. गौ-रक्षा और सनातन धर्म की रक्षा के लिए निकाली जा रही गौ-विश्टि यात्रा के दौरान यह समर्थन कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है. सवाल उठता है कि क्या अविमुक्तेश्वरानंद सनातन धर्म के संरक्षक के रूप में यादव परिवार के विवादास्पद इतिहास से पूरी तरह अनजान हैं या फिर राजनीतिक हित साधने के लिए सच्चाई से आंखें मूंद रहे हैं? 

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1990 का अयोध्या कांड और रामभक्तों पर गोलियां

1990 में जब अयोध्या आंदोलन अपने चरम पर था, तब मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. 30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को कारसेवकों पर पुलिस फायरिंग हुई जिसमें कई रामभक्त शहीद हो गए. सरयू नदी खून से लाल हो गई. मुलायम सरकार ने गोलियां चलाने वालों पर लगे मुकदमे वापस ले लिए. इस घटना के बाद मुलायम सिंह को 'मुल्ला मुलायम' कहा जाने लगा था.

मुलायम ने कराया था स्वरूपानंद को गिरफ्तार

उसी समय स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को आजमगढ़ से गिरफ्तार किया गया था. शंकराचार्य पद का यह अपमान माना गया. आज स्वामी जी जिन्हें संत सेवक बता रहे हैं, उनके शासनकाल में सनातनी आंदोलनकारियों पर दमन हुआ था.

2015 में अविमुक्तेश्वरानंद पर लाठीचार्ज

अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री काल में वर्ष 2015 में वाराणसी के गोदौलिया क्षेत्र में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके बटुकों पर पुलिस द्वारा बेतहाशा लाठियां बरसाई गईं. गणेश विसर्जन को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान यह घटना हुई. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद स्वयं घायल हुए और गिरफ्तार भी किए गए. क्या जिनके शासन में अविमुक्तेश्वरानंद पर खुद लाठियां पड़ीं, आज उन्हीं को बड़े दिल वाला बताना एक बड़ा विरोधाभास पैदा नहीं करता.

गो-तस्करी और गोवध का पापमय इतिहास

1955 का गोवध निषेध अधिनियम कागजी था. मुलायम और अखिलेश के शासनकाल में चंदौली जिले का सैयदराजा थाना और नौबतपुर चेकपोस्ट गो-तस्करों के लिए कुख्यात थे. सैयदराजा थाना और नौबतपुर चेकपोस्ट पर पोस्टिंग के लिए बोलियां लगा करती थी. बड़े पैमाने पर गो-तस्करी हुआ करती थी, जिसके धन का बंदरबांट 'ऊपर' तक पहुंचता था. तस्करी बिहार होते हुए बंगाल और फिर बांग्लादेश तक पहुंचती थी, जहां गोवंश कत्लखानों में कटने के लिए बेच दिए जाते थे.

योगी सरकार में बना देश का सबसे सख्त गोरक्षा कानून

2017 में योगी आदित्यनाथ सरकार सत्ता में आने के बाद स्थिति पूरी तरह बदल गई. अवैध बूचड़खाने तत्काल बंद कर दिए गए. वर्ष 2020 में उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम को संशोधित कर देश का सबसे सख्त कानून बनाया गया, जिसमें तीन से दस साल तक की सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान है. एनएसए की कार्रवाई शुरू हुई और बड़े गो-तस्करों के एनकाउंटर भी किए गए. वर्तमान में प्रदेश में 7000 से अधिक गो-संरक्षण केंद्र चल रहे हैं जहां 13 लाख से ज्यादा गोवंश की देखभाल हो रही है.

धर्मांतरण, लव जिहाद पर यादव शासन की चुप्पी

यादव परिवार के शासन के दौरान पूर्वी यूपी, अवध क्षेत्र और पश्चिमी जिलों में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण और लव जिहाद की घटनाएं रिकॉर्ड की गईं. नेपाल बॉर्डर वाले इलाकों में मिशनरी गतिविधियां भी सक्रिय थीं. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जिन्हें आज अपना सच्चा हितैषी बता रहे हैं, उनके कार्यकाल में इन गतिविधियों पर कोई प्रभावी रोक नहीं लगी.

सवाल स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से

क्या केवल राजनीतिक गठजोड़ या सपा के समर्थन के लिए इतिहास को भुलाया जा रहा है? आखिर गौ-रक्षा और सनातन रक्षा की यात्रा में 'सच्चे हितैषी' चुनने का मानदंड क्या है? क्या सनातन धर्म की रक्षा करने की बात कहने वाले एक संत को उन शक्तियों से समझौता करना चाहिए जिनके कार्यकाल में संतों पर दमन, रामभक्तों पर गोलियां और गो-हत्याओं का खुला खेल चलता रहा?

इतिहास से आंखें न चुराएं

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती स्वयं को सनातन परंपरा के प्रमुख प्रतिनिधि बताते हैं. ऐसे में उनका कर्तव्य है कि वे सत्य और इतिहास से आंखें न चुराएं. राजनीतिक एजेंडे से ऊपर उठकर सनातन हितों की रक्षा करनी चाहिए. योगी सरकार द्वारा गौ-रक्षा में उठाए गए ठोस कदमों को स्वीकार करना चाहिए, न कि पुराने दमनकर्ताओं को संत सेवक बताकर भ्रम फैलाना चाहिए.

करोड़ों सनातनियों के साथ धोखा

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को अब स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि सनातन धर्म की रक्षा का दावा करते हुए पुराने सनातन विरोधी ताकतों के साथ खड़े होना करोड़ों सनातनियों के साथ धोखा है. इतिहास को इस तरह जानबूझकर नकारना या छिपाना संत की गरिमा के लिए भी ठीक नहीं है. अगर स्वामी जी राजनीतिक स्वार्थ में अंधे होकर मुलायम-अखिलेश जैसे घोषित सनातन विरोधियों को गोभक्त और संत सेवक बता रहे हैं, तो यह सनातन परंपरा के साथ बहुत बड़ा विश्वासघात है.

दमनकारियों की कठपुतली न बनें अविमुक्तेश्वरानंद

सनातन धर्म राजनीति से कहीं ऊंचा और बड़ा है. जो संत सत्ता के लालच में झुक जाते हैं, वे धर्मद्रोही साबित होते हैं और इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करता. स्वामी जी अभी भी समय है, उन लोगों से दूरी बनाएं जिनके शासन में गौ-माता का अपमान, रामभक्तों का खून और संतों का दमन हुआ. अन्यथा इतिहास उन्हें भी उन दमनकारियों की कठपुतली के रूप में याद रखेगा.

लेखक- डॉ. अभय पांडेय (लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)