Opinion: योगी आदित्यनाथ का 'कर्मयोग': अनुशासन और स्पष्ट विजन से यूपी बना सुशासन का नया मॉडल

Opinion: उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली, कर्मयोग की अवधारणा और शासन मॉडल पर आधारित यह लेख उनके अनुशासन, सेवा भाव, प्रशासनिक दृष्टिकोण, कानून-व्यवस्था, कोविड प्रबंधन और विकास कार्यों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है.

CM Yogi Adityanath

CM Yogi

यूपी तक

• 08:03 PM • 04 Jun 2026

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Opinion: भगवदगीता में कहा गया है- "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन". वस्तुतः यह एक ऐसी जीवन-दृष्टि है जो सहस्राब्दियों से भारतीय चेतना को आलोकित करती आई है. इस दर्शन को जब कोई जननेता आत्मसात करता है तो उसका पूरा व्यक्तित्व कर्मयोगी के रूप में परिलक्षित होने लगता है जिसके लक्ष्य में लोक कल्याण के अलावा कुछ नहीं रहता. एक समय था जब उत्तर प्रदेश में सत्ता को अधिकार और भोग का साधन समझा जाता था. पिछले लगभग एक दशक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का अविचल कर्तव्य पथ पर चलना इस बात का ज्वलंत प्रतीक है कि कर्मयोग केवल व्यक्तिगत साधना नहीं व्यवस्था सुधार का माध्यम भी है. योगी की जीवनशैली बताती है कि शासन उनके लिए आध्यात्मिक साधना का विस्तार है, जिसका प्रतिफल उत्तर प्रदेश की प्रगति के रूप में देखने को मिल रहा है. एक कर्मयोगी ही उत्तर प्रदेश जैसे विविधताओं से भरे और देश की सबसे बड़ी जनसंख्या वाले राज्य को बीमारू श्रेणी से निकालकर विकास के पथ पर ला सकता है.

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अनुशासन जीवन का अभिन्न अंग

कर्मयोग का प्रथम सोपान है स्वयं का अनुशासन। कर्मयोगी शासक की पहचान उसकी दिनचर्या से होती है. प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठना, नित्य पूजा-अर्चना, और उसके पश्चात बिना विराम लिए प्रशासनिक कार्यों में डूब जाना. परिस्थितियां कैसी भी हों, कर्मयोगी अनुशासन से समझौता नहीं करता. उदाहरण के लिए मुख्यमंत्री योगी के सिंगापुर व जापान दौरे में उनकी दिनचर्या को लिया जा सकता है जहां समय की प्रतिकूलता के बावजूद उन्होंने अपने एक-एक क्षण का उपयोग किया. इसमें कोई संशय नहीं कि जो व्यक्ति स्वयं अनुशासित होता है, वही व्यवस्था में अनुशासन स्थापित कर सकता है. यह व्यावहारिक सत्य है कि प्रशासनिक मशीनरी किसी उदाहरण का अनुसरण करने के लिए तभी बाध्य होती है जब नेतृत्व स्वयं का उदाहरण प्रस्तुत करें. दशकों से अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार में जकड़ी नौकरशाही में आज यदि जवाबदेही का बोध है तो यह नेतृत्व शैली का ही परिणाम है.

सत्ता अधिकार नहीं, दायित्व

योगी की जीवन यात्रा कर्मयोग का अप्रतिम उदाहरण है जो उन्हें विशिष्ट राजनेता बनाती है. गोरक्ष पीठ की सुदीर्घ परंपरा में अपना जीवन उन्होंने उस समय संन्यास को समर्पित किया जब आयु और परिस्थितियां उन्हें संसार के आकर्षणों में खींच सकती थीं. सेवा और लोक-कल्याण गोरक्ष पीठ की परंपरा रही है. समाज के उपेक्षित वर्गों की सेवा, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य पीठ की प्रतिबद्थता है. इस संस्कार में पले-बढ़े योगी आदित्यनाथ जब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे, तो उनकी मानसिकता में ही सेवा थी. व्यक्तिगत जीवन में सादगी, संयम और त्याग उनके व्यक्तित्व के अंतर्निहित अंग हैं. वह सत्ता को अधिकार नहीं, दायित्व के रूप में देखते हैं और यह दृष्टि ही कर्मयोग का मूल है.

स्पष्ट दृष्टि से लक्ष्य प्राप्ति

गीता में कहा गया है कि आसक्ति रहित होकर निरंतर कर्तव्य का पालन करने वाला व्यक्ति श्रेष्ठ लक्ष्य को प्राप्त करता है. कोविड महामारी का दौर योगी की सबसे बड़ी परीक्षा थी, परंतु योगी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश ने प्रबंधन का श्रेष्ठ लक्ष्य हासिल किया. त्वरित निर्णय क्षमता, केंद्रीकृत निगरानी तंत्र और ग्राम स्तर तक निगरानी का विस्तार, इन उपायों ने महामारी की स्थिति को नियंत्रण में रखा. यह कर्मयोग का प्रशासनिक स्वरूप है. कानून-व्यवस्था को शासन की पहली प्राथमिकता बनाना भी इसी दृष्टि का प्रतिफल है. प्रदेश की जड़ों को सालों से खोखला कर रहे माफिया तंत्र के विरुद्ध निर्णायक कदम ने प्रदेश की पूरी छवि ही बदल दी. श्रेष्ठ लक्ष्य की परिभाषा में समाज का उत्थान, व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण और जनकल्याण भी है.उत्तर प्रदेश में तकनीक-आधारित शासन का विस्तार, सरकारी सेवाओं का डिजिटलीकरण और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के प्रयास व्यवस्था की मजबूती के व्यावहारिक रूप हैं. निवेशकों के लिए अनुकूल वातावरण, इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास, एक्सप्रेसवे का जाल, ये सब उस विकास-दर्शन के अंग हैं जो सामाजिक परिवर्तन से जुड़ते है. गरीबों, किसानों, महिलाओं और युवाओं पर केंद्रित योजनाएं पं. दीन दयाल उपाध्याय की दार्शनिक विरासत अंत्योदय की भावना को मूर्त रूप देती हैं. जब परिवर्तन बड़ा होता है, तो अपेक्षाएं भी उसी गति से बढ़ती हैं. योगी से समाज को अभी भी बहुत अपेक्षाएं हैं. हालांकि एक कर्मयोगी की राह कभी रुकती नहीं। दृष्टि स्पष्ट हो तो हर लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं.

लेखक- ओम प्रकाश त्रिपाठी (वरिष्ठ पत्रकार)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)