Opinion: किसी भी विषय को सुनियोजित ढंग से मुद्दा बनाना या फिर किसी अवसर से राजनीतिक लाभ हासिल करना राजनीति का ही हिस्सा माना जा सकता है, लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि क्या आस्था और धर्म से जुड़े विषय भी इसके अंग हो सकते हैं. क्या धर्म की चादर ओढ़कर समाज को छलने के प्रयास को भी राजनीति का हिस्सा माना जाना चाहिए. जब भी ऐसी कोशिशें की जाएं तो उसे राजनीतिक चतुरता नहीं माना जा सकता, बल्कि यह समझना चाहिए कि वोटों की खातिर षडयंत्र रचने के प्रयास किए जा रहे हैं. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस बीच राम मंदिर में चढ़ावे पर जो बयान दिए हैं या फिर उससे पहले की उनकी जो गतिविधियां रही हैं, उन्हें राजनीतिक छल से अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता. अब एक बड़ा सीधा सा प्रश्न है कि इसके पीछे उनकी मंशा क्या है? आखिर चाहते क्या हैं अखिलेश यादव?
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बात को ताजा बयानबाजी से ही आगे बढ़ाते हैं. अखिलेश यादव ने हाल में आरोप लगाया है कि अयोध्या स्थित भगवान श्रीराम के मंदिर के चढ़ावे में धांधली की जा रही है. मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि यह वही राममंदिर है, जिसके निर्माण को उनकी पार्टी ने दशकों तक हर स्तर पर, न्यायालय में, संसद में, सड़क पर रोकने का प्रयास किया. समाजवादी पार्टी ने इसे राम जन्मभूमि न मानते हुए हमेशा 'बाबरी मस्जिद' के रूप में मान्यता दी. फिर भी सनातनधर्मियों की आकांक्षा के प्रतिफल के रूप में राम मंदिर बन गया. अखिलेश यादव को कभी इस राममंदिर की भव्यता नहीं दिखाई दी, गगन में फहराती धर्म पताका नहीं दिखाई दी, रामलला का मोहक रूप नहीं दिखाई दिया. अब अचानक ही अखिलेश यादव राम मंदिर के चढ़ावे की पवित्रता और पारदर्शिता का सवाल उठा रहे हैं, तो यह उपहासजनक प्रतीत होता है, श्रद्धा का नाटक प्रतीत होता है.
इतिहास के पन्नों में समाजवादी पार्टी के असली चरित्र के कई उदाहरण हैं. क्या 1990 की स्मृति को मिटाया जा सकता है, जब मुलायम सिंह यादव की सरकार ने अयोध्या में कारसेवकों पर गोलियां चलवाईं. निहत्थे श्रद्धालुओं को गोलियों से भूना गया. 2019 में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय के समय भी सपा की प्रतिक्रिया उत्साहजनक तो नहीं ही थी. प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर भी पार्टी का रुख इससे दूरी बनाने और छद्म आलोचना का रहा. फिर अचानक ही अखिलेश चढ़ावे में धांधली की बात उठाकर रामजन्मभूमि ट्रस्ट को कठघरे में लाने का असफल प्रयास करते नजर आते हैं. वह यह भी ध्यान में नहीं लाते कि इस ट्रस्ट के पदाधिकारियों का पूरा जीवन सादगी एवं अनुशासन की मिसाल रहा है. ट्रस्ट का हर कार्यकलाप पूरी ईमानदारी एवं पारदर्शिता के साथ संपन्न होता है. इसके नियमित ऑडिट में पाई-पाई का हिसाब दिया जाता है.
लेकिन अखिलेश जब यह मुद्दा उठाते हैं तो उनका मंतव्य स्पष्ट दिखाई देता है. हालांकि आमजन भी इसे राजनीतिक लाभ लेने की चेष्टा के रूप में ही देख रहे हैं. यह राजनीति का दोहरापन है और समाजवादी पार्टी के मुखिया के तौर पर अखिलेश यादव की यह कोशिश इसे पूरी तरह उजागर करती है. दोहरेपन का यह अकेला उदाहरण नहीं, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद प्रकरण को भी इसमें रखा जा सकता है. काशी के यह संत किस राजनीतिक संस्कृति को आत्मसात करते हैं, यह बताने की आवश्यकता नहीं और इसीलिए योगी सरकार को लेकर मुखर भी हैं. उनके किसी भी बयान को भाजपा के विरुद्ध एक हथियार के रूप में प्रचारित करने में अखिलेश देर नहीं लगाते. किंतु इसके साथ ही एक कड़वा सच भी जुड़ा हुआ है कि जब उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की अपनी सरकार थी, तब इन्हीं अविमुक्तेश्वरानंद को उनकी पुलिस ने बेरहमी से पीटा था. उस घटना की स्मृति आज भी उत्तर प्रदेश के संत समाज में जीवंत है. ऐसे शंकराचार्य को ढाल की तरह इस्तेमाल करना न सिर्फ राजनीतिक धृष्टता है, बल्कि सनातन समाज का अपमान भी.
अखिलेश की पूरी राजनीतिक नाटकशाला के सबसे विडंबनापूर्ण अध्याय को गोसंरक्षण प्रकरण में देखा जा सकता है. अखिलेश यादव आज अविमुक्तेश्वरानंद के साथ बैठकर गोसंरक्षण का उपदेश दे रहे हैं, जबकि उनकी पार्टी और वह स्वयं उन राजनीतिक तत्वों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं जो वर्षों से गोकशी को बढ़ावा देते रहे. कौन भूल सकता है कि सपा के शासनकाल में उत्तर प्रदेश में अवैध बूचड़खाने फले-फूले, गोवंश तस्करी पर कोई प्रभावी अंकुश नहीं लगाया गया और गोसंरक्षण के प्रयासों को सांप्रदायिक रंग देकर कमज़ोर किया गया. इसके पीछे एक सुनिश्चित मुस्लिमपरस्ती थी, जो सपा के हर शासनकाल में देखने को मिली. कब्रिस्तानों और मुस्लिम धार्मिक स्थलों को सरकारी खजाने से मदद में उदारता भी इसी का हिस्सा थी. मुज़फ्फरनगर दंगों के बाद हिंदुओं के विस्थापन पर आंखें मूंद लेना भी मुस्लिमपरस्ती का बड़ा उदाहरण है. और, इससे भी बड़ा उदाहरण है आतंकवाद के आरोपियों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने का फैसला लेना. आतंकवादियों के प्रति उदारता तुष्टीकरण की किस नीति से उपजी थी, यह प्रश्न आज भी उत्तर मांगता है. यह भी पूछता है कि क्या वोट बैंक की बलिवेदी पर राष्ट्रीय सुरक्षा को चढ़ाया जा सकता है?
उत्तर प्रदेश में राजनीति करने वालों को सनातन के प्रति अपनी नजरिया स्पष्ट और खुलकर रखना चाहिए. जब गठबंधन के सहयोगी तमिलनाडु के उदयनिधि स्टालिन सनातन धर्म की तुलना मलेरिया व डेंगू जैसी महामारियों से करते हैं तो अखिलेश का चुप रहना, बहुत कुछ संदेश देता है. ऐसे मामलों में चुप्पी और और राम मंदिर के चढ़ावे पर ट्रस्ट पर निशाना. इन दोनों को साथ रखकर देखें तो अखिलेश की राजनीति का विरोधाभास खुलकर सामने आता है. उत्तर प्रदेश के लोग यह जानने के भी इच्छुक हैं कि मस्जिदों की आय, मदरसों के वित्तपोषण, वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन पर अखिलेश ने कभी सवाल क्यों नहीं उठाए.
वस्तुतः 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव क्षितिज पर हैं और अखिलेश यादव यह भली-भांति जानते हैं कि इस प्रदेश में बिना हिंदू मतों के सत्ता की सीढ़ी नहीं चढ़ी जा सकती. लेकिन उनकी पार्टी की वैचारिक विरासत और उनका अपना मुस्लिम तुष्टीकरण का इतिहास उन्हें विश्वसनीय हिंदू हितैषी बनने से रोकता है इसलिए वह एक छलावा भरा मध्यमार्ग चुनते हैं. न तो खुलकर सनातन का विरोध करो, न पूर्ण समर्थक बनो, जिससे तुष्टीकरण की राजनीति बची रहे. बस, भ्रम उत्पन्न करते रहो. लेकिन, सनातन समाज सदा से विवेकशील रहा है. उसने युगों-युगों में असली और छद्म भक्त के बीच का अंतर पहचाना है और उसके पास यह दृष्टि अभी बरकरार है.
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