Opinion: अविमुक्तेश्वरानंद की नजर में मुगल सबसे बड़े गोभक्त, मोदी-योगी का भारत दुनिया का सबसे बड़ा 'कसाई' देश!

Opinion: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के विवादित बयानों, गौ-हत्या पर उठे सवालों और यूपी में गौ-संरक्षण मॉडल को लेकर छिड़ी बहस के बीच यह लेख राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, योगी सरकार की योजनाओं, गौ-आधारित अर्थव्यवस्था और बदलते नैरेटिव का विश्लेषण प्रस्तुत करता है.

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यूपी तक

• 05:40 PM • 09 Jun 2026

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Opinion: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने हाल ही में जो बयान दिए वे न केवल गौ-संरक्षण की चिंता से परे हैं बल्कि खुलकर राजनीतिक एजेंडे की गंध देने लगे हैं. उन्होंने भारत को 'विश्व का सबसे बड़ा कसाई देश' करार दिया है और दावा किया कि अंग्रेजों के समय से ज्यादा गौ-हत्याएं आज भारत में हो रही हैं. उनके अनुसार प्रतिदिन 50-80 हजार गायें काटी जा रही हैं और जल्द ही गायें केवल तस्वीरों में रह जाएंगी. हालांकि उन्होंने ये आंकड़े बिना किसी तथ्यपरक जानकारी साझा किये केवल जुबानी दिये हैं. सबसे हैरान करने वाली बात उन्होंने मुगलों को गोभक्त बताते हुए कहा कि वे गोमांस नहीं खाते थे और केवल हिंदुओं का मनोबल तोड़ने के लिए गोवध करते थे.

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यानी मुगल तो 'गो-प्रेमी' थे. लेकिन मोदी-योगी सरकार में भारत कसाईखाना बन गया है. यह तर्क इतना उल्टा और तथ्यों से परे है कि सवाल उठता है कि क्या स्वामी जी अब सच्चाई से आंखें मूंदकर केवल अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी को खुश करने में लगे हुए हैं?

दरअसल, अविमुक्तेश्वरानंद की गविष्ठि यात्रा अपने शुरुआत से ही गौ-रक्षा से ज्यादा राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने का हथियार बनी हुई है. जहां एक तरफ वे गुरू गोरखनाथ के शिष्य और प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर लगातार अशोभनीय तंज कस रहे हैं. उन्हें अपमानजनक भाषा से संबोधित कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मुगलों के कथित 'गो-प्रेम' के कसीदे पढ़े जा रहे हैं. इतिहास गवाह है कि मुगल काल में गोवध और मंदिरों पर हमले किस स्तर पर थे. लेकिन स्वामी जी की नजर में वही सच्ची 'गोभक्ति' है. और आज का भारत, जहां देसी गायों को आर्थिक ताकत बनाया जा रहा है, वह उनकी नजर में 'कसाई' कृत्य?

 
...मगर हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है

गोरक्ष पीठाधीश्वर और उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेरणा से इस वक्त यूपी में ‘गौ-संरक्षण से समृद्धि’ का अनोखा मॉडल खड़ा हो चुका है. केवल एक उदाहरण की बात करें तो गाजियाबाद के सिकंदरपुर में ‘हेता’ प्रोजेक्ट अविमुक्तेश्वरानंद के दावों की पूरी पोल खोलने के लिए काफी है. यहां एक हजार से अधिक शुद्ध देसी गायों पर आधारित यह एथिकल डेयरी मॉडल सालाना करीब 10 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार कर रहा है. यहां केवल दूध नहीं, बल्कि ए2 दूध, बिलौना घी, ब्राह्मी घृत, शतधौत घृत, पंचगव्य उत्पाद, हर्बल चाय, कुकीज, लड्डू, स्किन-हेयर केयर और वेलनेस प्रोडक्ट्स सहित करीब 150 प्रकार के गौ-उत्पाद बनाए जा रहे हैं.

विश्व में मेड इन यूपी का डंका

ये उत्पाद अब यूपी की पहचान बन चुके हैं. यूके, यूएसए, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड, यूरोप, सिंगापुर, दुबई समेत 10 से अधिक देशों में 'मेड इन यूपी' गौ-उत्पादों का डंका बज रहा है. स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मॉडल से संरक्षित साहीवाल गाय की आरती और गौ-पूजन कर चुके हैं. अमेरिकी सॉफ्टवेयर इंजीनियर असीम रावत जैसे युवा, जो 14 साल विदेशों में कमाते रहे केवल सीएम योगी की प्रेरणा से वापस वतन लौटे और 100 सदस्यीय अपनी टीम के साथ इस ग्लोबल ब्रांड को खड़ा कर दिया है. ये युवा गाय के नाम पर थोथी राजनीति नहीं कर रहे, बल्कि जमीन पर मेहनत करते हुए गो-संरक्षण का एक नया मॉडल तैयार कर चुके हैं.

समृद्ध हो रहे पशुपालक

यह मॉडल सिर्फ गौ-संरक्षण नहीं, बल्कि गो-उत्पादों के समग्र उपयोग पर आधारित है. यहां वृद्ध गोवंश को भी बोझ नहीं माना जाता, बल्कि उन्हें संरक्षण और समृद्धि का हिस्सा बना दिया गया है. योगी सरकार की योजनाओं, जिसमें डेयरी मास्टरप्लान, ऑपरेशन-4 और 50 प्रतिशत सब्सिडी के तहत साहीवाल, गीर, गंगातीरी, सिंधी जैसी उच्च नस्लों वाली देसी गायों को बढ़ावा मिल रहा है. इसके तहत पशुपालक लाखों रुपये की आमदनी कर रहे हैं. साथ ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी नया उछाल आया है.

ईज ऑफ डूइंग बिजनेस से मिल रहा गो-संरक्षण को बढ़ावा

एक तरफ स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद यह कहते घूम रहे हैं कि देश में शुद्ध देसी गायें मात्र दो करोड़ ही बची हैं और इसकी हजारों नस्लें विलुप्त हो गईं. लेकिन यूपी में इन नस्लों को बाजार से जोड़कर, सब्सिडी और प्रशिक्षण देकर संरक्षित किया जा रहा है. ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के नाम पर वह बूचड़खानों को रियायत का तथ्यहीन आरोप लगाते हैं जबकि हकीकत यह है कि गौ-आधारित उद्यमों को इसी 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' के तहत बड़े पैमाने पर प्रोत्साहन मिल रहा है. 'हेता' प्रोजेक्ट इसका जीता जागता उदाहरण है. अविमुक्तेश्वरानंद शिव मंदिरों से बिजली बिल वसूले जाने का जिक्र करके समाज का ध्रुवीकरण कर रहे हैं और बिना ठोस आंकड़ों के बूचड़खानों को मुफ्त बिजली जैसी सुविधाएं देने का दावा करते हैं.

सवाल तो उठा रहे, मगर सच्चाई क्यों नहीं दिख रही?

अविमुक्तेश्वरानंद की यात्रा को सबसे ज्यादा समर्थन समाजवादी पार्टी से मिल रहा है. अखिलेश यादव, डिंपल यादव, शिवपाल यादव और उनकी समाजवादी पार्टी के जिलास्तरीय नेता गोरखपुर से लेकर कन्नौज, मैनपुरी, इटावा, आगरा, फिरोजाबाद सहित अबतक के हर पड़ाव में सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं. सपा का सार्वजनिक समर्थन मिलना इस ओर इशारा कर रहा है कि पूरी गविष्ठि यात्रा इसी राजनीतिक गठजोड़ के सहारे आगे बढ़ रही है. वहीं गौरक्षा के नाम पर निकाली गई इस यात्रा को अबतक कहीं भी अपेक्षित जनसमर्थन न मिलता देख स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अब तीखे और विवादित बयान देकर सुर्खियां बटोरने पर उतारू हो गये हैं.

राजनीतिक अंधेपन का शिकार हो चुकी है यात्रा

सवाल उठता है कि जब यूपी से गौ-उत्पाद दुनिया भर में निर्यात हो रहे हैं, देसी नस्लों का संरक्षण आर्थिक मॉडल बन रहा है और लाखों किसान इससे जुड़ रहे हैं तो 'डायनासोर जैसी विलुप्ति' और 'सबसे बड़ा कसाई देश' जैसे अनर्गल बयान देना केवल राजनीतिक अंधापन की ओर इशारा करते हैं. सवाल ये भी उठता है कि स्वामी जी मुगलों के कथित गो-प्रेम के कसीदे तो पढ़ते हैं, लेकिन सीएम योगी जैसे गुरू गोरखनाथ के उत्तराधिकारी द्वारा किए जा रहे व्यावहारिक गो-संरक्षण को सिरे से नजरअंदाज कर देते हैं.

बहस अब गाय की नहीं, राजनीतिक नैरेटिव की हो चुकी है

यह दुखद है कि गौ-रक्षा जैसे पवित्र मुद्दे को भी वोट बैंक की राजनीति का शिकार बनाया जा रहा है. अविमुक्तेश्वरानंद को सच्चाई दिख रही है या नहीं, क्योंकि यह बहस अब गाय की रही ही नहीं, बल्कि अब ये शुद्ध राजनीतिक नैरेटिव बन चुकी है, जिसे 2027 के यूपी विधानसभा चुनावों के परिप्रेक्ष्य में देखा जाने लगा है. एक तरफ मुगलों की तारीफ, दूसरी तरफ तेजी से विकसित हो रहे भारत की निंदा। हकीकत शीशे की तरह साफ है. मोदी-योगी सरकार ने गौ-संरक्षण को भावनाओं के ज्वार से ऊपर उठाकर आत्मनिर्भरता और समृद्धि का माध्यम बनाने पर पूरा जोर दिया है. वहीं स्वयं को संत समाज के सर्वोच्च पद पर आसीन बताने वाले अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी को अपनी यात्रा को विराम देकर आत्ममंथन करना चाहिए. क्योंकि जो आंखें हर मुद्दे को केवल राजनीति के चश्मे से देखने लगती हैं उन्हें सच्चाई कभी नहीं दिखती.

लेखक- ऋत्विक जायसवाल, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)