Opinion: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है. लेकिन इस बीच सूबे की राजनीति में एक दिलचस्प विरोधाभास देखने को मिल रहा है. एक तरफ कांग्रेस और समाजवादी पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ साथ खड़ी दिखाई देती हैं, दोनों इंडी गठबंधन का हिस्सा हैं और केंद्र की राजनीति में एक-दूसरे की सहयोगी हैं. लेकिन दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में दोनों दलों के नेता लगातार एक-दूसरे पर तीखे हमले कर रहे हैं.
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कांग्रेस के इमरान मसूद और प्रदेश अध्यक्ष अजय राय हों या समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आईपी सिंह, सभी एक-दूसरे पर खुलकर निशाना साध रहे हैं. पहली नजर में यह सिर्फ बयानबाज़ी लग सकती है, लेकिन इसके पीछे दोनों दलों की राजनीतिक मजबूरियां और भविष्य की रणनीति छिपी हुई है.
सबसे ताजा हमला आईपी सिंह ने एक सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से किया है. उन्होंने लिखा-'मोहब्बत की दुकान लगाने वाले राहुल बाबा आज अपने सगे चाचा स्वर्गीय संजय गांधी जी की 46वीं पुण्यतिथि पर न उनके समाधि स्थल शांति वन गये न श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए एक ट्वीट किया.इनके अंदर जो परिवार के प्रति नफरत भरी है वह इन्हें कभी सफल नहीं होने देगी.' आईपी सिंह से ठीक पहले इमरान मसूद ने सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव पर तीखा हमला किया था.
दरअसल, 2014 में केंद्र की सत्ता से कांग्रेस के बाहर होने और 2017 में सपा के उत्तर प्रदेश की सत्ता गंवाने के बाद दोनों दल लगातार राजनीतिक संघर्ष के दौर से गुजरे हैं. समाजवादी पार्टी ने कभी कांग्रेस के साथ तो कभी बसपा के साथ गठबंधन किया, लेकिन भाजपा को सत्ता से हटाने में सफल नहीं हो सकी. दूसरी ओर कांग्रेस भी उत्तर प्रदेश में अपनी खोई हुई जमीन तलाशने की कोशिश करती रही.
फिर आया लोकसभा चुनाव 2024. कांग्रेस और सपा के गठबंधन ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया और भाजपा को नुकसान पहुंचाया. लेकिन राजनीति में जीत सिर्फ खुशी नहीं लाती, वह नए विवाद भी पैदा करती है. चुनाव के बाद सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हुआ कि इस सफलता का असली श्रेय किसे मिले?
समाजवादी पार्टी मानती है कि उसकी संगठनात्मक ताकत, अखिलेश यादव का नेतृत्व और सामाजिक समीकरणों पर पकड़ इस सफलता की सबसे बड़ी वजह रहे. वहीं कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि राहुल गांधी की सक्रियता और कांग्रेस की वापसी ने गठबंधन में नई ऊर्जा भरी. दिलचस्प बात यह है कि जब पहले गठबंधन चुनाव हारते थे तब भी दोनों दल एक-दूसरे पर आरोप लगाते थे और अब जीत के बाद भी श्रेय को लेकर खींचतान जारी है.
इमरान मसूद क्यों हमलावर हैं?
कांग्रेस और सपा के बीच तनाव कोई नया नहीं है. यह दशकों पुरानी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा है. कांग्रेस के भीतर आज भी यह धारणा मौजूद है कि समाजवादी पार्टी का एक बड़ा वोट बैंक कभी कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक हुआ करता था, खासकर मुस्लिम मतदाता. यही वजह है कि दोनों दल एक-दूसरे के प्रति पूरी तरह सहज कभी नहीं दिखाई देते.
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के हालिया बयान भी इसी सोच का हिस्सा माने जा रहे हैं. इमरान मसूद लगातार यह संदेश देने की कोशिश करते हैं कि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर की पार्टी है और उसकी राजनीतिक हैसियत सपा से कहीं बड़ी है. उनका मकसद सिर्फ सपा पर हमला करना नहीं, बल्कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं को यह भरोसा दिलाना भी है कि पार्टी किसी की जूनियर पार्टनर नहीं है.
वहीं समाजवादी पार्टी की चिंता अलग है. सपा को लगता है कि अगर कांग्रेस उत्तर प्रदेश में फिर से संगठन खड़ा करने और अपने पुराने वोटरों को वापस जोड़ने में सफल हो गई, तो उसका असर सीधे सपा के राजनीतिक आधार पर पड़ेगा. इसलिए सपा के नेता भी समय-समय पर ऐसे बयान देते हैं जिनसे यह संदेश जाए कि भाजपा के खिलाफ असली लड़ाई उत्तर प्रदेश में सपा ही लड़ रही है.
वहीं, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय के बयान भी इसी व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हैं. उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को फिर से खड़ा करना है. अगर वे हर मुद्दे पर सपा के साथ नरम रुख अपनाते हैं तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं में यह संदेश जाएगा कि पार्टी अपनी स्वतंत्र पहचान खो चुकी है.
असली लड़ाई भाजपा से ज्यादा राजनीतिक स्पेस की है
वास्तव में यह लड़ाई भाजपा से ज्यादा एक-दूसरे के राजनीतिक स्पेस की लड़ाई है. दोनों दल जानते हैं कि भाजपा जैसी मजबूत चुनावी मशीनरी के सामने अकेले लड़ना जोखिम भरा हो सकता है. इसलिए गठबंधन उनकी मजबूरी भी है और जरूरत भी. लेकिन साथ ही दोनों यह भी समझते हैं कि अगर वे अपनी अलग राजनीतिक पहचान खो देंगे तो भविष्य में गठबंधन की शर्तें तय करने की स्थिति में नहीं रहेंगे. यही कारण है कि सहयोगी होने के बावजूद दोनों दल लगातार अपनी ताकत दिखाने में लगे हुए हैं.
*बंगाल चुनाव के बाद बदले संकेत*
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद भी विपक्षी राजनीति के भीतर समीकरण बदलते दिखाई दिए. एक समय तृणमूल कांग्रेस भी कांग्रेस को ज्यादा महत्व देने के मूड में नहीं थी और खुद को विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत के रूप में पेश कर रही थी. लेकिन चुनावी नतीजों के बाद टीएमसी पूरी तरह से बिखर गई. इमरान मसूद भी इसी संदर्भ में सपा को संदेश देते दिखाई देते हैं. उनका कहना है कि कांग्रेस को अब किसी के सहारे की जरूरत नहीं है. उनका कहना है कि अगर छोटी पार्टियों को अपना वजूद बचाना हैं तो उन्हें कांग्रेस के साथ आना ही होगा.
सीट बंटवारे की असली लड़ाई
असल में मौजूदा तल्खी की सबसे बड़ी वजह सीट बंटवारा और राजनीतिक अहम है. कांग्रेस चाहती है कि विधानसभा चुनाव में उसे इतनी सीटें मिलें कि वह अपनी राजनीतिक ताकत साबित कर सके. पार्टी के भीतर यह भावना है कि अगर लोकसभा चुनाव में गठबंधन को फायदा हुआ है तो विधानसभा में भी उसे सम्मानजनक हिस्सेदारी मिलनी चाहिए.
वहीं समाजवादी पार्टी का मानना है कि उत्तर प्रदेश में उसका जनाधार कांग्रेस से कहीं ज्यादा मजबूत है. सपा के रणनीतिकारों को लगता है कि कांग्रेस को ज्यादा सीटें देने का फायदा अंततः कांग्रेस को होगा, जबकि वोटों का बड़ा हिस्सा सपा के सामाजिक आधार से आएगा. यही वजह है कि सपा फिलहाल सीटों को लेकर ज्यादा उदार रुख अपनाने के मूड में दिखाई नहीं देती.
आगे क्या?
आने वाले महीनों में सीट बंटवारे की बातचीत जितनी आगे बढ़ेगी, उतना ही साफ होगा कि यह गठबंधन सिर्फ मजबूरी का साथ है या फिर दोनों दल वास्तव में लंबे समय तक साथ चलने की तैयारी कर रहे हैं. अभी के लिए इतना तय है कि कांग्रेस और सपा की यह जुबानी जंग दरअसल गठबंधन से ज्यादा अपने-अपने राजनीतिक वजूद को बचाने की लड़ाई है.
(लेखक, भावेष पांडेय, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में अधिवक्ता हैं. सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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