Opinion: योगी सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे अखिलेश यादव, पर जनता पूछ रही सवाल- क्या भूल गए 2012-17 का वो दौर?

Opinion: अखिलेश यादव शिक्षा व्यवस्था को लेकर योगी सरकार पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन क्या उनके कार्यकाल की तस्वीर अलग थी? जानिए सपा शासन में नकल, सरकारी स्कूलों की हालत, शिक्षामित्र व्यवस्था और शिक्षा से जुड़े पुराने विवादों की पूरी कहानी.

CM Yogi Adityanath and Akhilesh Yadav (File Photo: PTI)

CM Yogi Adityanath and Akhilesh Yadav (File Photo: PTI)

यूपी तक

• 08:37 PM • 30 Jun 2026

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Opinion: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं हैं. ऐसे में प्रदेश की राजनीति भी पूरी तरह चुनावी रंग में रंग चुकी है. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इन दिनों सरकारी स्कूलों, शिक्षकों और शिक्षा व्यवस्था को लेकर योगी सरकार पर लगातार हमलावर हैं. उनका आरोप है कि सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं, शिक्षा व्यवस्था कमजोर हो रही है और शिक्षकों से पढ़ाई के बजाय दूसरे काम कराए जा रहे हैं. विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना और उसकी कमियों को उजागर करना है. इसलिए अखिलेश यादव के सवालों को राजनीति का हिस्सा माना जा सकता है. लेकिन जब बात शिक्षा व्यवस्था की हो, तो एक सवाल पूर्व मुख्यमंत्री से भी पूछा जाना चाहिए 'क्या उन्हें अपने शासनकाल की शिक्षा व्यवस्था याद है?'

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उत्तर प्रदेश के गांवों में आज भी एक दिलचस्प बात अक्सर सुनने को मिल जाती है. जब कोई अपनी पढ़ाई का जिक्र करता है तो यह भी बताता है कि उसने हाईस्कूल या इंटर की परीक्षा किस सरकार में पास की थी. कई लोग गर्व से कहते हैं कि उन्होंने कल्याण सिंह के शासनकाल में परीक्षा दी थी, क्योंकि उस दौर को नकल पर सख्ती और अनुशासन के लिए याद किया जाता है. वहीं, समाजवादी पार्टी के शासनकाल की बात आते ही लोगों के जेहन में सबसे पहले परीक्षा केंद्रों की दीवारों पर लगी सीढ़ियां और खुलेआम कराई जा रही नकल की तस्वीरें उभर आती हैं.

2012 से 2017 के बीच, जब खुद अखिलेश यादव प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, उस दौरान ऐसी कई तस्वीरें और खबरें सामने आईं, जो आज भी इंटरनेट और सोशल मीडिया पर मौजूद हैं. परीक्षा केंद्रों की खिड़कियों तक सीढ़ियां लगाकर उत्तर पहुंचाने के दृश्य पूरे देश में चर्चा का विषय बने थे. कई जगह नकल कराने का बाकायदा ठेका लिया जाता था. इतना ही नहीं, उस समय जो छात्र नकल का विरोध करते थे या ईमानदारी से परीक्षा देना चाहते थे, उन्हें दबाव और मारपीट तक का सामना करना पड़ता था. यह घटनाएं अपवाद नहीं थीं, बल्कि अक्सर सुर्खियों का हिस्सा बनती थीं.

हालांकि सवाल सिर्फ बोर्ड परीक्षाओं तक सीमित नहीं था. प्राथमिक और जूनियर स्कूलों की हालत भी किसी से छिपी नहीं थी. प्रदेश के कई सरकारी विद्यालय शिक्षामित्रों के भरोसे चल रहे थे. नियमित शिक्षकों की कमी आम बात थी। कई स्कूल जर्जर भवनों में संचालित हो रहे थे, कहीं छात्रों की संख्या बेहद कम थी तो कहीं शिक्षक ही नहीं थे.

जब बच्चे लगाते थे झाड़ू

उस दौर की कई तस्वीरें आज भी सोशल मीडिया पर मौजूद हैं, जिनमें स्कूलों में सफाईकर्मी न होने की वजह से बच्चे खुद झाड़ू लगाते दिखाई देते हैं. इस मुद्दे पर उस समय काफी विवाद भी हुआ था. कई जगह शिक्षकों को पढ़ाने के साथ-साथ सफाई तक करनी पड़ती थी. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उस समय की शिक्षा व्यवस्था को आदर्श कहा जा सकता है?

मिड-डे मील भी बना रहता था विवादों में

मिड-डे मील योजना भी अक्सर विवादों में रहती थी. भोजन की गुणवत्ता, कर्मचारियों की कमी और व्यवस्था को लेकर आए दिन शिकायतें सामने आती थीं. कई बार मिड-डे मील कर्मचारियों और शिक्षकों के बीच विवाद की खबरें भी सुर्खियां बनती थीं। यानी शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियां उस समय भी कम नहीं थीं.

यह भी उतना ही सच है कि शिक्षा व्यवस्था न तो एक दिन में बिगड़ती है और न ही एक दिन में पूरी तरह बदल जाती है. हर सरकार अपने हिस्से का काम करती है और अपनी कमियों की जिम्मेदारी भी उठाती है. इसलिए अगर आज स्कूलों की स्थिति, शिक्षकों की कमी या शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो सरकार से जवाब भी मांगा जाना चाहिए.

लेकिन राजनीति में विश्वसनीयता तब और मजबूत होती है, जब नेता दूसरों पर सवाल उठाने के साथ अपने कार्यकाल का भी ईमानदारी से मूल्यांकन करे. अगर एक पूर्व मुख्यमंत्री आज शिक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं, तो जनता उनके शासनकाल का रिकॉर्ड भी जरूर देखती है.

उत्तर प्रदेश की जनता अब सिर्फ आरोप और जवाबी आरोप नहीं सुनती बल्कि तुलना भी करती है. उसे यह भी याद रहता है कि किस दौर में नकल माफिया चर्चा में थे, किस समय सरकारी स्कूलों की बदहाली सुर्खियां बनती थी और किस सरकार ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार के दावे किए. ऐसे में शिक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर राजनीतिक बयानबाजी से ज्यादा जरूरी है कि बहस तथ्यों के आधार पर हो, ताकि जनता खुद तय कर सके कि किस सरकार ने व्यवस्था को बेहतर बनाने की कोशिश की और किस दौर में व्यवस्था सवालों के घेरे में रही.

लेखक- डॉ. अभय पांडेय, दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक विषयों पर लेखन करते रहते हैं.