'...तो पहले ये काम करो', वाराणसी में मांस-मछली की दुकानों के लेकर आए नए फैसले पर इस तबके ने कह दी बड़ी बात

रोशन जायसवाल

• 03:52 PM • 08 Jun 2026

वाराणसी नगर निगम के शहर से मीट, मछली और मांस की दुकानों को बाहर शिफ्ट करने के फैसले का विरोध शुरू हो गया है. बंगाली समाज ने इसे अपनी संस्कृति और परंपराओं पर असर डालने वाला कदम बताते हुए नाराजगी जताई है.

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वाराणसी, उत्तर प्रदेश: काशी के धार्मिक और सांस्कृतिक ताने-बाने में मांस-मछली की दुकानों को लेकर छिड़ा विवाद अब गहराता जा रहा है. वाराणसी नगर निगम ने अगले 6 महीनों के भीतर शहर की सीमा से सभी मीट, मांस और मछली की दुकानों को बाहर शिफ्ट करने का फैसला किया है. नगर निगम ने इस प्रस्ताव को हरी झंडी भी दे दी गई है.

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तैयारी यह है कि शहर की इन दुकानों को बाहरी इलाकों जैसे रामनगर, शुजाबाद, अवलेशपुर, गणेशपुर और शिवपुर में शिफ्ट किया जाए, लेकिन प्रशासन के इस कदम ने शहर के एक बड़े और पुराने तबके को नाराज कर दिया है. इस फैसले के खिलाफ अब वाराणसी का 'बंगीय समाज' (बंगाली समुदाय) खुलकर मैदान में आ गया है.

15 किमी दूर कैसे जाएं?

दशाश्वमेध घाट के पास बसे सदियों पुराने बंगाली टोला में पीढ़ियों से रह रहे लोगों में इस फैसले को लेकर भारी आक्रोश है. स्थानीय लोगों ने इसे 'तुगलगी फरमान' करार दिया है. बंगाली समाज के लोगों का कहना है कि उनके यहां मछली सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति और परंपरा का हिस्सा है. 

मां काली की पूजा से लेकर बच्चे के अन्नप्राशन (पहली बार अन्न खिलाना), शादी-ब्याह और जन्म से लेकर मृत्यु तक के हर छोटे-बड़े रीति-रिवाज में मछली का होना अनिवार्य है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या लोग रोजमर्रा की पूजा और रस्मों के लिए 10 से 15 किलोमीटर दूर शहर से बाहर मछली खरीदने जाएंगे?

"आस्था का सम्मान करना है, तो पहले बंद हो शराब"

बंगाली समुदाय के लोगों ने दो टूक शब्दों में कहा कि अगर सरकार को लगता है कि मांस-मछली से शहर की पवित्रता और आस्था प्रभावित हो रही है या इससे गंदगी फैल रही है, तो सबसे पहले वाराणसी में शराब की दुकानों को पूरी तरह बंद किया जाना चाहिए. 

लोगों का कहना है कि अगर प्रशासन पहले शराब की बिक्री पर रोक लगाता है तो वे मीट-मछली की दुकानें बाहर भेजने के फैसले का पूरा समर्थन करेंगे. उन्होंने कहा कि एकतरफा कार्रवाई किसी भी तरह से सही नहीं है.

स्थानीय लोगों ने भी की आलोचना

इस फैसले का विरोध सिर्फ बंगाली समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य स्थानीय नागरिक भी इसके व्यावहारिक पहलुओं पर सवाल उठा रहे हैं. एक स्थानीय निवासी ने बताया कि उनका बेटा खिलाड़ी है, जिसके लिए प्रोटीन के रूप में नॉनवेज बहुत जरूरी है. 

अब डाइट के लिए क्या उन्हें रोज शहर से बाहर चक्कर लगाने होंगे? वहीं कुछ लोगों का यह भी आरोप है कि यह फैसला राजनीतिक फायदे के लिए लिया गया है, जहां एक खास वर्ग को परेशान करने और दूसरे को खुश करने की कोशिश की जा रही है.