जिले में पेट्रोल-डीजल की किल्लत की ऐसी 'दहशत' फैली है कि लोग अब मर्यादा और नियम सब भूल चुके हैं. शहर से लेकर गांव तक के पेट्रोल पंपों पर आज एक बेहद अजीबोगरीब और चौंकाने वाला नजारा देखने को मिला, जो दूधिया सुबह-सुबह घर-घर दूध पहुंचाने के लिए अपनी गाड़ियों पर बड़े-बड़े कैन और डिब्बे लादकर निकलते थे, आज उन्हीं डिब्बों में दूध की जगह 'पेट्रोल' की धार बहती नजर आई.
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पंपों पर लंबी कतारें और घर-घर स्टॉकिंग
पंपों पर मची मारामारी के बीच लोग इस कदर पैनिक हो गए हैं कि उन्हें सिर्फ 'स्टॉक' जमा करने की फिक्र है. कोई घर की खाली बाल्टी उठा लाया है, तो कोई दूध वाले बड़े कैनों में लीटरों के हिसाब से तेल भरवा रहा है. आलम यह है कि पंपों पर गाड़ियों की लंबी कतारें तो हैं ही, लेकिन पैदल और साइकिल से डिब्बे-कैन लेकर आए लोगों का हुजूम ज्यादा बड़ा नजर आ रहा है.
खतरे से खेल रही जनता, नियमों की उड़ी धज्जियां
खुले बर्तनों और दूध के कैनों में पेट्रोल भरवाना किसी बड़े हादसे को दावत देने जैसा है, लेकिन 'तेल के खेल' में अंधी हो चुकी जनता को खतरे की कोई परवाह नहीं. पंप कर्मचारी भी भीड़ के दबाव के आगे बेबस नजर आ रहे हैं. लोग एक-दूसरे को धकियाते हुए बस इस जुगत में हैं कि किसी तरह उनका डिब्बा फुल हो जाए.
प्रशासन की अपील बेअसर दिखता
उधर, जिला प्रशासन और पुलिस बार-बार अपील कर रही है कि तेल की कोई कमी नहीं है, अफवाहों पर ध्यान न दें. लेकिन जनता का तर्क तीखा है- "साहब! कल को तेल न मिला तो काम कैसे चलेगा? जब पंपों पर 'नो स्टॉक' का बोर्ड दिख रहा है, तो डिब्बे भरना मजबूरी है." देखना यह है कि प्रशासन इन डिब्बों और कैनों में भरे जा रहे 'खतरे' पर कब लगाम लगाता है, या फिर यह अफरा-तफरी ऐसे ही खतरनाक मोड़ लेती रहेगी.
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