आम आदमी की रसोई का चूल्हा ठंडा, होटल-ढाबों पर गैस धड़ल्ले से इस्तेमाल; घरेलू गैस की किल्लत या कालाबाजारी का खेल?

रायबरेली में गैस सिलेंडर की किल्लत को लेकर उपभोक्ताओं में नाराजगी बढ़ रही है. एजेंसियों के स्टॉक होने के दावों के बावजूद लोग सुबह 4 बजे से लाइन में लगने को मजबूर हैं, जिससे वितरण व्यवस्था और संभावित कालाबाजारी पर सवाल उठ रहे हैं.

Newzo

• 06:24 PM • 25 Mar 2026

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रायबरेली: जिले में रसोइया गैस की किल्लत है या केवल कुप्रबंधन? यह सवाल आज हर उस उपभोक्ता के जेहन में है जो कड़कड़ाती धूप और धूल के बीच गैस एजेंसी के बाहर घंटों लाइन में खड़ा रहने को मजबूर है. एक तरफ प्रशासन और एजेंसियां दावा कर रही हैं कि सिलेंडर का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है, तो दूसरी तरफ सड़कों पर उमड़ी यह भीड़ दावों की पोल खोल रही है। आखिर जब 'बैकअप' पूरा है, तो जनता की सांसें क्यों फूल रही हैं?

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​सिस्टम का 'लोचा' या जानबूझकर पैदा की गई किल्लत?

​एजेंसियों के बाहर सुबह चार बजे से ही कतारें लगनी शुरू हो जाती हैं. बुजुर्ग, महिलाएं और दिहाड़ी मजदूर अपना काम छोड़ सिर्फ एक अदद सिलेंडर के लिए घंटों इंतजार कर रहे हैं. जब गोदामों में सिलेंडर भरे पड़े हैं, तो वितरण की रफ्तार इतनी सुस्त क्यों है? क्या यह किसी बड़े खेल की आहट है या फिर वितरण प्रणाली पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है?

​एजेंसियों के दावे बनाम जमीनी हकीकत

​ उपभोक्ता आरोप लगा रहे हैं कि पर्ची कटने के बावजूद हफ्तों तक डिलीवरी नहीं दी जा रही. जब लोग खुद एजेंसी पहुंच रहे हैं, तो उन्हें 'स्टॉक खत्म' होने का बहाना बताकर टरकाया जा रहा है, जबकि अंदरूनी सूत्रों की मानें तो स्टॉक की कोई कमी नहीं है.

​ब्लैक मार्केटिंग की बू!

​जनता के बीच दबी जुबान में चर्चा है कि क्या इस कृत्रिम किल्लत के जरिए 'ब्लैक मार्केटिंग' (कालाबाजारी) को बढ़ावा दिया जा रहा है? होटल और ढाबों पर धड़ल्ले से कमर्शियल के बजाय घरेलू सिलेंडरों का इस्तेमाल हो रहा है, जबकि आम आदमी की रसोई का चूल्हा ठंडा पड़ा है.

​प्रशासन की चुप्पी पर सवाल

​हैरानी की बात यह है कि सड़कों पर घंटों लाइन में लगी जनता की परेशानी जिला पूर्ति विभाग को नजर नहीं आ रही। आखिर रसद अधिकारी इस 'मिसमैनेजमेंट' पर चुप क्यों हैं? अगर स्टॉक पर्याप्त है, तो एजेंसियों की मनमानी पर नकेल क्यों नहीं कसी जा रही?