Raebareli System Failure: सरकार ने विकास का 'पहिया' दौड़ाने के लिए खजाने का मुंह खोल दिया, लेकिन जिले के लापरवाह अफसरों ने उस पहिए में ही 'पंचर' कर दिया. जनता पूरे साल टूटी सड़कों और अस्पतालों में इलाज के लिए तरसती रही, तो दूसरी ओर अपने ही विभाग के कर्मचारियों का हक मारने में भी साहबों ने कसर नहीं छोड़ी. नतीजा यह हुआ कि विकास और वेतन-एरियर के लिए आए करीब 49.77 करोड़ रुपये बिन खर्च किए ही वापस (सरेंडर) कर दिए गए.
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कर्मचारियों के पेट पर लात, एरियर का पैसा भी लौटाया
हैरानी की बात यह है कि सरेंडर किए गए बजट में सिर्फ विकास कार्य ही नहीं, बल्कि कर्मचारियों के वेतन और एरियर की भारी-भरकम राशि भी शामिल है. कई विभागों के बाबू और अधिकारी साल भर फाइलों पर कुंडली मारकर बैठे रहे, जिससे कर्मचारियों को उनके हक का एरियर तक नहीं मिल पाया. जब भुगतान की अंतिम घड़ी आई, तो पल्ला झाड़ते हुए करोड़ों रुपये वापस सरकारी खजाने में भेज दिए गए. अब कर्मचारी अपने ही पैसे के लिए नए वित्तीय वर्ष में फिर से दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर होंगे.
आंकड़ों की बाजीगरी: 21.57 अरब में से 21.07 अरब खर्च
सरकार ने जिले के विकास और स्थापना खर्च के लिए कुल 21,57,23,14,502 रुपये जारी किए थे. तमाम हीलाहवाली के बाद विभागों ने कुल 21,07,45,87,452 रुपये खर्च किए. हालांकि, यह खर्च भी तब हुआ जब अंतिम दिन ट्रेजरी में 'सिर-फुटौवल' की नौबत आ गई. यदि अधिकारी समय रहते जाग जाते, तो सरेंडर हुए 49.77 करोड़ रुपये से जिले की सूरत बदल सकती थी और सैकड़ों कर्मचारियों के घरों में एरियर की खुशियां पहुंच सकती थीं.
रात 12 बजे तक खुला 'पाप' का पिटारा
31 मार्च की रात जब आम आदमी चैन की नींद सो रहा था, तब कोषागार (ट्रेजरी) में हड़कंप मचा था. अपनी गर्दन बचाने के लिए अधिकारी और कर्मचारी आधी रात तक पुरानी फाइलों पर पसीना बहाते रहे. आंकड़ों की बाजीगरी ऐसी चली कि रात 12 बजे तक बजट सरेंडर करने का खेल चलता रहा. यह सब तब हुआ जब सरकार बार-बार कहती रही कि विकास की गंगा धरातल पर उतरनी चाहिए.
PWD और स्वास्थ्य विभाग ने तोड़ी उम्मीदें
आम जनता को सबसे ज्यादा उम्मीद लोक निर्माण विभाग (PWD) और स्वास्थ्य विभाग से थी. लेकिन आंकड़ों पर नजर डालें तो कलेजा मुंह को आ जाए. PWD ने सबसे ज्यादा 17.09 करोड़ रुपये सरेंडर कर दिए—यानी सड़कें गड्ढामुक्त होने के बजाय फाइलों में ही दफन हो गईं. वहीं, चिकित्सा विभाग ने 13 करोड़ रुपये वापस भेज दिए, जबकि गरीब मरीज एक-एक बेड और दवा के लिए भटकते रहे.
क्या कहते हैं जिम्मेदार?
जिला कोषाधिकारी (DTO)भावना श्रीवास्तव ने बताया कि वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर सभी विभागों को बजट का सदुपयोग करने के निर्देश दिए गए थे. कुल 21.07 अरब रुपये खर्च हुए हैं. सरेंडर की गई धनराशि में विकास कार्यों के साथ-साथ कुछ विभागों के कर्मचारियों के वेतन और एरियर का हिस्सा भी शामिल है, जिसे समय से बिल न लग पाने के कारण वापस करना पड़ा. रात 12 बजे तक कोषागार खुला रखकर अधिकतम भुगतान सुनिश्चित किए गए थे.
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