Raebareli Traffic Problem: अगर आप मधुबन रेलवे क्रासिंग से गुजरने की सोच रहे हैं, तो अपने पास धैर्य का भारी स्टॉक और एक्स्ट्रा समय लेकर चलें. यहाँ किस्मत का फाटक कब गिर जाए और कब 'घंटों' के लिए आप जाम के कैदी बन जाएं, इसका कोई ठिकाना नहीं है. शहर की लाइफलाइन कही जाने वाली यह क्रासिंग अब आम जनता के लिए जी का जंजाल बन चुकी है.
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तमाशा: वाशिंग लाइन या 'वेटिंग लाइन'?
हैरानी की बात यह है कि यहाँ जाम ट्रेनों की आवाजाही से कम और डिब्बों की 'साफ-सफाई' की वजह से ज्यादा लगता है. क्रासिंग के बगल में ही वाशिंग लाइन होने के कारण कोचों को लाने और ले जाने के लिए गेट बंद कर दिया जाता है. नतीजा यह होता है कि ट्रेन तो साफ हो जाती है, लेकिन घंटों धूप में खड़े होकर जनता का पसीना निकल जाता है.
नौनिहालों का भविष्य और मरीजों की सांसें दांव पर
स्कूल के लिए जंग: सुबह-सुबह जब बच्चों को क्लास में होना चाहिए, तब वे स्कूल बस की खिड़की से फाटक खुलने का इंतजार करते नजर आते हैं. कई बार तो बच्चे पहले पीरियड के बाद स्कूल पहुंच पाते हैं.
सिसकती एम्बुलेंस: सबसे खौफनाक मंजर तब होता है जब सायरन बजाती एम्बुलेंस जाम में फंस जाती है. मरीज जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा होता है, लेकिन वाशिंग लाइन के कोचों की शंटिंग के आगे 'इमरजेंसी' भी बेबस नजर आती है.
जनता की हुंकार: कब मिलेगा समाधान?
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह समस्या अब रोज की कहानी बन चुकी है. घंटों फाटक बंद रहने से शहर की यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाती है. जाम इतना लंबा होता है कि गेट खुलने के बाद भी उसे क्लियर होने में आधा घंटा लग जाता है.
रेलवे प्रशासन की लापरवाही का खामियाजा शहर की जनता क्यों भुगते? वाशिंग लाइन के काम के लिए घंटों गेट बंद रखना आम आदमी के समय और जान के साथ खिलवाड़ है.
अब देखना यह है कि सोता हुआ रेल प्रशासन और जिले के जिम्मेदार अधिकारी कब जागते हैं, या फिर यूं ही 'मधुबन' में जाम का शोर मचता रहेगा.
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