जिले की राजनीति में बिना 'दिल्ली' और 'लखनऊ' की मर्जी के पत्ता नहीं हिलता और ताज़ा हालात देखकर तो यही लग रहा है कि यहां 'पत्ता' छोड़िए, पूरी 'टहनी' ही अटक गई है. अवध के 12 जिलों में भाजपा ने नए पदाधिकारियों की रेवड़ियां बांट दीं, लेकिन रायबरेली के कार्यकर्ता आज भी मोबाइल की स्क्रीन घूर रहे हैं कि शायद अब लिस्ट आ जाए.
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'केंद्र शासित' का तंज अब गले की फांस?
कल तक जो भाजपाई कांग्रेस को यह कहकर चिढ़ाते थे कि रायबरेली तो 'केंद्र शासित जिला' है, आज खुद उसी चक्रव्यूह में फंसे नजर आ रहे हैं. चर्चा गरम है कि यहां संगठन बनाना 'खीर' बनाने जैसा नहीं, बल्कि 'लोहे के चने' चबाने जैसा हो गया है. आखिर बड़े-बड़े 'क्षत्रपों' (दिग्गजों) की पसंद-नापसंद का ख्याल जो रखना है.
क्यों फंसा है पेंच?
इसका कारण है दिग्गजों की 'कश्मकश' यानी कि 18 से 22 पदाधिकारियों की कुर्सी एक और दावेदार अनेक है. ऊपर से बड़े नेताओं के बीच तालमेल बिठाना किसी हिमालय चढ़ने से कम नहीं है.
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